जलशक्ति मंत्रालय की ओर से दी गई इस जानकारी में कुछ भी नया नहीं कि सीवेज सिस्टम में खामी-खराबी के चलते नदियों का प्रदूषण दूर करने में वांछित सफलता नहीं मिल पा रही है। वास्तव में यह वह तथ्य है, जो लंबे समय से रह-रहकर सामने आता रहा है।

यह निराशाजनक भी है और चिंताजनक भी कि नदियों के किनारे बसे शहरों के सीवेज सिस्टम में सुधार का काम पूरा होने का नाम नहीं ले रहा है। इसका दुष्परिणाम यह है कि सीवरों का गंदा पानी नदियों में जाकर उन्हें विषाक्त कर रहा है। यह किसी से छिपा नहीं कि नदियों किनारे के शहरों में जो सीवेज शोधन संयंत्र हैं, वे पूरी क्षमता से काम नहीं करते।

कहीं-कहीं तो उनकी क्षमता इतनी कम है कि वे सीवरों के आधे गंदे पानी का भी शोधन नहीं कर पाते। एक समस्या यह भी है कि ये संयंत्र रह-रहकर खराब होते रहते हैं।

निःसंदेह यह देखना राज्य सरकारों और उनके स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है कि सीवेज शोधन संयंत्र पर्याप्त संख्या में हों और वे पूरी क्षमता से काम करें, लेकिन जब केंद्र सरकार यह देख रही है कि वे अपना काम सही तरह नहीं कर रहे हैं तो फिर उसे राज्यों पर दबाव बनाना चाहिए।

इसमें देर इसलिए नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि अनेक शहरों के गंदे नाले अभी तक सीवेज शोधन संयंत्रों से नहीं जुड़ पाए हैं। इसके चलते गंदे नालों का कचरा सीधे नदियों में जा रहा है। इनमें वे नदियां भी हैं, जिन्हें प्रदूषण मुक्त करने का संकल्प केंद्र और राज्य सरकारों ने ले रखा है।

आखिर यह कैसा संकल्प है कि इसके लिए कोई समय सीमा नहीं तय की जा पा रही है कि सभी गंदे नाले सीवेज शोधन संयंत्रों से जुड़ें और वे किसी भी हाल में गंदा पानी नदियों में न छोड़ सकें? नदियों के प्रदूषण का एक अन्य बड़ा कारण उनके किनारे स्थापित उद्योगों की ओर से उनमें अपना अपशिष्ट जल उड़ेलना है।

इसका कारण उन सरकारी एजेंसियों का नाकारापन है, जिनका काम यह देखना है कि औद्योगिक कचरा नदियों में समाहित न होने पाए। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से उपलब्ध कराए गए इस तथ्य से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि उसने 73 ऐसे उद्योगों को बंद करने का आदेश दिया है, जो नदियों में अपना विषाक्त कचरा उड़ेल रहे थे।

क्या ऐसा कोई दावा किया जा सकता है कि नदियों किनारे स्थापित सभी उद्योगों का अपशिष्ट जल शोधित होकर ही नदियों में जा रहा है? यदि नहीं तो इस निष्कर्ष पर पहुंचने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं कि नदियों को प्रदूषण मुक्त करने का अभियान नितांत खोखले तरीके से चलाया जा रहा है। साफ है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में हमारी नदियां प्रदूषित हो रही हैं।