निगम कमिश्नर-एसडीएम पर भ्रष्टाचार की FIR, चार्जशीट से नाम गायब !!!
देवास सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेस लिमिटेड में हुए करोड़ों के कथित भ्रष्टाचार के मामले ने लोकायुक्त पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि तत्कालीन शीर्ष अधिकारियों को बचाने के लिए लोकायुक्त पुलिस ने एक अनोखा तर्क पेश किया है। कोर्ट में दाखिल चार्जशीट से तत्कालीन एमडी, सीईओ और सीओओ जैसे वरिष्ठ अधिकारियों के नाम हटा दिए गए हैं।
इसके पीछे दलील दी गई है कि घोटाले से हुई ‘वित्तीय हानि की राशि वसूल कर ली गई है’, इसलिए अब इन पर आपराधिक मामला नहीं बनता। इस फैसले को चुनौती देते हुए मामले के फरियादी धर्मेंद्र चौहान ने देवास की न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी (JMFC) कोर्ट में एक आवेदन दिया है।
दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 319 के तहत दायर इस याचिका में मांग की गई है कि सिटी ट्रांसपोर्ट के तत्कालीन एमडी (और नगर निगम आयुक्त) विशाल सिंह चौहान, सीईओ ( तत्कालीन एसडीएम) प्रदीप सोनी और सीओओ सूर्यप्रकाश तिवारी को फिर से आरोपी बनाया जाए।
याचिका का मुख्य आधार यह है कि अपराध (आपराधिक षड्यंत्र, गबन, धोखाधड़ी) पहले ही घटित हो चुका था। बाद में पैसे की वसूली कर लेने से अपराध का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। अब इस पर कोर्ट को फैसला लेना है। पढ़िए रिपोर्ट

2023 में औपचारिक एफआईआर दर्ज की गई
इस मामले में लोकायुक्त पुलिस ने विस्तृत जांच के बाद जुलाई 2023 में एक औपचारिक एफआईआर दर्ज की थी। एफआईआर में तत्कालीन नगर निगम आयुक्त व एमडी विशाल सिंह चौहान, पूर्व एसडीएम व सीईओ प्रदीप सोनी, सीओओ सूर्यप्रकाश तिवारी और विश्वास ट्रांसपोर्ट के डायरेक्टर विजय गोस्वामी व प्रणय गोस्वामी को नामजद किया गया था।
इन सभी पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 409 (लोक सेवक द्वारा आपराधिक विश्वासघात) और 120-B (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत गंभीर आरोप लगाए गए थे।
चार्जशीट से सभी के नाम गायब, उठे सवाल
कोर्ट में जो याचिका दायर की गई है, उसमें साफ तौर पर कहा गया है कि लोकायुक्त ने अपनी प्रारंभिक जांच और एफआईआर की विवेचना में तीनों शीर्ष अधिकारियों विशाल सिंह चौहान, प्रदीप सोनी और सूर्यप्रकाश तिवारी की भूमिका को सीधे तौर पर संदिग्ध और संलिप्त पाया था।
जब मामले की चार्जशीट कोर्ट में पेश करने का समय आया तो इन तीनों के नाम रहस्यमय तरीके से आरोपियों की सूची से हटा दिए गए। जब इस पर सवाल उठे तो लोकायुक्त पुलिस ने तर्क दिया कि चूंकि इन अधिकारियों के कार्यकाल में हुई वित्तीय हानि की राशि को बाद में वसूल कर लिया गया है, इसलिए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने का कोई औचित्य नहीं है।
फरियादी ने इसी तर्क को कानून की नजर में गलत ठहराते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
अब जानिए किस अधिकारी पर क्या हैं आरोप?
याचिका में हर अधिकारी की भूमिका और घोटाले को अंजाम देने के तरीके का परत-दर-परत खुलासा किया गया है।

