रेवड़ी की राजनीति में कोई भी दल नहीं पीछे ?
रेवड़ी की राजनीति में कोई भी दल नहीं पीछे, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद भी नहीं चेत रहीं पार्टियां
दिल्ली में चुनाव की तारीखों का ऐलान भले न हुआ हो, पर राष्ट्रीय राजधानी के चुनावी रण में राजनीतिक दल उतरने को तैयार जरुर नज़र या रही है. आम आदमी पार्टी ने जनता को लुभाने के अपने परंपरागत तरीके ‘रेवड़ी संस्कृति’ को नए पैकेज में डालकर क्रिसमस के समय सांता की तरह गिफ्ट बांटने निकल गयी है. मगर ‘फ्रीबीज़’ की आधुनिक जनक समझी जाने वाली आम आदमी पार्टी ही अब भारतीय लोकतंत्र में मुफ़्त की रेवड़ियां बांटने वाली एकमात्र पार्टी बनकर नहीं रह गयी है, बल्कि अब केंद्र सरकार से लेकर तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल इसकी अगुवाई करते दिख रहे हैं.
‘आप’ सबसे आगे
पांच गारंटी देने का दंभ भरने वाले अरविंद केजरीवाल छठी रेवड़ी के रूप में ‘महिला सम्मान योजना’ और सातवीं रेवड़ी के लिए बुजुर्गों के लिए ‘संजीवनी योजना’ का एलान पहले ही कर चुके हैं. ‘शराब की एक बोतल पर दूसरी फ्री’ देने पर बात नहीं बनती नज़र आयी तो रेवड़ी की शक्ल ही बदल दी! अन्ना हजारे कैम्पेन, लोकपाल कैम्पेन, शीला दीक्षित पोल खोल कैम्पेन से लेकर नारों से भी काम बनता शायद नज़र नहीं आया तो अबकी ‘रेवड़ी पर चर्चा’ कैम्पेन लेकर दिल्ली सरकार आयी. जहां आम आदमी पार्टी सुप्रीमो खुलेआम जनता को उनकी फ्रीबीज की आदत को ललकार कर पूछते नज़र आए कि मुफ़्त की रेवड़ी लेनी है या नहीं? ये अलग बात है सीसीटीव विहीन दिल्ली, लोकपाल को ताकती दिल्ली, ‘घोस्ट पेशेंट’ से भरे मोहल्ला क्लिनिक वाली दिल्ली नये वादों पर वारी नज़र आएगी या नहीं यह वक्त बताएगा.
दिल्ली सरकार ने हालिया बजट 76,000 करोड़ रुपये का पेश किया था. मुफ़्त की योजनाओं पर लगभग 10,000 करोड़ खर्च हो रहा है, जो कुल बजट का लगभग 14% है. महिला सम्मान योजना में 2,100 रुपये प्रति माह देने का ऐलान करने वाली सरकार पर 38 लाख महिलाओं को लाभ देने के लिए 11,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करने होंगे.
इसका अर्थ ये कि मुफ़्त की रेवड़ी बांटने में ही बजट का 30% स्वाहा कर दिया जाएगा. इसमें अभी संजीवनी योजना पर आए खर्चों को मिला दिया जाए तो पता नहीं यह खर्च कितना बढ़ेगा. ऐसे में दिल्ली की मूलभूत जरुरतों जैसे- पानी, सड़क, बिजली, परिवहन, कचड़ा नियंत्रण आदि पर सरकार क्या ही रुख रखेगी और कौन सी नई योजना बनाएगी?
इस नारेबाजी में केजरीवाल ही नहीं अकेला
भारतीय लोकतंत्र ने लोक हितकारी नीतियों के लिए शासन का संघर्ष देखा, चुनाव के समय घोषित घोषणा पत्रों से ज्यादा प्रभावशाली जनता के बीच नेताओं द्वारा साड़ी, शराब और रुपयों को बांट कर वोट पाने का आसान तरीका देखा. अब हालत ये है कि घोषणा पत्रों की चर्चा ना तो आम आदमी के बीच ही दिखती है और ना ही पार्टियां ही इसे खानापूर्ति से ज्यादा तवज्जो देती हैं. मुफ़्त की योजनाओं द्वारा पार्टियां वोटर्स को अपनी ओर खींचने में बहुत हद तक सफल भी होती दिख रही हैं.
बिना ज्यादा गुणा गणित के ये बेहद ही सरल रणनीति बन गयी है. हाल के महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा के चुनावों ने इस पर पुनः मुहर लगा दी है. हालांकि, ऐसी कोई भी योजना निम्न और माध्यम आर्थिक वर्ग के लोगों को वित्तीय सहायता पहुंचाने के उद्देश्य से ही की जाती है, मगर हाल के तमाम राज्यों के बजट ने इस बात को भी पुख्ता किया है कि ऐसी योजनाएं राज्य के बजट पर अतिरिक्त खर्च तो डालती ही हैं, इनके दूरगामी परिणाम भी राज्य के आर्थिक मजबूती में सेंध मारते हैं.
