बागेश्वरधाम में कोर्ट की तरह पेशी पर पेशी, फिर ‘समाधान’ …!

शादी के लिए पीले तो भूत-प्रेत के लिए काले कपड़े में अर्जी ..

छतरपुर जिले का गढ़ा गांव। दिन मंगलवार। 300 घरों वाले गांव में इतनी भीड़ कि पांच से छह किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है, क्योंकि गाड़ियों की एंट्री बंद है। ये सभी लोग धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बागेश्वर धाम में अपनी परेशानी दूर करने की अर्जी लगाने आए हैं। अर्जी लगाने का यह सिस्टम भी अनोखा है। यहां लाल, पीले और काले कपड़े में नारियल बांधकर अर्जी लगाना पड़ती है।

अर्जी स्वीकार हो गई, तो 21 बार पेशी होगी। बागेश्वर धाम के प्रसिद्ध होने के बाद से गांव में लोगों की कमाई कई गुना बढ़ गई। खजुराहो के व्यापारी भी यहां दुकान लगाने आ रहे हैं। मंगलवार को तो यहां यूपी से ऑटो वाले आते हैं, जिनकी कमाई 8 से 10 हजार होती है।

भिंड जिले के ददरौआ में हाल ही में आयोजित दिव्य दरबार में उमड़ी भीड़ में मची भगदड़ में एक महिला की मौत हो गई थी। आखिर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के दरबार में इतनी भीड़ क्यों उमड़ती है? इसी सवाल का जवाब तलाशने ……. की टीम बागेश्वर धाम पहुंची। मंगलवार पेशी का दिन होने के कारण यहां हर तरफ लोगों की भीड़ ही नजर आ रही थी। मंदिर में जाने वाले और अर्जी लगाने वालों की कतार खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी।

अब जानिए, कैसे लगती है अर्जी, क्या है पेशी?
अर्जी और पेशी का मतलब दमोह निवासी सतपाल मुंडा समझाते हैं- मेरी नौंवी पेशी हो चुकी है। संन्यासी बाबा की कृपा से मेरी अर्जी लगी। यहां पहले फोन करना पड़ता है। इसके बाद नाम का टोकन डलता है। फिर एक छोटी बच्ची से टोकन निकलवाया जाता है। नाम निकलने पर फोन पर सूचना दी जाती है। इसके बाद दिव्य दरबार में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री से मिलने का मौका मिलता है। वे मन की बात जानकर एक पर्चा बनाते हैं। इस पर्चे में समस्या का समाधान भी लिखते हैं।

इस पर्चे के साथ लगातार 21 पेशी पर बागेश्वर धाम में मत्था टेकने आना पड़ता है। मंगलवार या शनिवार में से कोई एक दिन तय होता है। इस पर्चे वाले को हर पेशी पर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री से मिलने का मौका मिलता है। हालांकि उन्होंने परेशानी बताने से मना कर दिया। बोले- ये बताने वाली बात नहीं है। गुरुजी ने मना कर रखा है।

21 मंगलवार या शनिवार होती है पेशी
यहां ललितपुर के सौरभ सोनी मिले। बोले- डेढ़ साल पहले जून में हटा (दमोह) में दिव्य दरबार लगा था। वहीं पर मेरी अर्जी स्वीकार हुई थी। उससे पहले मैं सात बार बागेश्वर धाम में अर्जी लगाने आ चुका था। मेरे मन में जो भी सवाल थे, समस्या थी, उन सभी को गुरुजी ने पर्चे पर लिख दिया था। लगातार 21 मंगलवार पेशी पर आना था। अब तक 19 पेशी हो चुकी है। हर पेशी में बागेश्वर सरकार धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री अपने हाथों से पेशी की तारीख अंकित करते हैं।

