संसद में भाषण के नियमों के बारे में कितना जानते हैं आप !

क्या है कार्य मंत्रणा समिति, जो तय करती है संसद में किस विषय पर कितनी देर होगी चर्चा
भारत की संसद में चर्चा के लिए समय का निर्धारण एक महत्वपूर्ण और संगठित प्रक्रिया है संसद में कौन से मुद्दे पर कितनी देर तक बहस होगी, यह कई प्रमुख संस्थाओं और व्यक्तियों द्वारा तय किया जाता है.

पिछले सप्ताह लोकसभा में बहस के दौरान कांग्रेस सासंद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कुल 45 मिनट तक अपना भाषण दिया था. जबकि मनोज झा और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह उसी सदन में केवल 7 मिनट तक बोल पाए थे.  

अब आते हैं कि 1 अगस्त को चल रहे राज्यसभा मानसून सेशन की कार्यवाही पर, इस दौरान उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने मनोज कुमार झा का नाम लेते हुए उनके नाम के आगे, 5 मिनट कहा. जिसके जवाब में आरजेडी सांसद मनोज झा ने भी बड़े ही मजाकिया अंदाज में उपसभापति से कहा कि जब आप नाम के साथ 5 मिनट या 3 मिनट बोलते हैं तो लगता है कि मानों फांसी देने से पहले अंतिम इच्छा पूछी जा रही है.

ऐसे में एक सवाल ये उठता है कि क्या संसद में सभी नेताओं के बोलने का समय पहले से ही निर्धारित रहता है, अगर हां तो राहुल गांधी जैसे नेता को 45 मिनट और संजय सिंह को 5 मिनट क्यों मिलते हैं. इस रिपोर्ट में ऐसे सभी जरूरी सवालों के जवाब जानेंगे…

तय किए जाते हैं मुद्दे 

भारत की संसद में चर्चा के लिए समय का निर्धारण एक महत्वपूर्ण और संगठित प्रक्रिया है संसद में कौन से मुद्दे पर कितनी देर तक बहस होगी, यह कई प्रमुख संस्थाओं और व्यक्तियों द्वारा तय किया जाता है. संसद की कार्यवाही को सही तरीके से संचालन के लिए यह जरूरी भी है कि अलग अलग  मुद्दों पर चर्चा के लिए समय का सही और न्यायसंगत आवंटन हो. 

इस प्रक्रिया में मुख्य भूमिका कार्य मंत्रणा समिति की होती है, जो सदन की कार्यसूची तय करती है. लोकसभा में अध्यक्ष और राज्यसभा में सभापति या उपसभापति इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इसके अलावा, सरकार के प्रतिनिधि, विशेष रूप से संसदीय कार्य मंत्री, भी चर्चा के लिए समय का प्रस्ताव रखते हैं और समन्वय करते हैं. संसद के सदस्य भी अपनी प्राथमिकताओं और सुझावों के जरिये इस प्रक्रिया में योगदान देते हैं. 

क्या है ये कार्य मंत्रणा समिति, जो करती में चर्चा का विषय तय 

कार्य मंत्रणा समिति को बिजनेस एडवाइजरी कमेटी (BAC) भी कहते हैं,  BAC का गठन पहली बार 14 जुलाई, 1952 को किया गया था. यह संसद की एक महत्वपूर्ण समिति होती है जो दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में कामकाज के समय और चर्चा की योजना बनाने का काम करती है. इस समिति का मुख्य उद्देश्य संसद की कार्यवाही को सुचारू और व्यवस्थित ढंग से चलाना है. तीन प्वाइंट में विस्तार से समझते हैं कार्य मंत्रणा समिति का मुख्य काम.

क्या है कार्य मंत्रणा समिति, जो तय करती है संसद में किस विषय पर कितनी देर होगी चर्चा

गठन और सदस्यता

लोकसभा और राज्यसभा में अलग-अलग कार्य मंत्रणा समितियाँ होती हैं. लोकसभा की कार्य मंत्रणा समिति का अध्यक्ष लोकसभा का अध्यक्ष होता है, जबकि राज्यसभा की कार्य मंत्रणा समिति का अध्यक्ष राज्यसभा का सभापति होते है. इसके अलावा इस समिति के बाकी सदस्य आम तौर पर अलग अलग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि होते हैं, ताकि इस समिति में अलग अलग दलों की भागीदारी सुनिश्चित की जा सके.

क्या है समिति का मुख्य कार्य

इस समिति का गठन ही इसलिए किया गया था ताकि यह समिति संसद के कामकाज का निर्धारण करना और विभिन्न विधेयकों, प्रस्तावों और मुद्दों पर चर्चा के लिए समय आवंटित करने पर काम कर सके. इसके अलावा संसद की कार्यसूची तैयार करना और इसे सदन में प्रस्तुत करना, अलग अलग मुद्दों पर चर्चा के लिए समय सीमा तय करना भी इसी समिति का काम है ताकि सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चले और सभी महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हो सके. 

