आधी आबादी: अफगान महिलाओं के हाल पर सब मौन क्यों हैं?

आधी आबादी: अफगान महिलाओं के हाल पर सब मौन क्यों हैं? सबको पड़ी है अपने हितों की
कठोर तालिबान शासन में महिलाओं की दुर्दशा पर चीन और अरब देश मौन हैं, क्योंकि वे सिर्फ अपने हित देख रहे हैं। अमेरिका अपनी नैतिक और रणनीतिक जिम्मेदारियों को लेकर जूझ रहा है। अकेला भारत ही वैश्विक मंचों पर अफगान महिलाओं के हितों की बात उठा रहा है। लेकिन यह काफी नहीं है।

Why are all countries silent on the condition of Afghan women?
तालिबान शासन में महिलाओं की स्थिति शर्मनाक।तालिबान शासन अपने पतन की ओर है, फिर भी वह समाज में महिलाओं की पहचान मिटाने में लगा है, जो उसके अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अलग-थलग होने का प्रमुख कारण है। मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सुधार की कम गुंजाइश के साथ इसे ‘धीमी गति से मौत : महिलाओं और लड़कियों की दुर्दशा’ के रूप में चिह्नित किया है। लोग पीड़ित हैं, क्योंकि तालिबान सरकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता और वित्तीय मदद नहीं मिल रही है। भविष्य में भी यही स्थिति रह सकती है, क्योंकि वहां पहले से ही इतने कड़े प्रतिबंध हैं कि महिलाओं को चेहरा समेत पूरा शरीर ढकना होता है, यहां तक कि वे घर से बाहर आवाज भी नहीं निकाल सकतीं।
इन राजकीय प्रतिबंधों की वजह से महिलाएं सार्वजनिक रूप से गीत नहीं गुनगुना सकतीं एवं कुरान नहीं पढ़ सकतीं। साथ ही उनके पतले, तंग और छोटे कपड़े पहनने पर भी पाबंदी है। यही नहीं, कानून ने महिलाओं के घर में भी तेज आवाज में बोलने पर पाबंदी लगा रखी है। इस डर से कि उनकी आवाज चहारदीवारी से बाहर न निकल जाए। शासनादेशों की वजह से बाल विवाह और जबरन विवाह बढ़ गए हैं। वहीं, जिन महिलाओं ने इन अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की, उन्हें प्रताड़ित किया गया। दुनिया को इसके खिलाफ मुखर होना पड़ेगा। बाद में तीव्र प्रतिक्रिया जताने पर भी कोई परिणाम नहीं निकलेगा।

दूसरी तरफ, चीन का ध्यान अपने शिनजियांग क्षेत्र में अतिवादी गतिविधियों को रोकने पर है। चीन अपने भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों के लिए महिलाओं पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आंखें मूंदकर तालिबान से संबंध बनाए रखना चाहता है। तालिबान के प्रति चीन का दृष्टिकोण दर्शाता है कि उसके यहां हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन पर भी दुनिया का कोई देश हस्तक्षेप या आलोचना न करे। तालिबानी शासन से जुड़कर चीन अपनी पश्चिमी सीमाओं को स्थिर कर भू-राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र में वर्चस्व पाना चाहता है, खासकर जब अमेरिका और उसके सहयोगी अफगानिस्तान से पीछे हट रहे हैं। इसके अलावा, चीन की नजर अफगानिस्तान के खनिज संसाधनों के दोहन पर भी है। महिलाओं के प्रति तालिबान के नजरिये को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खासी नाराजगी है। जबकि चीन का ध्यान अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित करने पर है, इसलिए वह अफगानिस्तान में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की अनदेखी कर रहा है। बीजिंग मानवाधिकार के मुद्दों से ज्यादा आर्थिक और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को तवज्जो देता है। चीन अफगानिस्तान से होकर अपने बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) प्रोजेक्ट का विस्तार कर इस क्षेत्र में अपने निवेश को सुरक्षित करना चाहता है।

