नई दिल्ली। बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को ऐतिहासिक जीत मिलती हुई नजर आ रही है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस एक एक बार फिर बुरी तरह से ध्वस्त हो गई। देश की सबसे पुरानी पार्टी दिल्ली में अपना सूपड़ा साफ करवाने के महज नौ महीने बाद फिर पिछड़ती हुई नजर आ रही है।

कांग्रेस के लिए ये चुनाव नतीजे अब तक के सबसे बुरे परिणामों में से रहा। कांग्रेस को भाजपा के साथ जनता दल और चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के हाथों भी सीटें गंवानी पड़ीं।

चुनाव आयोग के शाम 7 बजे तक के आंकड़ों के अनुसार अब तक कांग्रेस ने केवल किशनगंज सीट जीती है, जहां उसने पूर्व AIMIM नेता कमरुल होदा ने हराया है। वह पांच अन्य सीटों – वाल्मीकि नगर, चनपटिया, फारबिसगंज, अररिया और मनिहार पर आगे चल रही है।

कांग्रेस की इतनी बुरी हार की वजह

कांग्रेस की इतनी करारी हार की सबसे बड़ी वजह चुनाव प्रचार के दौरान वोटर्स से दूरी को बताया जा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी लंबे समय तक प्रचार से दूर रहे। शुरुआत में उन्होंने भले ही ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ से माहौल बनाया, लेकिन उसके खत्म होने के बाद वो बिहार से नदारद रहे। वोटर्स न केवल उनकी अनुपस्थिति बल्कि बिहार को किसी भी तरह की विकास देने वाली योजना के अभाव से निराश होकर, भाजपा की ओर मुड़ गए।

भाजपा ने कैसे बनाई वोटर्स के दिल में जगह?

जहां एक ओर राहुल गांधी चुनाव से गायब रहे, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी की बिहार में एक के बाद एक ताबड़तोड़ रैलियां हुईं। पीएम मोदी ने यहां14 रैलियां और सात दौरे किए। इस दौरान अमित शाह पर्दे के पीछे से अपना रोल निभाते रहे। बिहार में योगी आदित्यनाथ ने एक दर्जन से ज्यादा भाषण दिए।

महागठबंधन में कहां आई कमी?

जब चुनाव प्रचार में भाजपा ने अपने बड़े हथियार चलाए तो महागठबंधन के दोनों अहम नेता तेजस्वी यादव और राहुल गांधी को एक साथ मंच पर दिखने की जरूरत थी, कांग्रेस ने इस पर प्रतिक्रिया देने में देरी की। पहले चरण के मतदान से एक हफ्ते पहले 29 अक्टूबर तक दोनों नेता एक ही मंच पर नहीं दिखे। यही वजह थी कि बिहार में महागठबंधन को इतनी करारी हार के साथ कांग्रेस को अब तक के सबसे बुरे नतीजों का सामना करना पड़ा।