कितना महत्वपूर्ण है कार्यमंत्रणा समिति

कार्य मंत्रणा समिति संसद के सुचारू संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. यह समिति सुनिश्चित करती है कि संसद में मौजूद समय का अधिकतम और न्यायसंगत उपयोग किया जा सके. इसके अलावा इस समिति के जरिये अलग अलग राजनीतिक दलों के बीच समन्वय और सहयोग सुनिश्चित होता है.

कैसे हुई इस कमिटी शुरुआत 

भारत में लोकसभा के पहले अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर ने पहली बार साल 1951 में सुझाव दिया कि सदन के काम को सही ढंग से और सही समय से करवाने के लिए एक जिम्मेदार कमेटी का होना बेहद जरूरी है. जो काम ही इन्हीं मु्द्दों पर करे.

गणेश वासुदेव मावलंकर ने 28 मार्च 1951 को सदन के नेता को पत्र लिखकर अपनी चिंता जाहिर की. उन्होंने पत्र में लिखा कि हमारे पास सदन में आर्थिक मामले छोड़ दिया जाए तो दूसरे किसी भी मामलों को तय करने की कोई प्रक्रिया नहीं है. उन्होंने कहा कि तय प्रक्रिया के नहीं होने के चलते ही कई बार बहस के दौरान समापन प्रस्ताव आ जाता है और आखिर वक्त में जब कोई संसद सदस्य अपना सवाल रख देते हैं, तो अध्यक्ष को प्रश्न स्वीकार करना ही पड़ता है. 

उन्होंने इस पत्र में लिखा कि भविष्य में भी इस समस्या का समाधान नहीं मिलने पर अध्यक्षों के लिए ये बहुत ही संवेदनशील स्थिति बन सकती है. मेरा मानना है कि इस तरह के काम के लिए हमें एक संचालन समिति बनानी चाहिये और उन्हें ये काम सौंप देना चाहिए. पहले लोकसभा अध्यक्ष के इस पत्र पर विचार करने के बाद सदन ने इसे स्वीकार कर लिया. 

सदन में भाषण के लिए किस नेता को कितना समय दिया जाएगा ये कैसे तय होता है

संसद के नियमों के अनुसार सदन में चर्चा का समय बांटने के लिए 4 कैटेगरी तैयार की गई है. आसान भाषा में समझें तो अगर सदन में किसी विषय पर BAC बहस के लिए कुल 60 मिनट का समय तय किया है, तो पार्टियों के बीच किसे कितना बोलने देने का समय देना चाहिये इसका बंटवारा उनके पार्टियों के संख्याबल के अनुसार किया जाता है.

लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के पास कुल 240 सीटों हैं यानी 44.20% हिस्सेदारी. जबकि कांग्रेस के पास 99 सीटें यानी 18.23  प्रतिशत हिस्सेदारी है. इस हिसाब से बहस के कुल 60 मिनट में से भारतीय जनता पार्टी को 46 मिनट और कांग्रेस को 19 मिनट दिए जाएंगे.

क्या है कार्य मंत्रणा समिति, जो तय करती है संसद में किस विषय पर कितनी देर होगी चर्चा

कौन नेता कितने देर भाषण देगा ये भी तय 

सदन की शुरुआत से पहले ही स्पीकर BAC की सलाह के आधार पर किन पार्टियों के नेताओं को बहस के लिए कितना समय दिया जाएगा इसकी जानकारी दे देते हैं. इसके बाद उस पार्टी के अध्यक्ष अपने दिए गए समय में किस नेता को कितने देर बोलने का मौका देना ये तय करते हैं और उन्हें जो टाइम अलॉट किया गया है वो उसी समय में अपनी बातें रखते हैं. 

कभी कभी ऐसे भी होता है कि किसी पार्टी का एक ही सदस्य उस पूरे समय में बोले, वहीं कभी कभी उसी समय में एक पार्टी के 2-3 नेता बोलते हैं. यही कारण है कि कभी कभी किसी एक नेता को 45 मिनट तक भाषण देने का मौका मिल जाता है तो कभी केवल 5 मिनट ही. 

नेताओं को अलॉट समय खत्म होने से ज्यादा बोलने पर क्या होता है 

वैसे तो समय को लेकर कोई हार्डकोर रूल नहीं है. लेकिन कई बार स्पीकर अपने विवेक के अनुसार भाषण के समय को बढ़ा भी सकते हैं. आसान भाषा में समझें तो सदन और विषय की गंभीरता को देखते हुए अगर स्पीकर को ऐसा लगता है कि किसी नेता या सांसद को अलॉट किए गए समय से ज्यदा बोलने का मौका देना चाहिये तो वह उसे समय खत्म होने के बाद भी बोलने देते हैं. 

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