बड़े फैसलों को बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की मीटिंग में नहीं रखा
- बिल का खेल: आरोप है कि निजी ऑपरेटर ‘विश्वास ट्रांसपोर्ट’ ने बसों के उपकरणों और रखरखाव के लिए जो बिल पेश किए, वे वास्तविक नहीं थे। उदाहरण के लिए 100 रुपए के वास्तविक खर्च वाले उपकरण को बिल में 150 रुपए दिखाया गया।
- आंख मूंदकर मंजूरी: एमडी के तौर पर विशाल सिंह चौहान की जिम्मेदारी थी कि वे इन बिलों का भौतिक सत्यापन और मूल इनवाइस से मिलान करें। आरोप है कि उन्होंने ऐसा नहीं किया और फर्जी रूप से बढ़ाई गई राशि के बिलों को बिना जांच के मंजूर कर दिया।
- सब्सिडी का दोहरा नुकसान: चूंकि सब्सिडी का भुगतान कुल खर्च के प्रतिशत के रूप में किया जाता था, इसलिए बढ़े हुए बिलों (150 रुपए के आधार पर) को मंजूरी देने से सब्सिडी की राशि भी अवैध रूप से बढ़ गई। इससे शासन के खजाने को सीधा आर्थिक नुकसान हुआ।
- बोर्ड को अंधेरे में रखा: पुरानी बसों को बेचने, नई बसें खरीदने की अनुमति देने और सबसे महत्वपूर्ण, बसों के रूट बदलने जैसे बड़े फैसले ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स’ की बैठक की प्रत्याशा में ले लिए गए। यह एक सामान्य प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन आरोप है कि बाद में इन प्रस्तावों को जानबूझकर बोर्ड के समक्ष कभी प्रस्तुत ही नहीं किया गया। यह कदम प्रथम दृष्टया मिलीभगत और आपराधिक षड्यंत्र को प्रमाणित करता है।

निगरानी और कर्तव्य के घोर उल्लंघन का आरोप
- पुरानी के बदले नई बसें नहीं खरीदी: 4 जनवरी 2022 को हुई बोर्ड मीटिंग में विश्वास ट्रांसपोर्ट को 5 पुरानी बसें बेचने और उनकी जगह तत्काल नई बसें खरीदने की अनुमति दी गई थी, लेकिन 1 वर्ष 4 माह बीतने के बाद भी बेची गई 3 बसों के बदले कोई नई बस नहीं खरीदी गई।
- 23.86 लाख का सीधा नुकसान: नियम के अनुसार, यदि बसें नहीं खरीदी गईं तो उन पर पहले दी गई VGF (Viability Gap Funding) सब्सिडी को तुरंत वसूला जाना था, लेकिन इन 3 बसों के एवज में दी गई लगभग 23,85,800 रुपए की सब्सिडी की वसूली समय पर नहीं की गई। इसे ब्याज सहित शासन की बड़ी हानि माना गया है।
- निगरानी में जानबूझकर चूक: सीओओ का मुख्य काम कंपनी की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों की निगरानी करना था। आरोप है कि सीओओ सूर्यप्रकाश तिवारी को यह पूरी जानकारी थी कि बसें नहीं खरीदी गईं और ऑपरेटर अनुबंध का उल्लंघन कर रहा है। फिर भी उन्होंने न तो इसकी रिपोर्ट एमडी को की और न ही ऑपरेटर के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई शुरू की।

जांच में सामने आए चौंकाने वाले बहाने और तथ्य
- ‘सिबिल खराब है, लोन नहीं मिल रहा’: जब लोकायुक्त ने ऑपरेटर से पूछा कि उसने बेची गई बसों के बदले नई बसें क्यों नहीं खरीदी तो उसने एक हास्यास्पद तर्क दिया। ऑपरेटर ने कहा, बैंक में मेरा सिबिल (CIBIL) स्कोर खराब हो गया है, इसलिए मुझे लोन नहीं मिल रहा और मैं बसें नहीं खरीद पा रहा।
- FIR के 24 घंटे के भीतर एक्शन: मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोकायुक्त द्वारा केस दर्ज करने के ठीक अगले दिन, तत्कालीन कलेक्टर ऋषभ गुप्ता ने एसडीएम प्रदीप सोनी को उनके पद से हटा दिया था। इस प्रशासनिक कार्रवाई से यह स्पष्ट था कि प्रथम दृष्टया आरोप गंभीर थे।

कोर्ट के फैसले पर टिकी निगाहें
फरियादी पक्ष ने कोर्ट के सामने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNS) की धारा 353 और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 319 का हवाला दिया है। ये धाराएं कोर्ट को यह असाधारण शक्ति देती हैं कि यदि मुकदमे के दौरान पेश किए गए सबूतों से किसी अन्य व्यक्ति की संलिप्तता उजागर होती है तो उसे भी आरोपी के रूप में तलब किया जा सकता है। भले ही उसका नाम चार्जशीट में न हो।
अब देवास की अदालत यह तय करेगी कि क्या लोकायुक्त का “पैसे वसूल लिए, इसलिए अपराध खत्म” का तर्क कानूनी रूप से टिकता है या नहीं। फरियादी का कहना है कि यदि कोर्ट याचिका स्वीकार कर इन तीनों अधिकारियों को फिर आरोपी बनाने का आदेश देती है, तो यह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में एक मील का पत्थर साबित होगा और इससे एक संदेश जाएगा।

