भोपाल मांगे हिसाब ?

- स्मार्ट सिटी कंपनी को जो काम नहीं करने थे, उसमें पैसे डुबोए…अब जरूरी कामों के लिए भी वित्तीय संकट
- नगर निगम व अन्य एजेंसियों के हिस्से के कामों पर खर्च की स्मार्ट सिटी की बड़ी राशि
स्मार्ट सिटी मिशन का मकसद था- शहर में स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और स्मार्ट सुविधाएं विकसित करना। पिछले नौ सालों में स्मार्ट सिटी कंपनी ने इस मकसद के लिए मिले करीब 1400 करोड़ रुपए में से 1351.88 करोड़ रुपए खर्च कर डाले, लेकिन कुछ भी स्मार्ट नहीं हुआ। यहां तक कि 342 एकड़ के टीटी नगर एबीडी (एरिया बेस्ड डेवलपमेंट) में बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी खड़ी नहीं हो पाई हैं।
स्मार्ट सिटी कंपनी को केंद्र और राज्य सरकार से 500-500 करोड़ रुपए मिले थे। इसके साथ कंपनी ने एबीडी एरिया में प्लॉट बेचकर 400 करोड़ कमाए। इन 1400 करोड़ रुपयों में से बड़ा हिस्सा यानी 663.27 करोड़ रुपए जिम्मेदारों ने ऐसे कामों पर खर्च कर दिया जो स्मार्ट सिटी के थे ही नहीं।
इनमें भी सबसे ज्यादा 471 करोड़ रुपए सरकारी कर्मचारियों के लिए मकान बनाने के प्रोजेक्ट पर खर्च किए गए, जबकि स्माार्ट सिटी के मूल प्रोजेक्ट में इसका प्रावधान ही नहीं था। इसके अलावा नगर निगम और बीडीए के हिस्से के प्रोजेक्ट्स पर भी 192.27 करोड़ रुपए खर्च कर दिए गए। जिस तरह पैसा खर्च हुआ, उससे साफ है कि बिना किसी विजन के सिर्फ बजट ठिकाने लगाने का काम किया गया।
342 की जगह सिर्फ 200 एकड़ जमीन मिली
दरअसल, स्मार्ट सिटी डेवलप करने के लिए सरकार ने 342 एकड़ जमीन कंपनी को दी। लेकिन इसमें से लगभग 150 एकड़ जमीन स्कूल, अस्पताल, स्टेडियम और कई धार्मिक व साामजिक संस्थाओं को आवंटित है। हकीकत में स्मार्ट सिटी कंपनी को 200 एकड़ जमीन ही मिली। जिस इलाके को खाली कराया गया, वहां तेजी से अतिक्रमण हो रहा है। जगह-जगह गुमठियां बन गईं हैं। टूटे-फूटे सरकारी मकानों पर कब्जे हो रहे हैं।



सरकारी मकानों के बोझ से फेल हुआ स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट… एक तिहाई बजट तो इन्हीं पर खर्च
प्लान में नहीं थे सरकारी मकान, उन्हीं पर 471 करोड़ खर्च शिवाजी नगर में स्मार्ट सिटी के विरोध के बाद जब टीटी नगर में स्मार्ट सिटी डेवलप करने की प्लानिंग हुई तो वहां भी विरोध और आंदोलन शुरू हो गया। सरकार ने घोषणा कर दी कि स्मार्ट सिटी एरिया में सरकारी मकान बनाकर दिए जाएंगे। वहां 3100 एफ,जी, एच और आई टाइप सरकारी मकान खाली कराए गए थे। उस वादे को पूरा करने के लिए तीन चरणों में 2828 मकान बनाने का प्रोजेक्ट मंजूर किया गया।
फेज-1 में होटल पलाश के सामने 730 फ्लैट के 6 टॉवर 200 करोड़ से बनाने का काम शुरू हुआ। अब तक 220 करोड़ खर्च और छठवां टॉवर निर्माणाधीन है। अब तक सिर्फ 364 फ्लैट आवंटित किए जा सके हैं।
फेज-2 में नूतन सुभाष स्कूल के पास 314.14 करोड़ से 12 हाईराइज टॉवर में 1344 सरकारी मकान बनाने का फैसला लिया गया। इस पर 80 करोड़ खर्च हो गए और प्रोजेक्ट बीच में बंद कर दिया गया। वास्तव में पेमेंट की दिक्कत होने के कारण कांट्रेक्टर ने बीच में काम बंद कर दिया। फेज-3 में 228 क्वार्टर के समीप 754 मकान बनाए जाने थे। लेकिन यह जमीन स्टैंडर्ड पब्लिक स्कूल के नाम से लीज पर है। पूर्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता इस समिति के संचालक हैं। यहां काम शुरू नहीं हुआ है।
बीडीए का प्रोजेक्ट भी खरीद लिया…. बीडीए ने लक्ष्मीगंज गल्लामंडी के स्थान पर महालक्ष्मी परिसर बनाया। बुकिंग कम हुई तो कांट्रेक्टर को भुगतान के लिए बजट नहीं था। ऐसे में 2017-18 में स्मार्ट सिटी कंपनी ने 566 में से 551 फ्लैट खरीदे। 190 करोड़ में से 171 करोड़ का भुगतान किया।
सबसे बड़ा सवाल
जिस स्मार्ट सिटी कंपनी को राज्य व केंद्र से कुल 1000 करोड़ अनुदान मिलना था, उसने 725 करोड़ से सिर्फ सरकारी मकान बनाने का प्रोजेक्ट क्यों लिया?
- फिर भी सबको मकान नहीं : इनमें से अब तक 471 करोड़ खर्च हो चुके हैं, लेकिन 2828 में से सिर्फ 915 सरकारी कर्मचारियों को मकान मिल पाए हैं।
- कुछ स्मार्ट नहीं : गवर्नमेंट हाउसिंग फेज-1 व लक्ष्मी परिसर में 24 घंटे पानी, वाटर रीसायकलिंग, आटोमेटेड कचरा कलेक्शन, 100% पावर बैकअप, सेंट्रलाइज्ड एसी जैसी सुविधा भी नहीं दे पाए।
नगर निगम के कामों पर खर्च किए 192 करोड़ रुपए
- नगर निगम के पास बजट नहीं था, स्मार्ट सिटी ने उसके कामों पर 192.27 करोड़ खर्च किए।
- स्वच्छ भारत मिशन के लिए 16 ट्रांसफर स्टेशन निर्माण पर 100 करोड़ रुपए खर्च किए।
- तीन मल्टीलेवल पार्किंग के 31.05 करोड़ रुपए स्मार्ट सिटी से भुगतान कराया गया।
- छोटे तालाब पर रानी कमलापति आर्च ब्रिज के 39 करोड़ रुपए का भुगतान स्मार्ट सिटी ने किया।
- रोड स्वीपिंग मशीन किराए से ली और 3.15 करोड़ रुपए स्मार्ट सिटी ने दिए।
- न्यू मार्केट सहित कई स्थानों पर प्लेस मैकिंग के नाम पर 10 करोड़ में छोटे-छोटे काम हुए।
- बड़े तालाब पर सौंदर्यीकरण लाइट पर 9.07 करोड़ रुपए खर्च हुए।
ये नगर निगम के ऐसे काम थे, जिनका स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट से सीधे कोई लेना-देना नहीं था।
688 करोड़ रुपए का हिसाब… जो स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के काम पर खर्च हुए, लेकिन अधिकतर अधूरे रह गए



