दिल्ली

सबसे छोटे शीतकालीन सत्र की कुछ रोचक झलकियां!!!

सबसे छोटे शीतकालीन सत्र की कुछ रोचक झलकियां

जब आप ये पंक्तियां पढ़ रहे होंगे, भारत के संसदीय इतिहास का सबसे छोटा शीतकालीन सत्र अपने समापन की ओर अग्रसर हो रहा होगा। ऐसे में पेश हैं मेरी संसदीय डायरी से कुछ संक्षिप्त टिप्पणियां।सर्वदलीय बैठक : हर सत्र से पहले सरकार द्वारा सर्वदलीय बैठक बुलाने की परम्परा है। इस बार 36 दलों के फ्लोर नेताओं ने इसमें हिस्सा लिया।

भाजपा को छोड़ हर दल ने हस्तक्षेप करते हुए उन मुख्य मुद्दों की सूची रखी, जिन पर वे सत्र के दौरान चर्चा चाहते थे। बैठक में मौजूद पांच मंत्रियों ने सुबह 11 बजे सभी प्रतिनिधियों का स्वागत किया। दोपहर 1:30 बजे उन्होंने शालीनता से सभी का धन्यवाद किया और विदा ले ली। तो सरकार ने बैठक में क्या कहा? वही बहुचर्चित वाक्य- ‘हम आपसे शीघ्र ही सम्पर्क करेंगे!’

सभापति का अभिनंदन : सत्र के पहले दिन नवनियुक्त राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन का सभी दलों के सांसदों ने स्वागत किया। उनमें से कुछ ने अपने औपचारिक भाषणों का उपयोग राजनीतिक संकेत देने के लिए भी किया। यह स्तम्भकार भी उनमें शामिल था।

नए सभापति से आग्रह किया गया कि : (1) सदन की बैठकों की संख्या बढ़ाई जाए; पहली लोकसभा 45 दिनों तक चली थी, आज हालत यह है कि सत्र महज 15 दिनों का रह गया है; (2) राज्यसभा में चर्चा के लिए अधिक नोटिस स्वीकारे जाएं; 2009 से 2016 के बीच जहां 110 नोटिस स्वीकार हुए, वहीं 2017 से 2024 के बीच यह संख्या गिरकर 36 रह गई; (3) विधेयकों की गंभीर जांच हो; 15वीं लोकसभा में दस में से सात विधेयक संसदीय समितियों के पास भेजे गए थे, जबकि 16वीं और 17वीं लोकसभा (2019-24) में यह अनुपात घटकर क्रमशः तीन और दो रह गया।

इनोवेटिव विरोध : सामान्य तौर पर सांसद मकर द्वार पर विरोध-प्रदर्शन करते हैं। लेकिन टीएमसी ने इस परम्परा में थोड़ा बदलाव किया। पूरे सप्ताह विरोध अलग-अलग स्थानों पर दर्ज कराया गया- गांधीजी की प्रतिमा के पास (जो अब मुख्य इमारत से काफी दूर कर दी गई है), विजय चौक के लॉन और पुराने संसद भवन की सीढ़ियों पर।

हालांकि प्रधानमंत्री द्वारा बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को ‘बंकिम-दा’ कहे जाने के विरोध के लिए टीएमसी ने एक बिल्कुल अलग स्थान चुना। सांसदों ने सेंट्रल हॉल में दस मिनट मौन धरना दिया। उनके हाथों में राष्ट्रीय गीत के रचयिता बंकिम चंद्र और राष्ट्रगान के रचयिता रबीन्द्रनाथ ठाकुर की तस्वीरें थीं। संदेश स्पष्ट था और प्रतीकात्मकता प्रभावशाली!

सदन में क्रिकेटर : कीर्ति आजाद और यूसुफ पठान की सदन में उपस्थिति ठीक-ठाक रही है। लेकिन इस सत्र में ‘आप’ के राज्यसभा सांसद हरभजन सिंह को संसद की पिच पर खेलते नहीं देखा गया। सवाल है कि क्या वे संसद में कम उपस्थिति के मामले में सचिन तेंदुलकर का रिकॉर्ड तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं?

“ध्यानाकर्षण’ मंजूर नहीं : ध्यानाकर्षण प्रस्ताव संसद की एक अहम युक्ति है, जिसके जरिए विपक्ष का कोई सदस्य किसी विशेष मुद्दे पर मंत्री का ध्यान आकर्षित कर सकता है। इससे विपक्ष को किसी महत्वपूर्ण विषय पर संक्षिप्त बहस शुरू करने और सरकार को जवाबदेह ठहराने का अवसर मिलता है। लेकिन एक बार फिर, न लोकसभा और न ही राज्यसभा में एक भी ध्यानाकर्षण प्रस्ताव स्वीकार किया गया।

नड्डा से सबक : संसदीय परम्परा के अनुसार जब कोई मंत्री बोल रहा हो और विपक्ष का कोई सदस्य बीच में हस्तक्षेप करना चाहे, तो मंत्री अपनी बात रोकता है और बैठ जाता है, ताकि सांसद अपनी बात रख सके। राज्यसभा में जेपी नड्डा को भाषण के दौरान दो बार विपक्षी सांसदों को हस्तक्षेप की अनुमति देते देखना सुखद रहा। यह अच्छी परम्परा है। गृह मंत्री अमित शाह चाहें तो इस मामले में नड्डा से सीख सकते हैं!

छात्रों से भेंट : सत्र के दौरान ही इस स्तम्भकार को संसद में तमिलनाडु और झारखंड से आए छात्रों के एक समूह से मिलने का अवसर मिला। उनके लिए टूर गाइड बनना अपने आप में बेहद सुखद अनुभव था। ऐतिहासिक सेंट्रल हॉल उनका सबसे पसंदीदा स्थान निकला।

एक छात्रा इस अनुभव से इतनी भावुक हो गई कि उसकी आंखों में आंसू आ गए। अधिक से अधिक युवाओं को सेंट्रल हॉल आकर इस विशिष्ट स्थल का अनुभव लेना चाहिए, जिसे अब लगभग किसी म्यूजियम में बदल दिया गया है!

पुनश्च : इस साल अप्रैल में मणिपुर में राष्ट्रपति शासन की घोषणा पर रात 1 बजे चर्चा हुई थी। बीती रात भी ‘मर्डर ऑफ मनरेगा बिल’ विषय पर रात 2 बजे तक चर्चा चली। रतजगों से इस लगाव की भी अपनी संगीन वजहें हैं!

सदन की बैठकों की संख्या बढ़ाई जाए; पहली लोकसभा 45 दिनों तक चली थी, आज हालत यह है कि सत्र महज 15 दिनों का रह गया है। साथ ही राज्यसभा में चर्चा के लिए अधिक नोटिस स्वीकारे जाएं और विधेयकों की गंभीर जांच हो।

 

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