7वीं बार कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में विधान परिषद बनाने का वादा किया ?
7वीं बार कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में विधान परिषद बनाने का वादा किया, जानिए किसे होगा फायदा, कितना आएगा खर्च?
मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल सदस्य 230 हैं. अगर यहां विधान परिषद का गठन होता है, तो न्यूनतम 40 और अधिकतम 76 सदस्य हो सकते हैं. गठन का अधिकार संसद के पास है.
कांग्रेस ने विधान परिषद की जरूरत का जिक्र करते हुए कहा है कि मध्य प्रदेश विविधताओं से भरा है. विधानसभा से सभी तबके को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है, इसलिए परिषद का गठन जरूरी है.
मध्य प्रदेश में विधान परिषद का मुद्दा नया नहीं है. 2019 में भी कमलनाथ ने इसके गठन की कवायद शुरू की थी, लेकिन सरकार चली जाने की वजह से यह संभव नहीं हो पाया. विधान परिषद के मुद्दे पर बीजेपी के नेता खुलकर कुछ भी नहीं बोल रहे हैं.
मध्य प्रदेश में विधान परिषद गठन के लिए 1956 में संविधान संशोधन भी किया गया था, लेकिन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर नहीं होने की वजह से यह अमल में नहीं आ पाया. 1996 में भी इसकी कवायद शुरू हुई थी, लेकिन वित्तीय हवाला देते हुए राज्य सरकार ने इनकार कर दिया था.
विधान परिषद क्या होता है?
भारत में जो विधायिका द्विसदनीय प्रणाली व्यवस्था है. केंद्र स्तर पर जैसे लोकसभा और राज्यसभा होता है. उसी तरह राज्य स्तर पर विधानसभा और विधान परिषद का ढांचा बना हुआ है. संविधान के अनुच्छेद 169 में विधान परिषद के बारे में विस्तार से बताया गया है.
इसके मुताबिक विधान परिषद होगा या नहीं, वह संसद पर निर्भर करेगा. हालांकि, पहला प्रस्ताव विधानसभा से ही पास कराना होगा. संसद के पास विधान परिषद भंग करने की शक्ति है. विधान परिषद राज्य का उच्च सदन माना जाता है. विधानसभा से पास होने वाले बिल का परिषद स्क्रूटनी करता है. विधानसभा सदस्य के समकक्ष परिषद के सदस्य का अधिकार होता है.
अभी किन राज्यों में विधान परिषद है?
संविधान के अनुच्छेद 168 में विधायिका के संरचना का जिक्र है. इसके मुताबिक प्रत्येक राज्य में एक विधानमंडल होगा, जिसके मुखिया राज्यपाल होंगे. मुख्यमंत्री कार्यकारी प्रधान होंगे और लोकसभा की तरह ही विधानसभा का भी संचालन होगा.
प्रत्येक 5 साल पर विधानसभा के चुनाव का प्रावधान है. बहुमत न होने की स्थिति में चुनाव समय से पहले भी कराया जा सकता है. राज्यपाल अगर किसी और कारणवश विधानसभा भंग करते हैं, तो समय से पहले चुनाव हो सकता है.
इसी अनुच्छेद में यह भी कहा गया है कि विधान परिषद वाले राज्य में राज्यपाल इसके संरक्षक जरूर होंगे, लेकिन इसे भंग नहीं कर पाएंगे. वर्तमान में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में विधान परिषद है.
कश्मीर में भी विधान परिषद था, लेकिन अनुच्छेद 370 हटने की वजह से इसकी संरचना को लेकर अभी तस्वीर साफ नहीं है.
परिषद का गठन कैसे होता है?
संविधान के अनुच्छेद 171 के मुताबिक किसी राज्य में अगर विधान परिषद का गठन करना है, तो सबसे पहले विधानसभा से एक प्रस्ताव पास कराना होगा. इसके बाद राज्य इस प्रस्ताव को केंद्र के पास भेजता है. जरूरत पड़ने पर केंद्रीय कैबिनेट इसकी समीक्षा करता है.
केंद्र प्रस्ताव को लोकसभा और राज्यसभा से पास कराता है. इसके लिए केंद्र को कम से कम 2 तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. केंद्र से प्रस्ताव पास होने के बाद यह राष्ट्रपति के पास जाता है. राष्ट्रपति से मुहर लगने के बाद यह अमल में आ जाता है.
