वैश्विक एजेंडे को तय करता भारत, दुनिया विभिन्न मुद्दों पर हमारे दृष्टिकोण को जानना चाहती है
इस समय विश्व में बहुपक्षीयता का दायरा सिकुड़ रहा है और एक नए वैकल्पिक नेतृत्व की गुंजाइश बन रही है। अमेरिका अपनी भूमिकाओं एवं दायित्व से किनारा कर रहा है तो चीन को लेकर दुनिया सदैव सशंकित रहती है।ऐसी स्थिति में भारत एक स्वाभाविक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभर सकता है। स्पष्ट है कि इन स्थितियों में रायसीना डायलाग जैसे मंच की महत्ता भी समय के साथ और बढ़ती जाएगी।
…. गत सप्ताह रायसीना डायलॉग आयोजन का एक दशक पूरा हुआ। इन दस वर्षों के दौरान रायसीना डायलॉग अंतरराष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर भारत के दृष्टिकोण और वैश्विक मुद्दों पर मंथन के एक सार्थक मंच के रूप में स्थापित हुआ है। रायसीना डायलॉग में राष्ट्र प्रमुख, मंत्री, राजनयिक, अकादमिक और मीडिया जैसे विभिन्न हितधारकों की सक्रिय सहभागिता होती है।
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन और विदेश मंत्रालय के इस संयुक्त आयोजन में इस बार 130 से अधिक देशों के 3,500 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने भाग लिया। न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ संयुक्त रूप से रायसीना डायलॉग के दसवें संस्करण का उद्घाटन किया।
इस दौरान वर्तमान भू-राजनीतिक एवं भू-आर्थिक समीकरणों को देखते हुए विभिन्न वैश्विक मुद्दों पर बेहतर समन्वय के लिए संभावित विकल्पों पर मंत्रणा की गई। इसमें कोई संदेह नहीं कि हाल के समय में वैश्विक समीकरण बहुत तेजी से बदले हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वापसी ने इन बदलावों की गति और बढ़ा दी है।
इसे देखते हुए तमाम देशों को अपनी नीतियों की समीक्षा कर नए बन रहे हालात के अनुरूप अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है। इस परिवर्तन की गति इतनी तेज है कि यदि वर्तमान को रणनीतिक पुनर्संयोजन का दौर कह दिया जाए तो यह गलत नहीं होगा। इन परिस्थितियों की छाप रायसीना डायलॉग के विभिन्न सत्रों पर भी देखी गई।
रायसीना डायलॉग में शामिल हुए वैश्विक हितधारकों ने मौजूदा हालात में अपनी नैया पार लगाने के लिए संभावित एजेंडा सामने रखा। इसमें सबसे प्रमुख चर्चा तो वैश्विक संस्थानों की उपादेयता एवं प्रासंगिकता से जुड़ी रही है। रायसीना डायलॉग में चर्चा हुई कि अपने अस्तित्व के संकट के जूझ रहे कई वैश्विक संस्थानों को यदि खुद को प्रासंगिक बनाए रखना है तो उन्हें अपना रुख-रवैया बदलना होगा।
जिस समय और परिस्थितियों के अनुसार इन संस्थानों की स्थापना हुई थी तबसे अब तक दुनिया काफी बदल चुकी है, लेकिन ये संस्थान उस अनुपात में स्वयं को परिवर्तित नहीं कर पाए हैं, जिससे उन पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिन समस्याओं के समाधान के लिए इनकी स्थापना हुई थी, ये उस दायित्व की पूर्ति के निर्वहन में निरंतर नाकाम हो रहे हैं।
यह किसी से छिपा नहीं कि संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता और महत्ता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के साथ अन्य अनेक वैश्विक संस्थान भी अपना प्रभाव खोते दिख रहे हैं। सहभागियों में ऐसे संस्थानों के कायाकल्प को लेकर व्यापक सहमति बनी।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान कोविड महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के हिंसक टकराव और ट्रंप की वापसी ने वैश्विक परिदृश्य पर खासी हलचल मचाई है। इससे उपजी परिस्थितियों पर भी रायसीना डायलॉग में समग्रता में संज्ञान लिया गया।
