दिल्ली

मनमानी रोकने वाले नए नियम !

मनमानी रोकने वाले नए नियम

भारत का डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र एआई और सिंथेटिक कंटेंट से उत्पन्न चुनौतियों का सामना कर रहा है। सरकार ने आईटी नियमों में संशोधन और एआई गवर्नेंस दिशानिर्देशों के माध्यम से इसे मजबूत किया है। नए नियम एआई-जनित सामग्री की स्पष्ट परिभाषा देते हैं, रोकथाम पर जोर देते हैं, और लेबलिंग अनिवार्य करते हैं। इसका उद्देश्य तकनीकी प्रगति और नागरिक गरिमा के बीच संतुलन स्थापित करते हुए पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करना है।

एआई-जनित सामग्री की स्पष्ट परिभाषा और रोकथाम पर जोर।

  1. सिंथेटिक कंटेंट पर अनिवार्य लेबलिंग, स्रोत पहचान आवश्यक।
  2. डिजिटल प्लेटफार्मों की बढ़ी जवाबदेही, नागरिक गरिमा सुरक्षित।

 भारत का डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। मशीनी कौशल (एआइ) में हुई प्रगति, खासकर आडियो, वीडियो और आडियो-वीडियो कंटेंट को बनाने और बदलने की तकनीक ने सूचना के सृजन, उपभोग और विश्वास के तरीके को मौलिक रूप से बदल दिया है। जहां ये तकनीक अभिव्यक्ति, रचनात्मकता और लोगों तक पहुंच को बढ़ाती हैं, वहीं ये ऐसे नए खतरे भी पैदा करती हैं जो सीधे तौर पर व्यक्ति की गरिमा, सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों से जुड़े हुए हैं। कृत्रिम रूप से बनाई गई जानकारी से पैदा होने वाली खास चुनौतियों को समझते हुए भारत सरकार ने डिजिटल मध्यस्थों (डिजिटल इंटरमीडियरी) से जुड़े कानून और नीतिगत ढांचे को और मजबूत किया है।

सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021 में किए गए हालिया संशोधन और नवंबर 2025 में इंडिया एआइ मिशन के तहत जारी भारत की एआइ गवर्नेंस गाइडलाइंस, 2025-दोनों को साथ पढ़ने पर सरकार का एक संतुलित और स्पष्ट दृष्टिकोण सामने आता है। इसका मतलब यह है कि वास्तविक नुकसान से निपटने के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी जिम्मेदारियां तय की गई हैं और साथ ही जिम्मेदार तरीके से एआइ को अपनाने के लिए नीतिगत सिद्धांत भी तय किए गए हैं।

हितधारकों (स्टेकहोल्डर्स) से व्यापक विचार-विमर्श के बाद तैयार किए गए ये सभी नियम और दिशानिर्देश मिलकर सरकार की एक साफ मंशा दिखाते हैं-तकनीक का विकास ऐसा हो, जो पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक की गरिमा को बनाए रखने वाले ढांचे के भीतर ही आगे बढ़े। संशोधित इंटरमीडियरी नियमों में पहली बार कृत्रिम रूप से बनाई गई जानकारी की एक साफ और व्यावहारिक परिभाषा दी गई है। इसमें वह कंटेंट शामिल है जो इस तरह बनाया या बदला गया हो कि वह असली जैसा लगे या हकीकत से अलग पहचान में न आए, लेकिन इसमें सामान्य और ईमानदार कामों को साफ तौर पर बाहर रखा गया है-जैसे तकनीकी एडिटिंग, दिव्यांगों की सुविधा के लिए किए गए बदलाव, पढ़ाई या शोध से जुड़ी सामग्री और वैध रचनात्मक उपयोग।