इसके बाद समान्य प्रशासन विभाग और विधायी विभाग मिलकर आगे की प्रक्रिया पूर्ण करता है.
कितने सदस्य हो सकते हैं, कैसे चुनाव होता है?
संविधान के अनुच्छेद 171 में विधान परिषद के सदस्यों के बारे में बताया है. इसके मुताबिक विधान परिषद का अगर गठन होता है, तो न्यूनतम उसमें 40 सदस्यों का होना जरूरी है. हालांकि, 2019 तक कश्मीर के विधान परिषद में सिर्फ 36 सदस्य थे.
अधिकतम सदस्यों को लेकर भी विशेष नियमों का प्रावधान है. विधानसभा के कुल सदस्यों की एक तिहाई संख्या जितनी होगी, परिषद की अधिकतम संख्या भी उतनी ही होनी चाहिए. इसे उदाहरण से समझिए-
मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल सदस्य 230 हैं. अगर यहां विधान परिषद का गठन होता है, तो न्यूनतम 40 और अधिकतम 76 सदस्य हो सकते हैं. विधान परिषद का चुनाव निम्नलिखित तरीके से होता है.
1. परिषद के कुल सदस्यों का एक तिहाई सदस्य राज्य के विधायकों द्वारा चुने जाते हैं.
2. परिषद के एक तिहाई सदस्य स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हैं.
3. विधान परिषद के 1/12 सदस्यों का निर्वाचन 3 वर्ष से अध्यापन कर रहे लोग चुनते हैं.
4. 1/12 सदस्यों को राज्य में रह रहे 3 वर्ष पहले स्नातक की डिग्री हासिल कर चुके अभ्यर्थी निर्वाचित करते हैं.
5. शेष सदस्यों का नामांकन राज्यपाल द्वारा उन लोगों के बीच से किया जाता है. सरकार नामों की सिफारिश करती है.
परिषद गठन में कितना खर्च आएगा?
मध्य प्रदेश सरकार के मुताबिक अभी 230 सीटों वाले विधानसभा पर सालाना 40.2 करोड़ रुपए खर्च आता है. अगर मध्य प्रदेश में 76 सीटों वाला विधान परिषद का गठन होता है, तो उसमें करीब 13 करोड़ रुपए का खर्च सालाना आ सकता है.
जानकारों का मानना है कि विधान परिषद के शुरुआत में 40 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च हो सकता है, जो सुरक्षा, नियुक्ति, इंफ्रास्ट्रक्चर आदि के लिए खर्च होगा. इस तरह से देखा जाए, तो गठन के लिए कम से कम करीब 50 करोड़ रुपए चाहिए.
परिषद का गठन कितना जरूरी, कितना सियासी?
राजनीतिक मामलों के जानकार मयंक शेखर मिश्रा कहते हैं- इसे 2 सवालों से समझिए. पहला, क्या इससे आम नागरिकों को फायदा होगा? इस सवाल का जवाब है नहीं. वे इसके पीछे 3 तर्क देते हैं.
मयंक शेखर के मुताबिक फेडरल स्ट्रक्चर में राज्य के पास कानून बनाने का सीमित अधिकार है. राज्य सार्वजनिक स्वास्थ्य, पुलिस, वन, स्वास्थ्य जैसे विषयों पर ही कानून बना सकते हैं. मध्य प्रदेश में वन जैसे विभाग का कानून बनाना भी आसान नहीं है.
वे आगे कहते हैं- विधान परिषद के बन जाने से विधायी कार्यों पर खर्च भी ज्यादा होगा. वहीं कई बिल दोनों सदनों के फेर में लंबे वक्त तक लटका भी रह सकता है.
मयंक शेखर मिश्रा आगे कहते हैं- दूसरा सवाल यह है कि क्या मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है, तो परिषद का गठन हो पाएगा? इसका भी जवाब है नहीं. उनके मुताबिक संसद के परिषद गठन की शक्ति संसद के पास ही है, जहां अभी बीजेपी की सरकार है.