कूटनीतिक और मानवीय आधार पर अफगानिस्तान में महिलाओं की रक्षा करने में भारत अहम भूमिका निभा सकता है। भारत को शांति वार्ता में महिलाओं को शामिल करने की वकालत कर संयुक्त राष्ट्र की लैंगिक समानता वाली पहल का समर्थन करना चाहिए। अफगान महिलाओं को भारत में पढ़ने के लिए वित्तीय मदद और छात्रवृत्ति देने से भविष्य में वहां सशक्त महिला नेतृत्व तैयार हो सकता है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर भारत अफगान महिलाओं को स्वास्थ्य, शिक्षा और कानूनी सहायता उपलब्ध करवा सकता है। अतीत में भी भारत ने स्कूल और अस्पतालों के निर्माण तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण, जैसे तमाम कार्यक्रमों के जरिये अफगान महिलाओं की सहायता की है। तालिबान के पुनरुत्थान से उपजी चुनौतियों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर महिला अधिकारों की लगातार वकालत करना भारत की उनके प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। हालांकि मौजूदा हालात अफगान महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा करने के लिए बेहतर अंतरराष्ट्रीय प्रयासों की मांग करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र व मानवाधिकार संगठनों समेत विश्व समुदाय ने महिलाओं के प्रति तालिबान के व्यवहार की निंदा की है, लेकिन ये प्रयास नाकाफी हैं। संयुक्त राष्ट्र को अफगानिस्तान में अपनी मौजूदगी बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ा है। तालिबान की शत्रुता के चलते वहां संयुक्त राष्ट्र का प्रभाव काफी कम हो गया है। मानवीय मदद बेशक जरूरी है, लेकिन यह दीर्घकालीन समाधान नहीं है और तालिबान के प्रतिबंधों की वजह से अति जरूरतमंदों तक मदद पहुंच ही नहीं पाती। बयानबाजी के परे वहां संगठित वैश्विक दबाव बनाने की जरूरत है। मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए तालिबान को जवाबदेह ठहराने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे का लाभ उठाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उन महिलाओं के लिए सुरक्षित मार्ग तलाशना चाहिए, जो अफगानिस्तान छोड़ना चाहती हैं और संकट में रहने वालों को शरण देनी चाहिए।

वर्ष 2001 में अमेरिका ने तालिबान को सत्ता से बेदखल करने और अफगान महिलाओं को अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय का बेहतरीन नेतृत्व किया था। लेकिन 2021 में अमेरिका ने स्थिरता व समावेशी सरकार सुनिश्चित किए बिना अपने सैनिकों को वापस बुलाकर महिलाओं को उन्हीं ताकतों के हवाले कर दिया, जिनसे सुरक्षा दिलाने का वादा किया गया था। इसलिए तालिबान द्वारा महिलाओं पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए अमेरिका को फिर से आगे आना होगा। अमेरिका आर्थिक मदद, कूटनीतिक पहल के साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संगठित करके तालिबान पर दबाव बना सकता है। अमेरिका को अपनी विदेश नीति के केंद्र में अफगान महिलाओं के हितों को रखना चाहिए। अफगान महिलाओं के अधिकारों की वकालत करने वाले माविस लीनो दंपती का कहना है कि तालिबान ने जीवन छोड़कर अफगान महिलाओं के लगभग सभी मानवाधिकार छीन लिए हैं।

अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी होते ही वहां की महिलाओं का बुरा वक्त शुरू हो गया और विश्व समुदाय, खासकर अमेरिका खुद को चौराहे पर पाता है, जहां वह अपनी नैतिक और रणनीतिक जिम्मेदारियों को लेकर जूझ रहा है। अरब देशों ने भी अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों को मानवाधिकारों से ऊपर रखते हुए तालिबान की बर्बरता को मौन स्वीकृति प्रदान की है। अब विश्व समुदाय को इस भावना के साथ आगे आना चाहिए कि अफगान महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई पूरी दुनिया की महिलाओं के अधिकारों का संघर्ष है। अफगान महिलाओं को अकेले न छोड़ते हुए पूरी विश्व बिरादरी को उनके लिए लड़ना होगा। यह दांव बहुत बड़ा है, क्योंकि अभी चुप रहने के गंभीर परिणाम होंगे।

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