दक्षिण एशिया में भारत के लिए फिर से बढ़ रही चुनौती !
दक्षिण एशिया में भारत के लिए फिर से बढ़ रही चुनौती, रहना होगा अलर्ट
साफ है कि अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा का जिस तरह से सीधा असर दक्षिण एशिया पर पड़ता दिख रहा है वैसा दुनिया के बहुत ही कम हिस्सों में देखा जा सकता है। भारत के लिए चिंता की बात यह है कि दक्षिण एशिया में इन शक्तियों की गतिविधियां सीधे तौर पर उसके हितों से जुड़ी हुई हैं।
… पहलगाम हमला और उसके बाद भारत के आपरेशन सिंदूर की वजह से दक्षिण एशिया हाल के दिनों में दुनिया भर की मीडिया में सुर्खियों में रहा है। अमेरिका से लेकर ब्रिटेन तक, अफ्रीकी महादेश व दक्षिण अमेरिकी देशों से लेकर यूरोपीय देशों व एशिया के अन्य देशों ने भारत व पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसी स्थिति को लेकर चिंता जताई है। लेकिन अगर आप थोड़ा गौर से देखें तो भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव की मौजूदा स्थिति के अलावा भी दक्षिण एशिया में बहुत कुछ हो रहा है।
असलियत में देखा जाए तो जिस तरह से वैश्विक शक्तियां इस समूचे क्षेत्र में सक्रियता दिखा रही हैं, वैसी स्थिति केवल पिछली सदी के सातवें दशक में ही दिखाई दी थी। तब अमेरिका और रूस के बीच प्रतिस्पर्द्धा का असर दक्षिण एशिया में दिखाई दिया था और अब रूस की जगह चीन ले चुका है। अमेरिका और चीन के बीच अफगानिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक में शतरंत की बिसात बिछती दिख रही है। अभी गेम की शुरुआत ही है और इसका रुख किस तरफ होगा, यह तो साफ नहीं है, लेकिन यह निश्चित है कि जो भी परिणाम होगा उसका भारत पर बड़ा असर होगा।
पिछले दिनों एक तरफ भारत और पाकिस्तान के बीच मिसाइलों का आदान-प्रदान हो रहा था, तभी भारत और बांग्लादेश एक दूसरे के आर्थिक हितों के खिलाफ कदम उठा रहे थे। पहले बांग्लादेश ने जमीनी रास्ते से भारतीय सूत का आयात करना बंद किया तो उसके बाद भारत ने बांग्लादेश में तैयार रेडीमेड गार्मेंट्स का जमीनी रास्ते से भारत व यहां से दूसरे देशों को होने वाले निर्यात पर रोक लगा दी। इस खबर के बीच यह बात कहीं दब कर रह गई कि लंबे अरसे बाद बांग्लादेश और अमेरिका के बीच सैन्य सहयोग बढ़ने लगा है।
बांग्लादेश के काक्स बाजार में अमेरिकी सेना और वायु सेना के सदस्यों के साथ बांग्लादेश की सेना के बीच एक सैन्य अभ्यास चल रहा है। वैसे यह अभ्यास असैनिक महत्व का है, लेकिन इसके मायने गहरे हैं। इसके तार कहीं न कहीं म्यांमार की मौजूदा आंतरिक हालात से जुड़े हैं। म्यांमार में सैनिक शासक कमजोर पड रहे हैं और देश के कई इलाके में विद्रोही समूहों का कब्जा हो चुका है। अमेरिका इन विद्रोही समूहों को शह देने की योजना बना रहा है। ऐसा करके वह सैनिक शासक व प्रधानमंत्री मिन आंग ह्वाइंग के लिए हालात मुश्किल करना चाहता है, लेकिन असली निशाने पर चीन है जो सैनिक तानाशाह को लगातार प्रश्रय दे रहा है।
अमेरिका का दोहरा रवैया : म्यांमार में अमेरिका के बढ़ती रुचि को संयुक्त राष्ट्र की तरफ से म्यांमार के रखाइन प्रांत के लिए मानवीय आधार पर गलियारा बनाने के प्रस्ताव से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। इस गलियारे को बनाने के लिए अमेरिका को बांग्लादेश की मदद चाहिए। कहा तो यह जा रहा है कि इस गलियारे से रखाइन प्रांत में मानवीय सहायता पहुंचाई जा सकेगी, रोहिंग्याओं का पुर्नवास किया जा सकेगा आदि।
बांग्लादेश की कार्यवाहक सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस इसके लिए तैयार भी हैं, लेकिन बांग्लादेश की सेना का कहना है कि इतना बड़ा फैसला लोकतांत्रिक सरकार को ही करना चाहिए। चीन के बढ़ते वर्चस्व से चिंतित अमेरिका बंगाल की खाड़ी में अपने हितों के मुताबिक विस्तार चाहता है। पूर्व पीएम शेख हसीना कह चुकी हैं कि अगर उन्होंने बंगाल की खाड़ी में स्थिति सेंट मािर्टन द्वीप को अमेरिका को सैन्य अड्डा बनाने के लिए दे दिया होता तो उन्हें सत्ता नहीं गंवानी पड़ती।
