जानते हैं अपराधी आपसे अधिक तेजी से एआई सीख रहे हैं!
जी हां, एआई के इस्तेमाल में अपराधी हम रोजमर्रा की चीजों में व्यस्त रहने वाले अधिकतर लोगों से कहीं आगे हैं। मैं आपको दो हफ्ते पहले का एक वाकिया बताता हूं, जो मैंने जयपुर एयरपोर्ट के ग्राउंड फ्लोर पर ‘ब्राउन शुगर’ नाम की एक छोटी कॉफी शॉप के सामने खड़े होकर देखा।
एक बुजुर्ग व्यक्ति ने 500 एमएल पानी की बोतल मांगी। दुकानदार ने 70 रुपए मांगे, ग्राहक ने 100 का नोट दिया। दुकानदार के पास 30 रुपए नहीं थे तो उसने ऑनलाइन पेमेंट करने को कहा। ग्राहक ने मना किया और क्रेडिट कार्ड से भुगतान किया।
वह बोले कि ‘चूंकि दुनिया में फिशिंग और दूसरे स्कैम्स बहुत ज्यादा और आसान हो रहे हैं तो मैं कोई ऑनलाइन पेमेंट नहीं करता। यही मेरी मेहनत की कमाई बचाने का तरीका है। सफर में तो मैं डेबिट कार्ड तक नहीं रखता।’
वह सही था या नहीं, यह बहस का मुद्दा हो सकता है। लेकिन सच यह है कि भरोसेमंद, समझने योग्य और नियंत्रित एआई सिस्टम बनाने वाली एंथ्रोपिक, ओपनएआई, अमेजन और गूगल जैसी बड़ी कंपनियां भी मानती हैं कि साइबर अपराधी बड़ी फिशिंग योजनाएं, मालवेयर बनाने और अन्य साइबर हमलों के लिए उनकी तकनीक इस्तेमाल कर रहे हैं।
कार्नेगी मेलॉन यूनिवर्सिटी के पीएचडी शोधार्थी ब्रायन सिंगर कहते हैं कि दुनिया भर के स्पैम और फिशिंग का आधे से लेकर तीन चौथाई तक हिस्सा एआई से जनरेट किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि टॉप कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव्स के डीप-फेक ऑडियो और वीडियो बनाने के लिए भी ऐसे ही एआई टूल्स इस्तेमाल किए जा रहे हैं, ताकि बेखबर कर्मचारियों से जानकारी निकाली जा सके। एंथ्रोपिक ने स्वीकार किया है कि उसने ऐसे कई मामलों को रोका है, जिनमें थोड़ी-सी तकनीकी समझ वाले अपराधी भी रैनसमवेयर बनाने के लिए उसके एआई क्लॉड का इस्तेमाल कर रहे थे।
इसीलिए शुरू में मैंने कहा था कि एआई साइबर अपराधियों को ज्यादा कुशल बना रहा है, ताकि वे अपनी कारगुजारियों को और बढ़ा सकें। एयरपोर्ट वाले ग्राहक एक बात पर बिल्कुल सही थे- ‘साइबर धोखाधड़ी अब ज्यादा व्यापक, लक्षित और भरोसेमंद हो चुकी है।’
गूगल थ्रेट इंटेलिजेंस ग्रुप के चीफ एनालिस्ट जॉन हल्टक्विस्ट मानते हैं कि अपराधी शिकार बन सकने वाले लोगों को पहचानने में बेहतर हो रहे हैं। मसलन, वे एआई के जरिए सोशल मीडिया स्कैन कर ऐसे लोगों की पहचान कर रहे हैं, जिनकी नौकरी छूटी हो, तलाक हुआ हो या परिवार में किसी की मौत हुई हो, ताकि उन्हें जॉब, रोमांस या इन्वेस्टमेंट संबंधी धोखाधड़ी में फंसा सकें।
सोच रहे हैं कि वे यह कैसे कर रहे हैं? वाइब-कोडिंग या वाइब-हैकिंग एक नया चलन है, जिसमें कोई संभावित साइबर अपराधी डार्क वेब से खरीदने के बजाय खुद एआई के जरिए अपना प्रोग्राम तैयार कर सकता है। डार्क वेब विशेष सॉफ्टवेयर के जरिए इस्तेमाल हो सकने वाला इंटरनेट का वह गुप्त हिस्सा है, जो एन्क्रिप्टेड नेटवर्क के जरिए गुमनाम पहचान देता है और यह अवैध गतिविधियों के लिए बदनाम है।
सवाल यह है कि क्या हमें अपनी सुरक्षा के तरीके बदलने चाहिए? जब एआई कंपनियां खुद की सुरक्षा मजबूत करने के लिए ऐसी ही तकनीक इस्तेमाल कर रही हैं, तो मोबाइल, कम्प्यूटर इस्तेमाल कर रहे हम जैसे आम लोगों के लिए थोड़ी सी शंका और अच्छा ऑनलाइन अनुशासन सबसे बेहतर बचाव हो सकता है।
भेजने वाले की पहचान सत्यापित किए बिना कभी कोई अटैचमेंट ना खोलें। विशेषज्ञ कहते हैं कि मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन बेहद प्रभावी है। और अगर आपको पैसा ट्रांसफर करने या कोई बिल भरने के लिए बॉस या किसी परिजन का वॉयसमेल, ऑडियो-वीडियों कॉल आए तो तत्काल कॉल काटें और उन्हें दोबारा कॉल करें। दो बार सुनिश्चित करें कि क्या वह सही है।
….. जब पैसे की बात आए तो इसकी चिंता ना करें कि आपके तकनीक इस्तेमाल न कर पाने पर दुनिया क्या सोचेगी। पैसे से जुड़ी हर चीज पर संदेह रखिए और अपनी कमाई की हिफाजत कीजिए।