मध्य प्रदेश विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष और कांग्रेस मेनिफेस्टो कमेटी के प्रमुख राजेंद्र सिंह विधान परिषद को जरूरी बताते हुए कहते हैं- कई विधेयक पर विधानसभा में ठीक तरीके से बहस नहीं हो पाता है, जिसका नुकसान आम लोगों को ही होता है.
सिंह कहते हैं- कई बार सरकार बिल पास कराने के कुछ महीने बाद इसे संशोधन के लिए ले आती है. अगर परिषद रहेगा, तो इससे बचा जा सकता है.
खर्च के सवाल पर सिंह कहते हैं- ये तो संसद को देखने का काम है. राज्य सरकार तो सिर्फ एक प्रस्ताव केंद्र को देती है. अंतिम फैसला तो वहीं से होना है.
क्या परिषद नेताओं को एडजस्ट का केंद्र बनेगा?
अभी जिन राज्यों में विधान परिषद है, वहां अधिकांश ऐसे नेता इस सदन के सदस्य हैं, वो विधानसभा का चुनाव या तो हार चुके हैं या जीतने में सक्षम नहीं हैं. राज्यपाल कोटे से भी अधिकांश राजनीतिक दलों के लोगों का ही मनोयन किया जाता है.
महाराष्ट्र में राज्यपाल कोटे से मनोयन का मामला विवादों में रह चुका है. बिहार में भी सत्ताधारी दलों के बड़े नेताओं को राज्यपाल कोटे से सदन भेज दिया गया. राज्यपाल कोटे से माननीय बने अशोक चौधरी को नीतीश सरकार में मंत्री हैं.
विधान परिषद के सवाल मध्य प्रदेश कांग्रेस के एक नेता नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं- पार्टी में कई ऐसे लोग हैं, जो या तो चुनाव नहीं जीत पाते हैं या उन्हें टिकट नहीं मिलता है, लेकिन ये नेता माहौल बनाने में काफी सक्षम होते हैं. ऐसे नेताओं का राजनीतिक एडजस्टमेंट भी जरूरी है.
कांग्रेस के इस नेता के मुताबिक जिनका कद बड़ा होता है, वो तो राज्यसभा चले जाते हैं, लेकिन छोटे स्तर के नेता क्या करेंगे? वे कहते हैं- सुरेश पचौरी कभी चुनाव नहीं जीते, लेकिन वे केंद्रीय मंत्री बन गए. वो पार्टी के लिए उपयोगी भी हैं. इसी तरह विवेक तन्खा का उदाहरण है.
तन्खा 2 बार लोकसभा का चुनाव जबलपुर से लड़े, लेकिन जीत नहीं पाए. पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेज रखा है. तन्खा और पचौरी की तरह क्षेत्रीय स्तर पर भी ऐसे कई नेता हैं. कमलनाथ यह जानते हैं, इसलिए परिषद बनाने पर जोर दे रहे हैं.
हालांकि, मेनिफेस्टो कमेटी के प्रमुख राजेंद्र सिंह ऐसा नहीं मानते हैं. वे कहते हैं- परिषद में बहुत कम सदस्य ही ऐसे होते हैं, जो मनोयन से आते हैं. अधिकांश का चुनाव ही होता है, तो यह कहना कि कांग्रेस नेताओं को फिट करने के लिए यह किया जा रहा है, सही नहीं है.
परिषद के लिए कब क्या-क्या हुआ?
1993 में कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में विधान परिषद बनाने की बात कही. इस चुनाव में कांग्रेस को जीत मिली और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने, लेकिन यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया. 1998 में कांग्रेस ने इसे फिर अपने मेनिफेस्टो में शामिल किया.
नया विधानसभा भवन बनने का जब प्रस्ताव पास हुआ, तो उसमें परिषद के लिए भी हॉल बनाया गया. हालांकि, कामकाज को लेकर सरकार ने कोई चर्चा नहीं की.
2008 में शिवराज सरकार ने एक सवाल के जवाब में कहा कि परिषद का गठन नहीं किया जाएगा. 2013 और 2018 में कांग्रेस ने फिर से इस मुद्दे को अपने घोषणा पत्र में शामिल किया.
2019 में कमलनाथ सरकार ने इसकी प्रक्रिया भी शुरू की, लेकिन सरकार जाने के बाद यह ठंडे बस्ते में चला गया.