राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ….. मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं कर रही है बीजेपी?

वो 3 वजहें , जिसके कारण राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं कर रही है बीजेपी?
कुछ चुनावों को छोड़ दिया जाए, तो चुनाव से पहले चेहरा घोषित करना बीजेपी की परंपरा रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव में चेहरा घोषित क्यों नहीं किया जा रहा है?
हिंदी हार्टलैंड के मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं करेगी. दो दशक में पहली बार है, जब इन राज्यों के चुनाव में बिना सीएम फेस बीजेपी मैदान में उतर रही है. तीन में से 2 राज्यों में अभी बीजेपी सत्ता से बाहर है.

पिछले दो दशक से मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान में वसुंधरा राजे बीजेपी का निर्विवाद चेहरा रहे हैं. 2003 के बाद छत्तीसगढ़ में बीजेपी की बागडोर रमन सिंह के पास ही रही है, लेकिन पहली बार यहां भी पार्टी ने लीडर शिप को लेकर मैदान खुला रखा है.

मध्य प्रदेश के कैंडिडेट लिस्ट ने बीजेपी के सामूहिक नेतृत्व की मंशा को और मजबूत कर दिया है. पार्टी ने सीएम पद के 3 बड़े दावेदार नरेंद्र तोमर, कैलाश विजयवर्गीय और प्रह्लाद पटेल को विधानसभा के चुनाव में प्रत्याशी बना दिया है, जबकि वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के टिकट की घोषणा अब तक नहीं की गई है.

राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी इसी तरह के फॉर्मूले लागू होने की बात कही जा रही है. यहां भी सीएम पद के बड़े दावेदारों के चुनाव में उतरने की अटकलें हैं.

राजस्थान में वसुंधरा राजे के अलावा अर्जुन राम मेघवाल, गजेंद्र सिंह शेखावत और ओम माथुर सीएम पद के बड़े दावेदार हैं. इसी तरह छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के साथ सरोज पांडे, अरुण साव और रामविचार नेताम प्रमुख दावेदार हैं.

स्थापना के बाद से ही चेहरे के नाम पर राजनीति करने वाली बीजेपी इन तीनों राज्यों में सीएम फेस क्यों नहीं घोषित कर रही है? इसकी चर्चा सबसे अधिक हो रही है.

मध्य प्रदेश- शिवराज के भविष्य पर सस्पेंस
64 वर्षीय शिवराज सिंह चौहान 2005 में भारी उठापटक के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. उनके नाम पर प्रमोद महाजन ने उस वक्त वीटो लगाया था. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराज ने बीजेपी की राजनीति की दिशा ही बदल दी.

2008 में शिवराज के नेतृत्व में दूसरी बार बीजेपी मध्य प्रदेश की सत्ता में आई. इसके बाद दिल्ली और नागपुर तक उनका दखल बढ़ा. मध्य प्रदेश बीजेपी खासकर संघ की राजनीतिक प्रयोगशाला है. यहां पहली बार जनसंघ ने 1977 में सरकार बनाई थी.

संघ का फायदा शिवराज ने भी खूब उठाया और बीजेपी में अपने समकक्ष के नेताओं को दिल्ली भेजने में कामयाब रहे. पहले प्रभात झा फिर नरेंद्र तोमर और बाद में कैलाश विजयवर्गीय शिवराज की वजह से दिल्ली की राजनीति करने लगे.

हालांकि, 2018 में बीजेपी की हार ने शिवराज के वजूद पर जरूर असर डाला, लेकिन जल्द ही शिवराज फिर से एक्टिव हो गए. 2020 में कथित ऑपरेशन लोटस के बाद शिवराज सिंह चौहान फिर से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने.

कर्नाटक हार के बाद शिवराज का एक बयान खूब सुर्खियों में था. उन्होंने बीजेपी नेताओं से कहा था कि यहां शिवराज है, कर्नाटक-फर्नाटक की बात भूल जाओ. हालांकि, चुनाव नजदीक आने के बाद बीजेपी हाईकमान ने जिस तरह से फैसले लिए हैं, उससे शिवराज के भविष्य पर सस्पेंस बढ़ गया है.

