मध्य प्रदेश

10 साल की मिन्नतें…5 माह की खुशियां मातम बन गईं…मौत के लिए इंदौर नगर निगम जिम्मेदार !!!

10 साल की मिन्नतें…5 माह की खुशियां मातम बन गईं
मां बोली- अनजाने में खुद उसे जहर पिलाती रही; मौत के लिए इंदौर नगर निगम जिम्मेदार

मेरा 5 महीने का बेटा चला गया, ये उसका बलिदान ही है कि अब नई पाइपलाइन लग रही है। दिल में सुकून बस ये है कि जो काम कई सालों से नहीं हुआ था, उसकी मौत के बाद शुरू हो गया। मेरा बेटा मरकर अमर हो गया। मैं चाहती हूं कि जो मेरे साथ हुआ, वो दुनिया की किसी और मां के साथ न हो।

ये कहते हुए साधना साहू की आवाज लड़खड़ा गई। हालांकि, उनकी बातचीत में एक अजीब सा सुकून भी दिखा। सुकून इस बात का कि उनके बेटे की कुर्बानी ने शायद सैकड़ों और जिंदगियों को बचा लिया। दरअसल, इंदौर की भागीरथपुरा जल त्रासदी में 5 महीने के अव्यान की मौत हो गई। अव्यान को उसकी मां साधना न जानते हुए जहरीला पानी मिला दूध देती थी।

वो उल्टी दस्त का शिकार हुआ और दो दिन में ही चल बसा। अव्यान की मौत के बाद भास्कर ने साधना से बात कर समझा कि वो इस पूरी त्रासदी के लिए किसे जिम्मेदार मानती हैं। बता दें कि भागीरथपुरा में 23 लोगों की मौत हो चुकी है। अब वहां तेजी से पाइपलाइन बिछाने का काम चल रहा है। इस विकास की कीमत 5 महीने के अव्यान ने भी अपनी जान देकर चुकाई है। पढ़िए रिपोर्ट…

भागीरथपुरा में रहने वाली साधना अपने बेटे की तस्वीर देखकर फफक पड़ती हैं।
भागीरथपुरा में रहने वाली साधना अपने बेटे की तस्वीर देखकर फफक पड़ती हैं।

दस साल की मन्नतें और 5 महीने की खुशियां

अव्यान का जन्म साहू परिवार के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था। बहन के जन्म के 10 साल बाद, अनगिनत मन्नतों और प्रार्थनाओं के बाद घर में किलकारी गूंजी थी। वह सिर्फ अपने माता-पिता का नहीं, बल्कि अपने दादा और नाना के खानदान का भी इकलौता चिराग था।

अगस्त महीने में रक्षाबंधन के दिन जब अव्यान अस्पताल से घर आया, तो परिवार ने उसका ऐसा स्वागत किया जैसे कोई राजा आया हो। वह सिर्फ परिवार का ही नहीं, पड़ोसियों की आंखों का भी तारा बन गया था। मां साधना हर महीने की 8 तारीख को उसका जन्मदिन मनातीं। हर महीने एक नई तस्वीर खींचती, ताकि बड़ा होकर उसे दिखा सकें कि उसका बचपन कैसे सहेजा गया था।

जन्माष्टमी पर जब वह महज 3 महीने का था, तो मां ने उसे कान्हा के कपड़े पहनाए थे। उन तस्वीरों को देखकर आज साधना फफक पड़ती हैं। पॉलिटिकल साइंस में एमए और बीएड कर चुकीं साधना एक कॉन्वेंट स्कूल में टीचर थीं, लेकिन बेटे के जन्म से पहले डॉक्टर ने बेड रेस्ट की सलाह दी, तो उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

उनका पूरा संसार अब अव्यान के इर्द-गिर्द ही घूमता था। वह बताती हैं, “ये मेरा दुर्भाग्य था कि मुझे दूध कम आता था। उसे बाहर का दूध पिलाते थे।’

वो 48 घंटे: जब थम गईं सांसें

परिवार की खुशियों पर ग्रहण 26 दिसंबर को लगा। पिता बताते हैं, “बच्चे को लूज मोशन की शिकायत हुई तो हम उसे डॉक्टर के पास लेकर गए। डॉक्टर ने दवाइयां दीं और कहा कि अगर सुधार न हो तो दो दिन बाद फिर लाइएगा।” परिवार को लगा कि यह बच्चों को होने वाली सामान्य समस्या है। सोमवार की सुबह 4-5 बजे के करीब अव्यान की तबीयत अचानक बिगड़ गई।

परिवार उसे लेकर शहर के बड़े सीएचएल अपोलो अस्पताल भागा, लेकिन वहां पहुंचने तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने कहा, “इसकी सांसें थम चुकी हैं।” जो माता-पिता अपने बच्चे को इलाज के लिए लेकर गए थे, वे उसकी लाश लेकर घर लौटे। पिता की आवाज भर्रा जाती है, “उस पल हम टूट गए। हमें समझ नहीं आ रहा था कि अचानक यह क्या हो गया।”

