उत्तराखंड में देवस्थानम बोर्ड भंग, सियासत जारी ….. सरकारी कब्जे से मंदिरों की मुक्ति के बाद भी संत BJP से नाराज; बोले- गहरे घाव जल्दी नहीं भरेंगे
मंदिरों को सरकारी कब्जे से मुक्त करने के बाद उत्तराखंड सरकार को उम्मीद है कि अब साधु संतों का गुस्सा विधानसभा चुनाव में नहीं बरसेगा, लेकिन पुरोहित समाज का गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ है। पुरोहित हक हकूकधारी महापंचायत के अध्यक्ष कृष्णकांत कोटियाल का साफ कहना है कि भाजपा हिंदुओं की ठेकेदार तो बनती है, लेकिन उनके हकों की रक्षा नहीं करती। वह दोहरा रवैया अपनाती है।
वे कहते हैं कि केरल-तमिलनाडु में मठों और मंदिरों को सरकारी कब्जे से मुक्त करने की बात करती है, लेकिन उत्तराखंड में उसी की सरकार के मुख्यमंत्री देवास्थानम बोर्ड बनाकर मंदिरों को सरकारी कब्जे में ले लेते हैं। यह तो भाजपा की दादागिरी है न कि वह जो करेगी सही होगा। जब चाहा बोर्ड बना दिया, नुकसान दिखा तो भंग कर दिया। ऐसा थोडे़ ही होता है।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट अब साफ सुनाई दे रही है। देवनगरी के नाम से मशहूर उत्तराखंड में साधु संतों का बोलबाला है। राज्य में सत्ता तक जाने का रास्ता साधु संतों के मंदिरों और मठों से होकर गुजरता है। लिहाजा उत्तराखंड सरकार ने बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री समेत प्रदेश के 51 मंदिरों को पुरोहित समाज के दो सालों के विरोध के बाद ‘चारधाम देवस्थानम बोर्ड से मुक्त कर दिया है।
भाजपा को वापसी की उम्मीद
तो क्या अब साधु संत आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को अपना आशीर्वाद देंगे ? उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री और प्रवक्ता सुबोध उनियाल आश्वस्त हैं कि अब भाजपा की चुनाव में विजय तय है। वे कहते हैं, ‘देवास्थानम बोर्ड का मुद्दा ऐसा था जिसने हमें थोड़ा चिंतित कर रखा था, लेकिन अब सब कुछ ठीक है। संत समाज का आशीर्वाद हमारे साथ है। भाजपा फिर लौटेगी। सत्ता हमारी है और हमारी ही रहेगी।’
अब सवाल है कि क्या पुरोहित समाज साधु संतों को मिले इस तोहफे से खुश है? चारधाम तीर्थ पुरोहित हक हकूक धारी महापंचायत के अध्यक्ष कृष्णकांत कोटियाल कहते हैं कि दो साल से ज्यादा समय हो गया हमें विरोध करते-करते। आखिर हिंदुओं के मंदिर ही भाजपा को क्यों खटकते हैं? चर्च, मस्जिदों पर इनका जोर क्यों नहीं चलता? यह तो हमने हार नहीं मानी तो सरकार को झुकना पड़ा।
RSS ने भी नहीं दिया पुरोहितों का साथ
अप्रैल, 2021 में देवभूमि तीर्थ पुरोहित हक हकूकधारी महापंचायत के पदाधिकारियों ने RSS प्रमुख मोहन भागवत से भी मुलाकात की थी। क्या संघ की तरफ से आपको कुछ मदद मिली? कोटियाल कहते हैं, ‘नहीं, हिंदुत्व की बात करना और हिंदुओं के मुद्दों पर जमीनी स्तर पर काम करना दो अलग बातें हैं। संघ चाहता तो बोर्ड कब का भंग हो जाता है। आज भी सरकार में मंत्रियों के PA के पद RSS के सदस्यों को बांटे गए हैं, लेकिन इस मुद्दे पर यहां संघ बिल्कुल खामोश रहा।
हार का डर न होता तो सरकार कभी नहीं झुकती

कृष्णकांत कोटियाल कहते हैं, ‘जो हिंदुओं के साथ छल नहीं करेगा, उसे हमारा साथ मिलेगा। बोर्ड भंग करवाने के लिए हमें कितने पापड़ बेलने पड़े ये तो हम ही जानते हैं। अंदर की बात तो यह है कि हमने साफ कह दिया था कि अगर सरकार ने बोर्ड भंग नहीं किया तो चार धाम की करीब 15 सीटों पर पुरोहित समाज के लोग चारधाम बोर्ड के बैनर तले चुनाव लड़ेंगे। उसके बाद से ही दिल्ली से लेकर राज्य तक कई अधिकारी और मंत्रियों ने हमसे संपर्क किया, बैठक की।’
कोटियाल कहते हैं, ‘PM की यात्रा से पहले हमसे मुख्यमंत्री पुष्करधामी, कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल, पर्यटन मंत्री, सतपाल महाराज सबने आकर हमसे निवेदन किया और बोर्ड भंग करने का आश्वासन दिया तब जाकर हमने मोदी जी की यात्रा बिना विरोध होने दी। नहीं तो इससे पहले हमने त्रिवेंद्र सिंह रावत को केदारनाथ नहीं आने दिया था। जब हमने चुनाव में सीधा टक्कर लेने की बात और PM की यात्रा का विरोध करने की बात कही तब जाकर बोर्ड भंग करने का फैसला लिया गया।’
वे बताते हैं कि यह सब बताने का मतलब यह था कि घाव गहरे हैं, इतनी जल्दी नहीं भरेंगे। अगर भाजपा को लगता है कि बोर्ड भंग कर उसने साधु संतों की नाराजगी खत्म कर दी है तो वह गलत है। हमारी नाराजगी भाजपा के दोहरे रवैए से है। उत्तराखंड में भाजपा ने बोर्ड बनाकर बड़ी गलती की। उससे भी बड़ी गलती की बोर्ड भंग करने के लिए दो साल का इंतजार करवाकर। गलती की है तो सजा भुगतनी पडे़गी।