इस दौरान वैश्विक आपूर्ति शृंखला को लचीला एवं भरोसमंद बनाने पर विस्तार से संवाद हुआ। बदली हुई परिस्थितियों में वैश्विक व्यापार को सुगम बनाने एवं उसमें अनिश्चितता दूर करने को लेकर भी सुझाव सामने आए। विकास के नए ढांचे और उसे मूर्त रूप देने के मुद्दे पर भी चर्चा हुई।
अस्थिरता एवं अशांति के दौर से गुजर रही दुनिया में शांति की आकांक्षा को महसूस करते हुए उससे संबंधित विकल्प भी सुझाए गए। इस प्रकार एक भारतीय पहल होने के बावजूद वैश्विक एजेंडे को दिशा देने में रायसीना डायलॉग अपनी सार्थक भूमिका निभाता दिख रहा है।
चूंकि न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री इस आयोजन के विशेष अतिथि रहे, इसलिए इस मंच से इतर द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा होना भी उनकी यात्रा के एजेंडे में शामिल था। दोनों देशों ने इन संबंधों को प्रगाढ़ बनाने की दिशा में प्रतिबद्धता व्यक्त की और परस्पर लाभ के लिए प्रयासरत रहने का संकल्प लिया।
बदलते वैश्विक समीकरणों में दोनों देशों ने मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में वार्ता आरंभ कर दी है और आशा है कि जल्द ही इसे मूर्त रूप भी दे दिया जाएगा। न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री ने दोनों देशों के दो शताब्दियों पुराने संबंधों का उल्लेख करते हुए उन्हें 21वीं सदी के अनुरूप आकार देने का खाका भी पेश किया। संबंधों की कड़ियों को और मजबूत करने वाले पहलुओं को चिह्नित कर उन्हें और मजबूत करने पर ध्यान दिया जाएगा।
उन्होंने न्यूजीलैंड में भारतवंशियों के योगदान से लेकर क्रिकेट के साथ दोनों देशों के लगाव और उसे संबंधों में जुड़ाव की अहम कड़ी के रूप में रेखांकित किया। आर्थिक एवं व्यापारिक संबंधों के अतिरिक्त सामरिक मोर्चे पर भी दोनों देश मिलजुल कर काम करेंगे और हिंद-प्रशांत क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जैसे-जैसे भारत का कद एवं प्रतिष्ठा बढ़ रही है वैसे-वैसे रायसीना डायलॉग जैसे मंच की महत्ता भी बढ़ती जा रही है। पिछले दस वर्षों का सिंहावलोकन करें तो इस मंच से विश्व में भारत के दृष्टिकोण को मुखरता से सामने रखा गया है। वैश्विक मामलों में भारत की बात सुने जाने का जो सिलसिला बढ़ा है, वह यही रेखांकित करता है कि दुनिया विभिन्न मुद्दों पर उसके दृष्टिकोण से भी परिचित होना चाहती है।
अपनी आर्थिक, सामरिक एवं राजनीतिक ताकत के दम पर आत्मविश्वास से ओतप्रोत होते भारत को अंतरराष्ट्रीय फलक पर अपने अनुकूल नैरेटिव बनाने में भी इस मंच ने प्रभावी भूमिका निभाई है। भारत जिस प्रकार वसुधैव कुटुंबकम् एवं विश्व कल्याण के आधारभूत मूल्यों की बात करता है तो रायसीना डायलॉग के एजेंडा में भी इन मूल्यों का आदर्श रूप में समावेश होता रहा है।
इस समय विश्व में बहुपक्षीयता का दायरा सिकुड़ रहा है और एक नए वैकल्पिक नेतृत्व की गुंजाइश बन रही है। अमेरिका अपनी भूमिकाओं एवं दायित्व से किनारा कर रहा है तो चीन को लेकर दुनिया सदैव सशंकित रहती है। ऐसी स्थिति में भारत एक स्वाभाविक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभर सकता है। स्पष्ट है कि इन स्थितियों में रायसीना डायलॉग जैसे मंच की महत्ता भी समय के साथ और बढ़ती जाएगी।
(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में उपाध्यक्ष हैं)