(वेतन-भत्ते व स्थापना व्यय के 40 करोड़ और ट्रांजिट हाउस निर्माण, शिफ्टिंग, अतिक्रमण हटाना, मेंटेनेंस, सरकारी एजेंसियों के टैक्स आदि पर 100 करोड़)
होना यह था… एरिया बेस्ड डेवलपमेंट और पैन सिटी के लिए अलग प्लान
मूल प्लान के तहत स्मार्ट सिटी कंपनी को एरिया बेस्ड डेवलपमेंट (एबीडी) और पैन सिटी के लिए दो अलग-अलग प्लान बनाकर उन पर काम करना था।
- एबीडी के तहत टीटी नगर की 342 एकड़ जमीन पर 3440.90 करोड़ रु. में 70% आवासीय और 30% व्यावसायिक क्षेत्र के साथ नॉन मोटराइज्ड ट्रांसपोर्ट और ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट के सिद्धांत के तहत साइकिल लेन, चौड़ी सड़कें, 24 घंटे बिजली व पानी का काम होना था। ऑटोमेटेड कचरा प्रबंधन, गैस आधारित पावर प्लांट, सौर ऊर्जा के प्लांट, स्मार्ट मीटरिंग, स्मार्ट पार्किंग, सीसीटीवी से निगरानी की व्यवस्था होनी थी।
- पैन सिटी प्रोजेक्ट में 875.70 करोड़ से इंफ्रास्ट्रक्चर, ट्रैफिक व नागरिकों की सुरक्षा के लिए आईटी बेस्ड सॉल्यूशन डेवलप होने थे।
लेकिन हुआ यह – निगम और बीडीए के अधूरे प्रोजेक्ट पूरे करने में लग गए स्मार्ट सिटी कंपनी ने मूल प्लान के मुताबिक प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाई। भोपाल को स्मार्ट बनाने के लिए 1948 करोड़ के प्रोजेक्ट लिए। इनमें से 1061 करोड़ के प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू हुआ। लेकिन बाद में नगर निगम और बीडीए जैसी संस्थाओं की खस्ता माली हालत के कारण इन एजेंसियों के जो प्रोजेक्ट अधूरे पड़े थे, उसमें स्मार्ट सिटी कंपनी का बजट खपा दिया गया। पैन सिटी के तहत भी आईसीसीसी, भोपाल प्लस एप, साइकिल ट्रैक और स्मार्ट पोल का कोई लाभ शहर को नहीं मिला।
अब और कोई राह नहीं – बचे काम पूरे करने के लिए अब केवल प्लॉटों की बिक्री ही सहारा हमें लगता है कि पूर्व में तात्कालिक जरूरतों के अनुसार ही नगर निगम और अन्य एजेंसियों के कार्य हाथ में लिए गए होंगे। वर्तमान स्थिति यह है कि हम नए काम शुरू नहीं कर रहे हैं। पुराने कामों को पूरा करने के लिए प्लॉटों की बिक्री (मोनेटाइजेशन) से मिलने वाली राशि का उपयोग करेंगे। यही एकमात्र विकल्प है, क्योंकि अब केंद्र या राज्य सरकार से कोई राशि नहीं मिलना है। -केएल मीणा, सीईओ, स्मार्ट सिटी