राजस्थान: मुश्किल दौर में वसुंधरा राजे?
भैरो सिंह शेखावत के उपराष्ट्रपति बनने के बाद राजस्थान में बीजेपी की सियासत वसुंधरा राजे के इर्द-गिर्द घूमने लगी. बीजेपी को सत्ता में लाकर वसुंधरा 2 बार मुख्यमंत्री भी बनीं. 2013 में वसुंधरा को सत्ता में लाने के लिए बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक दी थी.

हालांकि, 2018 के बाद बीजेपी की अंदरूनी राजनीति 360 डिग्री यू-टर्न ली. 2018 में पार्टी के भीतर ही ‘मोदी तुझसे बैर नहीं पर वसुंधरा तेरी खैर नहीं’ का नारा जोर-शोर से उठा, जो धीरे-धीरे पूरे राजस्थान में छा गया.

2018 में हार के बाद वसुंधरा को बीजेपी ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया. हालांकि, वसुंधरा को किसी राज्य का प्रभार नहीं दिया गया. राजस्थान चुनाव से पहले वसुंधरा के समर्थकों को यह उम्मीद थी कि उन्हें बड़ा पद मिलेगा, लेकिन अब ऐसा नहीं हुआ है.

राजस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में एक रैली के दौरान कार्यकर्ताओं से सिर्फ कमल के फूल को ध्यान में रखने की सलाह दी थी. जानकारों का कहना है कि राजस्थान में ऊहापोह की स्थिति ने वसुंधरा की राजनीति को संकट में डाल दिया है.

छत्तीसगढ़: रमन सिंह की स्थिति भी ठीक नहीं
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह भी चुनावी साल में एक्टिव हैं, लेकिन उनकी भूमिका अभी स्पष्ट नहीं है. रमन सिंह के नेतृत्व में बीजेपी 2018 में बुरी तरह चुनाव हारी थी. इसके बाद पार्टी ने लोकसभा चुनाव में उनके बेटे का भी टिकट काट दिया था.

रमन सिंह कहने को अभी बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर हैं, लेकिन उनके पास भी कोई बड़ा काम नहीं है. वसुंधरा राजे की तरह ही उन्हें भी किसी राज्य का प्रभार नहीं दिया गया है. छत्तीसगढ़ का विधानसभा चुनाव रमन सिंह के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

हालांकि, पार्टी उन्हें ज्यादा तवज्जो देते नहीं दिख रही है. समाचार एजेंसी आईएएनएस ने बीजेपी सूत्रों के हवाले से बताया कि छत्तीसगढ़ में बीजेपी आलाकमान बदलाव का फैसला काफी पहले ही कर चुका है, इसलिए रमन सिंह की बजाय अन्य नेताओं को ज्यादा आगे किया जा रहा है.

2 बयान, जिसने दिया अटकलों को बल

1. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जयपुर में- संगठन से बड़ा कोई नेता नहीं है. हम सब की पहचान और शान सिर्फ व सिर्फ कमल का फूल है. कमल फूल को ही कार्यकर्ता लोगों के बीच लेकर जाएं.

2. अमित शाह, भोपाल में- अभी शिवराज सिंह चौहान पार्टी के मुख्यमंत्री हैं. आगे क्या होगा, यह पार्टी तय करेगी. आप (पत्रकार) हमारी पार्टी का काम क्यों करने लगे हो, वह हमारी पार्टी का काम है.

मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित क्यों नहीं कर रही बीजेपी?
1989 में पहली बार यूपी के चुनाव में बीजेपी ने चेहरा को आगे कर चुनाव लड़ा. कल्याण सिंह को पार्टी ने फेस बनाया. इससे पहले के सभी चुनाव में पार्टी बिना चेहरे के चुनाव लड़ती थी. कल्याण सिंह का फेस पार्टी के लिए लक्की साबित हुआ.

बीजेपी को पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 57 सीटों पर जीत मिली. इसके बाद कुछ चुनावों को छोड़ दिया जाए, तो चुनाव से पहले चेहरा घोषित करना बीजेपी की परंपरा रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव में चेहरा घोषित क्यों नहीं किया जा रहा है?