महाराष्ट्र ने बढ़ाया आर्थिक बोझ
उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2024-2025 के लिए 20,051 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे वाला बजट पेश किया. महिलाओं-युवाओं और किसानों समेत अन्य आर्थिक-सामाजिक तौर पर पिछड़े वर्गों के लिए अनेक रियायतों का एलान किया गया, जिसे धरातल पर उतारने के लिए 80,000 करोड़ रुपये से अधिक के व्यय की संभावना है. अब ऐसे में चुनाव के ठीक 6 महीने पूर्व ‘मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहन योजना’ में 21 से 60 साल के आयु की हर महिला को हर महीने 1500 रुपये देने की मुफ़्त वाली योजना लाकर पहले से घाटे में चल रही राज्य सरकार के माथे पर 46,000 करोड़ का अतिरिक्त भार लाद दिया गया. बिना किसी फाइनेंशियल रोड मैप के इस तरह की योजनाओं को लाना अपने आप में हास्यास्पद है.
हिमाचल का भी हाल बेहाल
इसी तरह, 2022 के हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 10 योजनाएं लेकर आयी थी, जिनमें मुख्य रूप से 300 यूनिट मुफ्त बिजली और महिलाओं को हर महीने 1500 रुपये देने जैसे गारंटी शामिल थे. दो सालों में सिर्फ 2400 महिलाओं को ही 1500 रुपये प्रति माह का लाभ मिला है. 300 यूनिट बिजली मुफ़्त की रेवड़ी देने के लिए तो अभी इन्हें ना रेवड़ी के लिए तिल मिले हैं और ना ही गुड़! 20 महीने में 21 हजार 366 करोड़ का कर्ज ले चुकी सुक्खू सरकार ने मोटे तौर पर जनता को ‘मुफ़्त मुफ़्त मुफ़्त’ की अफीम तो सुंघा दी, मगर इसे पूरा करने में खुद ही बेहोश हुए जा रहे हैं.
आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा वित्त वर्ष की समाप्ति तक हिमाचल पर 94,992.2 करोड़ रुपये का कर्ज हो जाएगा. कांग्रेस की कर्नाटक सरकार के भी कमोबेश यही हालात है. कर्नाटक में भी कांग्रेस की मुफ्तखोरी नीति ने राज्य की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया. प्रदेश सरकार अब देश में कर्ज मांग-मांग कर हार गयी है, वहीं वर्ल्ड बैंक से 5000 करोड़ रुपये कर्ज लेने की तैयारी में है. हालांकि, ये पैसे बैंगलुरू जैसे शहर को आपदाओं से बचाने के नाम पर मांगे जा रहे हैं. मगर सरकार को मुफ़्त की रेवड़ी बांटने से फुरसत मिलती तब तो राज्य के विकास के कामों पर पैसा और ध्यान खर्च करती.
कांग्रेस के साथ भाजपा भी उसी राह
कांग्रेस को शायद सबक मिल रहा, तभी हरियाणा चुनाव के ठीक पहले पार्टी अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे ने नेताओं को सोच-समझकर फ्री रेवड़ी बांटने की सलाह दी थी, ताकि गारंटियां सिर्फ नाम की ना हो बल्कि उसे वास्तविकता का जामा भी पहनाया जा सके. राज्य तो राज्य सरकारें, केंद्र सरकार भी मुफ़्त की योजनाओं को देने में पीछे नहीं है. 81 करोड़ लोगों को हर महीने 5 किलो अनाज देने की योजना पर तो सुप्रीम कोर्ट ने भी आड़े हाथों लिया है. अभी दिसंबर महीने में ही एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि क्या मुफ़्त की योजनाओं की अपेक्षा रोजगार और अन्य योजनाएं बेहतर विकल्प नहीं साबित हो सकती हैं? आखिर सरकार कब तक मुफ़्त का अनाज बांटती रहेगी?
साल दर साल सरकारें और पार्टियां रियायती योजनाओं का ऐलान कर रहीं है. हर साल उन पर कर्ज का दबाव भी बढ़ता जा रहा है. इनमें से कई योजनाएं धरातल पर आ भी नहीं पा रहीं हैं. ना तो पहले से मौजूद योजनाओं को बंद किया जा सकता है और ना ही उनके बजट में कटौती ही संभव है. फिर आखिर नवीन मुफ़्त वाली योजनाएं आम जन तक पहुंचे भी तो कैसे? जो भी थोड़ा बहुत जनता तक पहुंचाया जा रहा है, उसके लिए सरकारें अतिरिक्त प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों का बोझ लगाकर वसूल रही है. हाल में ही पॉपकॉर्न पर 3 तरह के जीएसटी को लगाकर केंद्र सरकार कटघरे में आई है.
ऐसे ही 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने के चक्कर में दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने बिजली के बेस दरों में ही बढ़ोतरी कर दी. 200 यूनिट तक खर्च करने पर अब तीन रुपये की बजाय 4.07 रुपये प्रति यूनिट चार्ज किया जा रहा. वहीं 201 से 400 यूनिट के उपयोग पर बेस दर को 4.50 से बढ़ाकर 6.11 रुपये प्रति यूनिट कर दिया गया है.
कुल मिलाकर मुफ़्त की रेवड़ी या तो नहीं मिलेगी और अगर मिली तो इसका भार जनता की जेब पर ही येन-केन प्रकारेण आएगा. लोकतंत्र में ऐसी योजनाएं जनता और राष्ट्र को कितना सशक्त बना रही इस बारे में तो विशेषज्ञ भी बार-बार आगाह कर रहे हैं. बस चेतने की जरूरत अब जनता को ही है, जो एक हाथ से लेकर दूजे से देने वाली पॉलिसी को समझे और इसे सिरे से नकार दे.
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