अब बात श्रद्धा से हो रही कमाई की…
घर के बाहर प्रसाद और फूल-मालाएं बेचकर लोग दिन भर में 1200 से 1500 रुपए रोज कमा रहे हैं। यहां दुकानों का किराया भी 3 हजार से 1.25 लाख रुपए प्रतिमाह हो चुका है। गांव के हर परिवार को घर बैठे रोजगार मिल गया है। आलम ये है कि कमाई के मामले में 21 किमी दूर विश्व प्रसिद्ध खजुराहो की चमक बागेश्वर धाम के आगे फीकी नजर आने लगी है। यहां लोग अपने खपरैल के घरों को तोड़कर पक्का बनवाने में जुटे हैं। एक मंजिला घर है, तो उसे दो मंजिला बनवा रहे हैं, जिससे ऊपर के कमरे होटल के तौर पर किराए से दे सकें। गांव में बस और ट्रेन के टिकट उपलब्ध कराने ट्रैवल्स की दुकानें खुल चुकी हैं। लोग खेती छोड़कर जमीनें किराए पर देने लगे हैं।

छतरपुर जिले का डेस्टिनेशन पॉइंट बन गया गढ़ा गांव
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की प्रसिद्धि के चलते तीन हजार की आबादी वाला गढ़ा गांव छतरपुर जिले का सबसे बड़ा डेस्टिनेशन पॉइंट बन चुका है। गढ़ा गांव जाने के लिए दो नजदीकी रेलवे स्टेशन छतरपुर और खजुराहो हैं। बस से भी पहुंच सकते हैं। छतरपुर बस स्टेशन या रेलवे स्टेशन से गढ़ा जाने के लिए टैक्सी, ऑटो या बस की सुविधा 24 घंटे उपलब्ध है। सेलिब्रिटी बन चुके धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के सामने पुलिस, प्रशासन, नेता, मंत्री सभी नतमस्तक रहते हैं। उनसे मिलना लोगों के शब्दों में मनोरथ पूरा होने जैसा है। एक झलक पाने के लिए लोग दिल्ली, यूपी, बिहार, राजस्थान, हैदराबाद, मुंबई, गुजरात सहित कई राज्यों से पहुंच रहे हैं। इनमें से कुछ ही लोग उन तक पहुंच पाते हैं।

चार चरण में पूरी होती है हाईवे से बागेश्वर धाम की दूरी
राष्ट्रीय राजमार्ग से गढ़ा गांव की दूरी 5 किमी है। गांव के आखिरी छोर पर बागेश्वर धाम है। इसकी दूरी एक किमी है। पुलिस चार लेयर में वाहनों को रोकती है। हाईवे पर बड़े वाहनों को। तीन किमी आगे बढ़ने पर निजी वाहनों जैसे कार आदि को। डेढ़ किमी आगे बढ़ने पर ऑटो और ई-रिक्शा को रोक दिया जाता है। इससे 500 मीटर आगे बाइक वालों को रोक दिया जाता है। आगे का एक किमी का सफर पैदल तय करना पड़ता है।

बागेश्वर धाम भगवान शंकर के नाम से प्रसिद्ध है। यहां 300 साल पुराना शिव मंदिर है। अब इसी के बगल में बालाजी की भी मूर्ति स्थापित कर दी गई है। इसी बालाजी की मूर्ति की पूजा धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री करते हैं। दर्शन करने के लिए लोगों को लंबी लाइन में लगना पड़ता है। लगभग तीन से चार घंटे बाद दर्शन का नंबर आता है। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री से मिलने वालों की लाइन अलग लगती है।

गढ़ा गांव के हर परिवार को कमाई का अवसर, बदलने लगी तस्वीर
बागेश्वर धाम मंदिर के रास्ते पर एक टेबल पर गढ़ा गांव निवासी पान सिंह घोष, धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की तस्वीर बेचते हैं। तस्वीर में बालाजी भगवान भी हैं। यहां एक तस्वीर साइज के अनुसार 30 से 100 रुपए में बिकती है। कहते हैं कि टेबल रखने वाली जगह का तीन हजार रुपए महीने में किराया देना पड़ता है, पर तस्वीर हाथों हाथ बिक जाती है। कोविड के बाद से हमारे गांव वालों को घर बैठे कमाई हो रही है।

गुरुजी की कृपा से खजुराहो तक का रोजगार चल रहा है। रेस्टोरेंट, ऑटो और होटल वालों की जमकर कमाई हो रही है। सबका पेट अच्छे से पल रहा है। कोविड में भी धाम पर लोगों को आना-जाना था, पर किसी को कोविड नहीं हुआ। हर मंगलवार-शनिवार को यहां दो से ढाई लाख लोगों की भीड़ होती है। आम दिनों में भी 15 से 20 हजार लोग पहुंचते हैं। यज्ञ चलने पर बहुत भीड़ होती है। अगला यज्ञ दिसंबर में होने वाला है।