नगर निगम ने भागीरथपुरा में नई पाइपलाइन बिछाने का काम शुरू कर दिया है।
नगर निगम ने भागीरथपुरा में नई पाइपलाइन बिछाने का काम शुरू कर दिया है।

जब पता चला, कातिल घर के नल में ही था

जब परिवार अव्यान का शव लेकर घर लौटा, तब तक उन्हें मौत की असली वजह का अंदाजा भी नहीं था। वे इसे अपनी किस्मत का दोष मान रहे थे, लेकिन घर पहुंचते ही आस-पड़ोस के लोगों ने जो बताया, उससे उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पड़ोसियों ने बताया कि यह समस्या सिर्फ उनके घर की नहीं, बल्कि पूरे भागीरथपुरा की है। यहां हर घर में कोई न कोई उल्टी-दस्त से बीमार है।

तब परिवार को समझ आया कि उनके बेटे की जान किसी बीमारी ने नहीं, बल्कि उस पानी ने ली है जिसे वे जीवन का स्रोत समझ रहे थे। पिता कहते हैं, “अगर हमें ज़रा भी आशंका होती, तो हम अपने बेटे को एक बूंद पानी नहीं पिलाते। लेकिन किस्मत को शायद यही मंजूर था।”

साधना कहती हैं, “मैं तो इस पूरे हादसे के लिए नगर निगम को ही जिम्मेदार मानती हूँ। लोग गंदे पानी की महीनों से शिकायत कर रहे थे, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। मैं तो यही गुजारिश करूंगी की आम आदमी की शिकायतों की सुनवाई हो।

एक मौत के बाद जागा सिस्टम

अव्यान की मौत ने उस सिस्टम को नींद से जगा दिया जो महीनों से कुंभकर्णी नींद में सोया था। जिस मोहल्ले में शिकायतों का कोई असर नहीं हो रहा था, वहां अव्यान की मौत के दो दिन के भीतर ही नई पाइपलाइन बिछाने का काम शुरू हो गया। बाकी गलियों में भी नर्मदा पाइपलाइन बदलने का काम युद्धस्तर पर चल रहा है।

यह तेजी उस परिवार के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी है, जिसका चिराग हमेशा के लिए बुझ गया। पिता कहते हैं, हमने दो दिन पहले घर में आरओ लगवा लिया है, ताकि परिवार के बाकी लोगों की जान बची रहे।” यह एक आम नागरिक का सिस्टम पर अविश्वास का प्रतीक है, जहां उसे अपनी सुरक्षा के लिए खुद ही इंतजाम करने पड़ते हैं।

अव्यान के पिता जो उसके जाने के बाद से गम में हैं।
अव्यान के पिता जो उसके जाने के बाद से गम में हैं।

“सब खुद को ही कसूरवार मानते हैं”

अव्यान की मौत ने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया है। घर में खामोशी पसरी है, जहां कुछ दिन पहले तक किलकारियां गूंजती थीं। पिता कहते हैं, “बच्चे के जाने के बाद अब घर में किसी का काम में मन नहीं लगता। मेरी मां (अव्यान की दादी) बीमार रहती हैं। बड़ी बेटी को बड़ी मुश्किल से आज मनाकर स्कूल भेजा है।

मेरे पिताजी (अव्यान के दादा) भी रात-रात में उठकर रोते रहते हैं। सब टूट चुके हैं। कौन किसको कसूरवार ठहराए… सब खुद को ही कसूरवार मानते हैं।” कूरियर का काम करने वाले पिता बेटे के जाने के बाद से ऑफिस नहीं गए हैं। कहते हैं, “काम में मन ही नहीं लगता। मैंने बच्चे की कभी फोटो नहीं खींची थी, बस एक ही फोटो खींची थी। उसकी वही फोटो आज अखबारों और मीडिया में छप रही है।

आव्यान को जब पहली बार घर लाया गया था, ये तब की तस्वीर है।
आव्यान को जब पहली बार घर लाया गया था, ये तब की तस्वीर है।

विघ्नहर्ता के नाम पर ‘अव्यान’

साधना बताती हैं कि उन्होंने और उनकी बेटी ने मिलकर भगवान गणपति के नाम पर बेटे का नाम ‘अव्यान’ रखा था। गणपति, जो सब विघ्नों को हरते हैं। विडंबना देखिए, वही अव्यान सिस्टम के विघ्नों से लड़ते हुए खुद बलिदान हो गया। वो कहती है कि मेरा बेटा एक सवाल छोड़ गया है कि क्या विकास और सुधार के लिए हमेशा किसी के बलिदान का इंतजार करना जरुरी है?

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