पार्टी कन्फ्यूजन की स्थिति बनाए रखना चाहती है
बीजेपी को लंबे वक्त से कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार कहते हैं- पार्टी चुनावी राज्यों में कन्फ्यूजन की स्थिति बनाए रखना चाहती है, जिससे चुनाव से पहले कोई गुटबाजी न हो पाए. बीजेपी की यह रणनीति उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में सफल रही है.

बीजेपी के लिए मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान का चुनाव अति संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद लोकसभा के चुनाव होने हैं.बीजेपी के भीतर तीनों ही राज्यों में कई बड़े नेता हैं, जो अपने-अपने इलाके में काफी मजबूत हैं.

वहीं तीनों ही राज्यों में पहले की तुलना में इस बार कांग्रेस भी काफी मजबूत स्थिति में है. इसलिए सीएम का चेहरा घोषित कर बीजेपी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती है.

हाल ही में अमित शाह ने मध्य प्रदेश की एक रैली में कार्यकर्ताओं के नाम पर चुनाव लड़ने की बात कही थी. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ बीजेपी के लिए एक कैडर बेस्ड राज्य है. यहां पार्टी का संगठन काफी मजबूत स्थिति में है, जिसे पार्टी हाईकमान भुनाने की कोशिश में है.

आडवाणी युग के नेताओं के दबदबे को खत्म करने की तैयारी
अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ ने बीजेपी सूत्रों के हवाले से कहा कि पार्टी में आडवाणी युग के नेताओं के दबदबे को खत्म करना चाहती है. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जो मुख्यमंत्री के सबसे बड़े दावेदार हैं, उनकी गिनती बीजेपी के भीतर अभी भी आडवाणी समय के मुख्यमंत्री के रूप में ही होती है.

2013 में लालकृष्ण आडवाणी ने खुलकर शिवराज सिंह चौहान का समर्थन किया था. वसुंधरा राजे से भी अमित शाह की अदावत जगजाहिर है.

बीजेपी के भीतर मोदी उदय के बाद से ही आडवाणी का खेमा धीरे-धीरे बीजेपी में साइड लाइन होता चला गया. आडवाणी गुट के यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा पार्टी छोड़ चुके हैं. मुरली मनोहर जोशी अभी मार्गदर्शक मंडल के सदस्य हैं. हालांकि, पिछले 8 साल से इस कमेटी की बैठक नहीं हुई है.

2015 में आखिरी बार लालकृष्ण आडवाणी के घर पर मार्गदर्शक मंडल की बैठक हुई थी.

नए नेतृत्व को मौका देने की रणनीति
द टेलीग्राफ से बात करते हुए बीजेपी के शीर्ष नेता कहते हैं- यह संदेश तीनों राज्यों में दे दिया गया है कि मुख्यमंत्री संसदीय बोर्ड ही चुनेगा. नेता ने कहा कि चुनाव जीतने के बाद हो सकता है, वसुंधरा-शिवराज मुख्यमंत्री बन जाए, लेकिन यह 100 प्रतिशत सही नहीं है.

असम में बीजेपी ने चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी सर्वानंद सोनोवाल से लेकर हिमंत बिस्वा सरमा को दे दी थी. पार्टी ने इस प्रयोग को नए नेतृत्व को मौका देने की बात कही थी. गुजरात और उत्तराखंड में भी मुख्यमंत्री बदलने का प्रयोग पार्टी हाईकमान कर चुका है.

जानकारों का कहना है कि बीजेपी अब धीरे-धीरे कांग्रेस की तरह हाईकमान को सर्वश्रेष्ठ दिखाने की रणनीति पर ही काम कर रही है. क्योंकि, जिस संसदीय बोर्ड के सदस्यों से सीएम चुनने की बात कही जा रही है, उस बोर्ड के अधिकांश सदस्य सियासी तजुर्बे में शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे और रमन सिंह से 19 ही हैं.

टेलीग्राफ के मुताबिक पार्टी के इस रणनीति से कई बड़े नेता सहमत नहीं हैं. उनका मानना है कि यह स्ट्रेटेजी बैकफायर हो सकता है और इससे राज्यों में गुटबाजी बढ़ सकती है.

वैसे भी पहले से मध्य प्रदेश और राजस्थान में बीजेपी अंदरूनी गुटबाजी से जूझ रही है.

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