प्रवासियों और शरणार्थियों को खतरा क्यों मान रही है दुनिया?
नए साल में भी दुनिया की तस्वीर स्याह ही नजर आती है। बढ़ते संघर्ष और उभरता सत्तावाद संस्थाओं को कमजोर कर रहे हैं। बढ़ती विषमता आर्थिक असुरक्षा को गहरा रही है। लेकिन सबसे अधिक हतोत्साहित करने वाली घटना ‘अदर्स’ यानी दूसरों के प्रति बढ़ती नफरत है। दुनिया के तमाम देशों में राजनेता प्रवासियों और शरणार्थियों को एक खतरे के रूप में पेश कर रहे हैं।
यह स्थिति डब्ल्यूएच ऑडेन की कविता ‘रिफ्यूजी ब्लूज’ की याद दिलाती है। द्वितीय विश्व युद्ध की पूर्वसंध्या पर लिखी इस कविता में एक सार्वजनिक सभा में वक्ता चेतावनी देता है कि ‘अगर हम उन्हें भीतर आने देंगे, तो वे हमारी रोजी-रोटी छीन लेंगे।’ इस ‘जेनोफोबिया’ का उभार किसी शून्य में नहीं हो रहा है। यह एक गहरे संरचनात्मक बदलाव से प्रेरित है।
हम भूल जाते हैं कि राष्ट्र-राज्य एक अपेक्षाकृत नया विचार है, जो उस समय उभरा था जब यात्राएं धीमी और सीमित हुआ करती थीं। उस दौर में दुनिया को अलग-अलग समुदायों के समूह के रूप में देखना तार्किक था। तब हर समुदाय अपने सदस्यों के कल्याण के लिए स्वयं जिम्मेदार था। इन इकाइयों को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए एक साझा पहचान आवश्यक थी और इसी के लिए राष्ट्रवाद उभरा।
लेकिन वैश्वीकरण ने इस व्यवस्था पर लगातार दबाव डाला है। वस्तुओं, पूंजी, सूचनाओं और लोगों की अपेक्षाकृत मुक्त आवाजाही- और उसके साथ डिजिटल क्रांति- ने कंपनियों, श्रमिकों और उपभोक्ताओं को सीमाओं के पार जुड़ने में सक्षम बना दिया है। विडंबना यह है कि यही बात आज के धुर-राष्ट्रवाद को हवा दे रही है। यह उस मॉडल को पुनर्जीवित करने का प्रयास है, जिसे दुनिया पीछे छोड़ चुकी है।
हम इसे पहले भी देख चुके हैं। नस्लीय श्रेष्ठता के दावे किसी जमाने में सामान्य माने जाते थे, लेकिन आज वे त्याज्य समझे जाते हैं। लेकिन आज भी लोगों का अपने-अपने देशों को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बताना आम है, जबकि समय के साथ राष्ट्रीय सर्वोच्चता के ऐसे दावे भी उतने ही असभ्य और अक्षम्य प्रतीत होंगे।
इस बदलाव की रूपरेखाएं दशकों पहले ही दिखाई देने लगी थीं। 1992 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘द ट्वाइलाइट ऑफ सॉवरेन्टी’ में वॉल्टर रिस्टन ने भविष्यवाणी की थी कि राष्ट्रीय सरकारें धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खो देंगी। उनके अनुसार, हमारा सामूहिक भविष्य लगातार उन लोगों के हाथों में जा रहा है, जो दूरसंचार और कंप्यूटरों के जरिये पूरे ग्रह को जोड़ रहे हैं और उन बैंकरों के हाथों में भी, जो वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक ढांचे के माध्यम से पूंजी का लेनदेन करते हैं।
जैसे एक न्यायपूर्ण दुनिया के निर्माण के लिए दासता और नस्लीय श्रेष्ठता की अस्वीकृति आवश्यक थी, उसी तरह आने वाले समय में राष्ट्रवाद के अहंकार को त्यागना भी अनिवार्य हो सकता है। रबींद्रनाथ ठाकुर बार-बार सीमाओं से मुक्त दुनिया की कल्पना करते रहे थे। 1917 के एक निबंध में उन्होंने तर्क दिया था कि भले ही राष्ट्र-राज्य एक व्यावहारिक आवश्यकता बना रहे, लेकिन हमें अंततः उस दिन की आकांक्षा करनी चाहिए जब हमारी प्राथमिक पहचान केवल ‘मानव’ हो।
पं. नेहरू ने भी इस दृष्टि की शक्ति को पहचाना था। लेकिन भले ही हम सार्वभौमिकता के नैतिक पक्ष को स्वीकार कर लें और यह मान लें कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी गहराई से आपस में जुड़ चुकी है, फिर भी सवाल बना रहता है कि क्या सीमाओं से मुक्त दुनिया वास्तव में संभव है? आखिरकार, राष्ट्रवाद ने आगे बढ़ने और उत्कृष्टता हासिल करने की एक शक्तिशाली प्रेरणा भी तो देशों को दी है, जिसने विकास और इनोवेशन को गति देने में मदद की है।
तीसरी शताब्दी ईसा-पूर्व के यूनानी स्टोइक दार्शनिक क्रिसिप्पस ऑफ सोली एक उपयोगी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले क्रिसिप्पस नैतिक जीवन को समझाने के लिए प्रतिस्पर्धी खेलों का रूपक इस्तेमाल करते थे। अमेरिकी दार्शनिक टैड ब्रेनन के शब्दों में, वे धक्का-मुक्की रहित नैतिकता के पक्षधर थे, जिसका अर्थ यह है कि प्रतिस्पर्धी जीतने का प्रयास करें, लेकिन केवल खेल के नियमों के भीतर रहकर। ऐसी परिस्थितियों में प्रतिस्पर्धा- मित्रता, सहयोग और साझा उद्देश्य के साथ सह-अस्तित्व में रह सकती है। निस्संदेह, सीमाहीन दुनिया अभी दूर का सपना है। फिलहाल, हम जो कर सकते हैं, वह है मौजूदा सुपरनेशनल संस्थाओं को मजबूत करना- जैसे संयुक्त राष्ट्र, ब्रेटन वुड्स संस्थान और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय। ऐसे समय में, जब राष्ट्रवाद अंतरराष्ट्रीय सहयोग की नींव को कमजोर कर रहा है, इन संस्थाओं की मजबूती अत्यंत महत्वपूर्ण है।
हमें एक ऐसी दुनिया की आकांक्षा को संजोना होगा, जहां किसी को भी ‘दूसरा’ न माना जाए, और जहां शरणार्थियों तथा प्रवासियों को हमारी रोजी-रोटी छीनने वाले अमानवीय खतरों के रूप में चित्रित न किया जाए।