दो से तीन हजार दुकानें खुल गईं
बागेश्वर धाम में दो से तीन हजार दुकानें, होटल, रेस्टोरेंट खुल चुके हैं। मंदिर के आसपास दुकान लगाने के लिए जमीन का किराया 1.25 लाख रुपए महीना है। कार पार्किंग से गांव के बीच जमीन 5 से 10 हजार रुपए के किराए पर मिलती है। कदौहा निवासी अन्नू राजा ने मंदिर से तीन किमी पहले होटल खोला है। अन्नू ने बताया कि 30 गुणा 30 के टीन शेड में होटल का किराया 5 हजार रुपए देता हूं। एक साल से दुकान लगा रहा हूं। रोज दो से ढाई हजार रुपए की कमाई हो जाती है। मंगलवार व शनिवार को 10 से 12 हजार की कमाई हो जाती है।

कन्यादान के लिए सहयोग राशि लेती है समिति
बागेश्वर धाम में हर शिवरात्रि के आसपास गरीब कन्याओं की शादी होती है। इसके लिए बागेश्वर जनसेवा समिति बनी है। समिति का बैंक खाता और IFS कोड यहां सार्वजनिक किया गया है। बागेश्वर धाम आने वाले भक्तों से सहयोग राशि जमा करने की अपील की जाती है। खरगोन से पहुंचे मयंक कुशवाहा ने बताया कि वे तीन दोस्तों शैलेंद्र, दीपक व प्रमोद के साथ पहली बार आए हैं। सोशल मीडिया पर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री महाराज के चमत्कार देखकर आया हूं। भीड़ के चलते उनसे मुलाकात तो नहीं हो पाई, पर लाइन में लगकर मंदिर में दर्शन करने के साथ अर्जी लगाई है।

लोगों की मन की बात जानना क्या संभव है?
यह सवाल भास्कर ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के चाचा स्वामी प्रसाद गर्ग से किया। गंज निवासी स्वामी प्रसाद गर्ग के यहीं रहकर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने 12वीं तक की पढ़ाई की थी। वे बताते हैं कि मेरे पिता भगवान दास गर्ग रामानंद सम्प्रदाय के प्रेम पुजारी से जुड़े थे। उन्हें सिद्धि प्राप्त थी। हमारे गढ़ा में बरम बाबा हैं, वो सिद्ध और तपस्वी संत थे। जब उन्होंने देह त्यागी होगी, तो उनका मोक्ष नहीं हुआ।

वो आज भी अपनी साधना में लीन और सबका भला कर रहे हैं। संन्यासी बाबा उनके गुरु हैं। उन्हें साक्षात हनुमंत कृपा की सिद्धि थी। लोगों के मन की बात जान लेना एक सिद्धि है। नदी, पर्वत या वन में इस तरह के मंत्रों की साधना करनी पड़ती है। इसके बाद ये फलीभूत होती है। बागेश्वर धाम की चढ़ोतरी पर कहते हैं कि मेरे परिवार से उसका कोई सरोकार नहीं है। वैसे भी मुझे रक्त भिक्षा नहीं चाहिए।

चचेरा भाई भी लगाता है दिव्य दरबार
स्वामी प्रसाद गर्ग के दो बेटों में बड़े दिनेश उर्फ दीपक गर्ग भी मां तारादेवी का दिव्य दरबार लगाते हैं। इसी नाम से उन्होंने भी सोशल मीडिया पर चैनल और पेज बना रखे हैं। हर सोमवार, मंगलवार व शनिवार को उनका दरबार गंज में मां तारादेवी मंदिर में दोपहर तीन बजे से लगता है। यहां आने वाले सभी लोगों की मुलाकात दिनेश गर्ग से होती है। वे भी लोगों की मन की बात जान लेते हैं। चचेरे भाई धीरेंद्र शास्त्री की तरह पर्चे पर वे भी मन की बात लिख देते हैं। यहां कोई अर्जी नहीं लगती है। श्रद्धा के अनुसार मां तारादेवी के चरणों में चढ़ावा चढ़ा सकते हैं। सामान्य दिनों में भी दरबार लगाते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *