आदित्य सिन्हा। भारत की गौरव गाथा कौन सुनाएगा? क्या यह बात उतनी मायने भी रखती है? किसी राष्ट्र के प्रति वैश्विक धारणा उसकी आर्थिक नियति, सुरक्षा और उसके नागरिकों के आत्मविश्वास को निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाती है। अपने नैरेटिव यानी विमर्श को निर्धारित करने की हमारी क्षमता ही विमर्श-संप्रभुता कहलाती है और यह भौगोलिक या क्षेत्रीय संप्रभुता के जितनी ही महत्वपूर्ण है। इतनी महत्ता के बावजूद नीतिगत स्तर पर इसे अक्सर उपेक्षा का ही शिकार होना पड़ता है।

विमर्श की ताकत को देखें तो सदियों से इसे हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। नैरेटिव पर नियंत्रण की कला में औपनिवेशिक शासकों को महारत हासिल थी। अपने शासन में शोषण-उत्पीड़न को जायज ठहराने के लिए उन्होंने अपने उपनिवेश राष्ट्रों को पिछड़ा, अराजक और स्वयं शासन में अक्षम के रूप में चित्रित किया।

उनका यह प्रपंच आज भी जारी है, जिसने महज अपना रूप बदल लिया है। जैसे कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया, विदेशी सरकारों और यहां तक कि वैश्विक संगठनों ने भारत के प्रति एक दकियानूसी राय बना ली है कि वह गरीबी, भ्रष्टाचार और विषमता में उलझा हुआ राष्ट्र है। भारत के प्रति ऐसा आकस्मिक रूप से नहीं होता, अपितु ऐसी बातें अक्सर संबंधित तत्वों के अपने संरक्षकों के राजनीतिक एवं आर्थिक एजेंडे के अनुरूप होती हैं।

एडवर्ड सईद ने अपनी संकल्पनाओं में बताया है कि कैसे पश्चिम ने पूरब को हमेशा दीन-हीन रूप में प्रस्तुत किया है। इसे आप भारत के शासन, आर्थिकी और पर्यावरणीय नीतियों के आलोक में हालिया पश्चिमी नैरेटिव के संदर्भ में देख सकते हैं। रचनात्मक आलोचना स्वागतयोग्य होती है, मगर किसी भी प्रकार का सामान्यीकरण और वह भी अपने सुविधाजनक आंकड़ों के साथ स्वीकार्य नहीं हो सकता। ऐसी नकारात्मक और निहित स्वार्थी एजेंडे से ओतप्रोत आलोचना भारत की प्रतिष्ठा को धूमिल करने वाली होती है।

जैसे कि भारत के शहरी प्रदूषण की खूब आलोचना होती है, मगर अक्षय ऊर्जा की ओर संक्रमण एवं जलवायु परिवर्तन से जुड़े अभियान में निवेश को अनदेखा किया जाता है। ऐसी आलोचना केवल धारणा के स्तर पर ही अहित नहीं करती, बल्कि विभिन्न शोध यह दर्शाते हैं जिन देशों की छवि भ्रष्ट एवं अस्थिर राष्ट्र की बन जाती है तो वहां विदेशी निवेश में 20 से 25 प्रतिशत की गिरावट दिखती है और फिर यह मायने नहीं रखता कि उस देश का वास्तविक आर्थिक प्रदर्शन कैसा एवं वहां भविष्य की कितनी संभावनाएं हैं। संभव है कि क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां भी ऐसे भ्रामक नैरेटिव से प्रभावित हो सकती हैं, जिससे कई पहलुओं के बिगड़ने की आशंका बढ़ जाती है। स्पष्ट है कि जब कोई और आपकी कहानी पर नियंत्रण रखता है तो आपके अवसरों को भी वही आकार देता है।

तार्किक तो यही है कि किसी राष्ट्र की पहचान, आकाक्षांओं एवं प्रतिष्ठा बाहरियों के बजाय उसके अपने नागरिकों द्वारा परिभाषित की जानी चाहिए। प्रसिद्ध दार्शनिक हन्ना आरेंट का यही मानना था कि कोई समाज स्वयं को कैसे देखता है और दूसरे उसे किस नजर से देखते हैं, यह उसकी ताकत को परिभाषित करता है। यदि भारत बाहरी लोगों को ही उसके नैरेटिव को नियंत्रित करने की गुंजाइश देता रहेगा तो उसके अपने संस्थानों में उसका भरोसा घटने का जोखिम बढ़ता जाएगा, जो अंतत: स्वायत्तता का अवमूल्यन करेगा। ऐसे में नैरेटिव को मजबूत बनाना आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य है। इसमें साफ्ट पावर बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है।

यह शक्ति किसी देश की संस्कृति, मूल्यों एवं आदर्शों से प्रेरित होकर अन्य के लिए आकर्षण का केंद्र बनती है। जैसे बालीवुड, योग, क्रिकेट और भारतीय खानपान ने वैश्विक स्तर पर भारत की दृश्यता को बढ़ाया है, लेकिन केवल यही पर्याप्त नहीं हैं। नैरेटिव को व्यापक रूप से प्रभावित किए बिना भारत अपने हितों की पूर्ति नहीं कर सकता।

यदि कोई देश नैरेटिव पर नियंत्रण गंवाता है तो फिर न केवल उसकी प्रतिष्ठा पर ग्रहण लगने की आशंका बढ़ जाती है, बल्कि इससे सामाजिक विभाजन और विभिन्न स्तरों पर ध्रुवीकरण के आसार बढ़ जाते हैं। ऐसी विसंगतियां भ्रम फैलाने के साथ ही प्रगति में अवरोध बन जाती हैं। इसलिए भारत को समय रहते उपाय करने होंगे।

आज इंटरनेट मीडिया के दौर ने नैरेटिव को अपने अनुकूल बनाने की चुनौती कई गुना बढ़ा दी है। इस पर कुछ पश्चिमी कंपनियों का ही दबदबा है और वही सर्च से लेकर आपकी फीड को निर्धारित करती हैं। इसलिए सबसे पहला उपाय तो इंटरनेट मीडिया से जुड़ी कंपनियों को जवाबदेह बनाने के रूप में करना होगा। इन कंपनियों को यूरोपीय संघ की तरह कानूनी दबाव डालकर पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में उन्मुख करना होगा।

मीडिया साक्षरता एवं जागरूकता का प्रसार भी उतना ही आवश्यक है कि नागरिक स्वयं किसी सामग्री का नीर-क्षीर ढंग से आकलन कर सकें। इस मामले में फिनलैंड से सीख ली जा सकती है, जिसने मीडिया जागरूकता अभियान के माध्यम से नागरिकों को भ्रामक सूचनाओं और फर्जी विमर्श से बचने के उपाय सिखाए हैं। इसके साथ ही हमें अपनी कहानी को भी नए आयाम देने होंगे।

इंटरनेशनल सोलर अलायंस जैसी नवाचार वाली पहल को भारत की विकास गाथा के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना होगा। दुनिया भर में बसे भारतवंशियों की भी इस अभियान में मदद ली जा सकती है। विभिन्न देशों में रह रहे 3.2 करोड़ से अधिक भारतीय भारत की गौरव गाथा के प्रतिनिधि बन सकते हैं। प्रवासी भारतीय दिवस जैसे आयोजनों के माध्यम से भारतवंशियों को भ्रामक सूचनाओं एवं दुष्प्रचार से सावधान रहने एवं भारतीय उपलब्धियों के गुणगान के गुर सिखाए जा सकते हैं।

वस्तुत:, नैरेटिव संप्रभुता अहम की तुष्टि का माध्यम न होकर उचित प्रतिनिधित्व एवं संदेश से जुड़ा विषय है। विदेशी निवेश से लेकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे बिंदुओं को प्रभावित करने की दृष्टि से इसकी महत्ता को देखते हुए इस पर ध्यान देना अपरिहार्य हो गया है। भारत की गौरव गाथा में दृढ़ता, लचीलेपन, विविधता और आकांक्षाओं का समावेश है और यदि हम उसे सही रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाएंगे तो कोई और उसे विरूपित रूप में सामने रखता रहेगा।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)