इससे यह सुनिश्चित होता है कि डिजिटल नुकसान के नए तरीकों से मौजूदा कानूनी ढांचे के भीतर ही निपटा जाए, न कि उसे अनौपचारिक या प्लेटफार्म की अपनी माडरेशन व्यवस्था पर छोड़ दिया जाए। इतना ही महत्वपूर्ण यह स्पष्टीकरण है कि मध्यस्थों द्वारा स्वचालित उपकरणों या अन्य उचित तकनीकी उपायों के माध्यम से सद्भावनापूर्वक की गई कार्रवाइयां वैधानिक सुरक्षा को कमजोर नहीं करती हैं। इससे जवाबदेही बनाए रखते हुए अनुपालन को बढ़ावा देने वाला परिवेश मजबूत होता है।

संशोधित ढांचे में सबसे बड़ा और अहम बदलाव यह है कि अब सिर्फ नुकसान होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय, पहले से ही रोकथाम पर जोर दिया गया है। जो डिजिटल प्लेटफार्म कृत्रिम रूप से बनाई गई जानकारी को बनाने या फैलाने में मदद करते हैं, उन्हें ऐसे तकनीकी उपाय अपनाने होंगे, ताकि गैर-कानूनी कंटेंट के बनते समय या फैलते समय ही रोका जा सके। अगर कृत्रिम रूप से बनाया गया कंटेंट कानूनी है तो उस पर साफ और स्पष्ट लेबल लगाना अनिवार्य होगा। साथ ही, तकनीकी रूप से संभव होने पर उसके साथ स्थायी मेटाडाटा या स्रोत पहचान से जुड़ी व्यवस्था भी करनी होगी, ताकि यह पता चल सके कि वह कंटेंट कहां से आया है।

इन लेबल या पहचान से जुड़े चिह्नों को हटाना, बदलना या छिपाना साफ तौर पर प्रतिबंधित होगा। इसमें केवल नुकसान हो जाने के बाद कंटेंट हटाने पर भरोसा नहीं किया गया है, बल्कि पारदर्शिता को नागरिक की गरिमा और भरोसे की सुरक्षा के रूप में देखा गया है। अब नागरिकों को सिर्फ शिकायत करने का अधिकार ही नहीं मिलेगा, बल्कि वे उसी समय यह पहचान भी कर सकेंगे कि कोई कंटेंट असली है या नहीं। यह नागरिकों के ‘जानने के अधिकार’ को मान्यता देने जैसा है। अब डिजिटल प्लेटफार्म को समय-समय पर और साफ भाषा में यूजर्स को उनके अधिकार, जिम्मेदारियां और नियम न मानने पर होने वाले परिणामों के बारे में बताते रहना होगा।

बड़े और प्रभावशाली इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म के लिए नियमों में अतिरिक्त जिम्मेदारियां तय की गई हैं, जो उनके आकार और प्रभाव के हिसाब से हैं। अगर कोई प्लेटफार्म नियमों का पालन नहीं करता है, तो उसे चूक माना जाएगा और उस पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। जिन प्लेटफार्म का समाज पर ज्यादा और व्यापक असर है, उन पर शासन और निगरानी की जिम्मेदारी भी ज्यादा होगी।

कानूनी रूप से लागू किए जा सकने वाले इन नियमों के साथ-साथ, इंडिया एआइ गवर्नेंस गाइडलाइंस, 2025 एआइ को जिम्मेदार, सुरक्षित और सभी को साथ लेकर अपनाने के लिए एक नीतिगत ढांचा बताती हैं। ये गाइडलाइंस आइटी एक्ट या इंटरमीडियरी नियमों की कानूनी जिम्मेदारियों को खत्म नहीं करतीं, बल्कि ये डेवलपर्स, एआइ सिस्टम लागू करने वालों और संस्थानों को दिशा देने का काम करती हैं। फिलहाल जो ढांचा बनाया गया है, वह संतुलित नियमों और नीतिगत दिशानिर्देशों पर टिका है, पर यदि जनहित में जरूरत पड़ी, तो संसद के पास बदलती तकनीकी परिस्थितियों के अनुसार कानून बनाने का पूरा अधिकार बना हुआ है।

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