पर्यावरण: नाजुक हिमालय में निर्माण की चुनौती ?

पर्यावरण: नाजुक हिमालय में निर्माण की चुनौती, उत्तरकाशी सुरंग हादसे के बाद सतर्क होने की जरूरत
यह हिमालय में बुनियादी ढांचों के निर्माण की समीक्षा का अवसर भी होना चाहिए, ताकि हिमालयी क्षेत्र में ऐसा संकट दोबारा न पैदा हो।
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले की सिलक्यारा सुरंग में लगभग एक पखवाड़े तक फंसे 41 मजदूरों के सकुशल बाहर निकलने से अच्छी खबर दूसरी नहीं हो सकती। एक राष्ट्र के रूप में हमें सामूहिक रूप से बचाव दल का शुक्रिया अदा करना चाहिए। विशेष रूप से उन रैट होल माइनर्स को (चूहे की तरह मिट्टी की खुदाई करने वाले श्रमिक), जिनके अंतिम प्रयास और केंद्र एवं राज्य सरकारों के दृढ़ संकल्प ने इसे संभव बनाया। 2014 में गैर-कानूनी घोषित रैट होल माइनिंग तकनीक का उपयोग सुरंग में फंसे मजदूरों को निकालने के लिए आखिरी कुछ मीटर को साफ करने के लिए किया गया। जब उन मजदूरों के बाहर निकालने के दूसरे प्रयास विफल होने लगे थे और दिल टूटने लगा था, तब इन्होंने दृढ़ता के साथ ठोस प्रयास किए।

जिन मजदूरों को इस संकट का सामना करना पड़ा, उनमें से अधिकांश गरीब हैं। उनके परिवार के लोग बचाव प्रयासों की अद्यतन जानकारी पाने व अपने प्रियजनों को देख पाने की उम्मीद में कई दिनों से दुर्घटना स्थल पर डेरा डाले हुए थे। ऐसे में, बधाई और जश्न तो स्वाभाविक है, पर यदि हम इस मौके पर खुद से कुछ महत्वपूर्ण सवाल नहीं पूछते, तो सुरंग में फंसे रहे इन मजदूरों के साथ-साथ हिमालयी क्षेत्र में कहीं भी ढांचागत परियोजनाओं पर काम करने वाले अन्य श्रमिकों का जीवन विफल कर देंगे, क्योंकि अब स्पष्ट हो गया है कि इस क्षेत्र में सुरंग बनाना बहुत मुश्किल है। यह सुरंग केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के चार पवित्र धामों को जोड़ने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार की 900 किलोमीटर की चार धाम राजमार्ग परियोजना का हिस्सा है, जिस पर वर्ष 2018 में काम शुरू हुआ था। आधिकारिक बयान में स्पष्ट कहा गया था कि ‘परियोजना का लक्ष्य उत्तराखंड राज्य में धरासु-यमुनोत्री पर निकास मार्ग के साथ 4.531 किलोमीटर लंबी दो-लेन की दोतरफा सुरंग (328 मीटर पहुंच सड़क के साथ) का निर्माण करना है।’

बेशक फंसे हुए मजदूर बाहर निकल आए हैं, फिर भी हमें यह पूछना चाहिए कि वह निकास मार्ग कहां है? यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अगर निकास मार्ग होता, तो बहुत सारी चिंताओं से बचा जा सकता था। अभी तक इस बात को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है कि निकास मार्ग क्यों नहीं बनाया गया।

बुनियादी ढांचों का विकास महत्वपूर्ण है, लेकिन सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। हम जानते हैं कि नियमों और विनियमों के बावजूद, देश भर में अक्सर सुरक्षा मानदंडों का उल्लंघन किया जाता है। विशेषज्ञों की रिपोर्टें हमें बताती हैं कि यह क्षेत्र पारिस्थितिक दृष्टि से बेहद नाजुक है और भूकंपीय क्षेत्र में स्थित है। इसलिए यह सुनिश्चित करना राष्ट्रीय हित में है कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में ऐसी आपदा दोबारा न हो। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि पूरा हिमालयी क्षेत्र उच्च-सतर्कता वाला, भूकंप के भारी जोखिम वाला और जलवायु परिवर्तन के प्रमुख केंद्रों में से एक है, इसलिए यहां पर उसी के अनुसार विकास कार्यों को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। इसका मतलब है कि इस क्षेत्र में चरम मौसमी घटनाएं होती हैं और दोबारा भी हो सकती हैं। हाल के समय में हमने हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम में बार-बार आपदाएं देखी हैं।

अब हमें इस क्षेत्र की सभी बुनियादी ढांचों की समीक्षा करनी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हमारे सुरक्षा मानदंड अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानदंडों के अनुरूप हों। हमें पर्यावरण संबंधी चिंताओं को ध्यान में रखना चाहिए। अन्यथा, लोगों और संसाधनों के लिए बार-बार जोखिम पैदा होंगे।

हिमालयी क्षेत्र किसी अन्य पहाड़ी इलाके की तरह नहीं है। हिमालय इस धरती पर सबसे युवा पर्वत है। यह बेहद नाजुक इलाका है, जहां भूस्खलन आम बात है। सरकार ने स्वयं संसद में बताया है कि हिमालय के कई हिस्सों में भौगोलिक स्थिति अस्थिर और गतिशील है। इसका मतलब है कि इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचों के निर्माण का कार्य बेहद सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए। हमें उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्र के अन्य सभी राज्यों में सभी नई एवं निर्माणाधीन परियोजनाओं की ‘सुरक्षा ऑडिट’ करने की जरूरत है। हमें ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए, जिससे जीवन खतरे में पड़े। सुरक्षा को ध्यान में रखने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है। यह हादसा हमारे लिए एक अवसर होना चाहिए कि हम उन बुनियादी ढांचों की समीक्षा करें, जिनके निर्माण की कोशिश कर रहे हैं।

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