अभी तक जो सूचनाएं सामने आ रही हैं, उससे यह भी पता चलता है कि अमेरिकी सरकार की म्यांमार को लेकर तैयार इस नई नीति में भारत के साथ कोई विमर्श नहीं किया गया है। वैसे अमेरिका हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए भारत को अपना अहम रणनीतिक साझेदार मानता है, लेकिन भारत के पड़ोस में चीन के प्रभाव को चुनौती देने के लिए जो नीति बना रहा है, उसमें भारत की कोई भूमिका नहीं है।
भारत भी इस पूरे हालात पर नजर बनाए हुए है। पहली वजह तो यह है कि बांग्लादेश से लेकर म्यांमार तक अमेरिका की बढ़ती गतिविधियां उसके दीर्घकालिक हितों के अनुरूप नहीं है। मोहम्मद यूनुस की सरकार पहले ही भारत विरोधी रवैया अख्तियार किए हुए है। अब अगर अमेरिका म्यांमार के एक बड़े हिस्से में सैन्य विद्रोहियों की मदद करता है और उन्हें हथियार आदि उपलब्ध कराता है तो यह भारत के हितों को भी आगे कई तरह से नुकसान पहुंचा सकता है। पूर्वोत्तर क्षेत्र में सक्रिय आतंकवादी संगठनों का म्यांमार के सैन्य विद्रोहियों के साथ पुराना संपर्क है।
ऐसे में सैन्य विद्रोहियों को मिलने वाले गोला-बारूद, हथियार आदि पूर्वोत्तर राज्यों के अतिवादी संगठनों के हाथों में जाने का खतरा है। भारत सरकार वैसे तो चीन समर्थित सैन्य तानाशाह के पक्ष में भी नहीं है, लेकिन यदि उसे सैन्य विद्रोही और सैन्य तानाशाह में चयन करने का विकल्प मिले तो वह निश्चित तौर पर मौजूदा सैन्य सरकार के साथ जाएगा। भारत ने काफी सोच समझ कर पिछले एक वर्ष के दौरान मिन आंग ह्वाइंग की सैन्य सरकार के साथ संपर्क बढ़ाया है। अप्रैल, 2025 के आरंभ में पीएम मोदी ने थाइलैंड में बिम्सटेक सम्मेलन के दौरान सैनिक शासक ह्वाइंग से द्विपक्षीय मुलाकात की थी।
अफगानिस्तान-चीन की निकटता : म्यांमार से सीधे अफगानिस्तान की तरफ चलते हैं। अफगानिस्तान में विदेशी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्द्धा कोई नई बात नहीं है। पिछली सदी के सातवें दशक में रूसी सेना के आगमन से लेकर अफगानी कबीले को अमेरिकी मदद, इसमें पाकिस्तान की भूमिका सब इतिहास के पन्नों में दर्ज है। अमेरिकी सेना ने अगस्त, 2021 में अफगानिस्तान छोड़ने का फैसला किया। तालिबान की सरकार फिर से वापस आई। इस बीच केवल एक देश ऐसा रहा जिसने काबुल में लगातार अपना दूतावास चलाया और वह देश चीन है। तालिबान सरकार का अभी सबसे करीबी रिश्ता चीन से है। चीन की नजर अफगानिस्तान के खनिज भंडार पर है।
अफगानिस्तान को हर तरह की मदद चीन मुहैया करा रहा है और साथ ही वहां के लीथियम व कापर खनिज भंडारों में निवेश बढ़ा रहा है। चीन की कंपनियां लगातार अफगानिस्तान का दौरा कर रही हैं। बीजिंग की अफगानिस्तान में बेहद सक्रिय भूमिका को लेकर अमेरिका भी चिंतित है और अब उसने यह संकेत भेजना शुरू कर दिया है कि तालिबान के साथ वह संबंध विकसित करने को तैयार है। माना जा रहा है कि अमेरिका का सोच भी यही है कि अफगानिस्तान के बहुमूल्य खनिजों पर कहीं चीन का कब्जा न हो जाए जैसाकि दुनिया के कई अन्य देशों में हुआ है। अफगानिस्तान की स्थिति से भारत के हित भी सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। लिहाजा वह अपने पारंपरिक सोच को बदलते हुए तालिबान के साथ संबंध सुधारने में जुटा है।
दूसरी तरफ, अफगान की तालिबान सरकार का रिश्ता पाकिस्तान के साथ बहुत तल्ख है तो यहां भी चीन की तरफ से दोनों देशों के बीच मध्यस्थता कराने की कोशिश हो रही है। पिछले हफ्ते बीजिंग में इन तीनों देशों के विदेश मंत्रियो की बैठक हो चुकी है। इसमें चीन पाकिस्तान इकोनमिक कारिडोर से अफगानिस्तान को जोड़ने की सहमति बनी है। यह बैठक भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री से हुई पहली टेलीफोन वार्ता के ठीक छह दिनों बाद हुई है। साफ है कि अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा का जिस तरह से सीधा असर दक्षिण एशिया पर पड़ता दिख रहा है, वैसा दुनिया के बहुत ही कम हिस्सों में देखा जा सकता है। भारत के लिए चिंता की बात यह है कि दक्षिण एशिया में इन शक्तियों की गतिविधियां सीधे तौर पर उसके हितों से जुड़ी हुई हैं।