….मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त रेवड़ियों की झड़ी से राज्यों के खाली हो रहे खजाने और प्रभावित हो रहे विकास कार्यों पर सुप्रीम कोर्ट का ध्यान है। बुधवार को मुफ्त रेवड़ियों के मामले में जल्दी सुनवाई की मांग पर विचार करने का आश्वासन देते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यह मामला महत्वपूर्ण है और इसकी सुनवाई की तारीख जल्दी तय की जाएगी। लेकिन इसी बीच चीफ जस्टिस ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि इस मामले के दो पहलू हैं।

एक हिस्सा नीतिगत निर्णयों से संबंधित है लेकिन दूसरा हिस्सा यह देखने का होगा कि क्या राज्य राजस्व का एक हिस्सा केवल राज्य के विकास कार्यों के लिए नहीं रखा जा सकता। अश्वनी उपाध्याय ने जनहित याचिका दायर की हुई है।

उन्होंने कहा कि जब उन्होंने याचिका दाखिल की थी तो देश पर करीब 150 लाख करोड़ का कर्ज था और याचिका के लंबित रहने के दौरान ही यह कर्ज बढ़ कर 250 लाख करोड़ हो गया है। यानी इस दौरान 100 लाख करोड़ की बढ़ोत्तरी कर्ज में हुई है। पीठ ने माना कि यह मामला निश्चित ही बहुत महत्वपूर्ण है और उस पर सुनवाई के लिए तारीख तय करने पर विचार होगा।

इसके बाद अश्वनी उपाध्याय ने जल्द सुनवाई की मांग आगे बढ़ाते हुए कहा कि व्यक्तिगत तौर पर जो चीज कानून में भ्रष्ट आचरण मानी गई है वही चीज राजनीतिक दल द्वारा किए जाने पर भ्रष्ट आचरण नहीं है। कोर्ट में मौजूद अन्य कुछ वकीलों ने भी मुफ्त रेवड़ियों के पहलू पर बात की।

इस पर चीफ जस्टिस ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि इस मामले में दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। एक तो इसका कुछ हिस्सा नीतिगत निणर्यों से संबंधित हो सकता है लेकिन दूसरा हिस्सा यह देखना होगा कि क्या राज्य के राजस्व का एक हिस्सा केवल राज्य के विकास कार्यों के लिए नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि स्वास्थ्य सहायता या मुफ्त शिक्षा दी जाती है तो यह ठीक है संविधान के नीति निदेशक तत्व में यह संवैधानिक दायित्व है जिसका राज्य पालन कर रहा है। शुद्ध रेवड़िंया बांटना, राज्य की संपत्ति बांटना गलत है।

अश्वनी उपाध्याय ने 2022 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी जिसमें मुफ्त रेवड़ियों पर रोक लगाने की मांग की गई है। लंबे समय से यह मामला सुनवाई पर नहीं लगा है। इस बीच चुनाव दर चुनाव विभिन्न राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए तरह तरह की घोषणाएं करते हैं जिसका बाद में राज्य की आर्थिक स्थिति पर प्रभाव पड़ता है।