कमजोर संगठन, गलत टिकट और पार्ट टाइम सियासत ने किया सत्यानाश; कांग्रेस औंधे मुंह गिरी
बिहार चुनाव परिणाम 2025: कमजोर संगठन, गलत टिकट और पार्ट टाइम सियासत ने किया सत्यानाश; कांग्रेस औंधे मुंह गिरी
कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि एसआईआर और वोट चोरी जैसे मुद्दे जमीनी स्तर पर दम तोड़ते नजर आए, तब नेतृत्व ने अपनी रणनीति में थोड़ा बदलाव किया। इसके बाद रोजी-रोजगार के मुद्दे पर ध्यान केंद्रित किया गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।

बिहार में चुनाव की तारीखें करीब आने के साथ जमीनी स्थिति के मद्देनजर कांग्रेस के कई नेताओं को यह आभास होने लगा था कि पार्टी शायद बहुत अच्छा प्रदर्शन न कर पाए। पर इस तरह औंधे मुंह गिरने की उन्होंने भी कल्पना नहीं की थी। करारी हार से हैरान कांग्रेस नेता इसके लिए जिन प्रमुख कारणों को जिम्मेदार मान रहे हैं, उनमें कमजोर संगठन, गलत टिकट वितरण, नकारात्मक प्रदर्शन, खराब रणनीति और गठबंधन में तालमेल के अभाव को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है, वोट चोरी के आरोप को जोर-शोर से उछालना, दलबदलुओं को टिकट देना और सामाजिक न्याय के मुद्दे को पूरी तरह धार न दे पाना भी पार्टी पर भारी पड़ गया। नतीजों से यह भी साफ हो गया कि राहुल गांधी का पार्ट टाइम सियासत का तरीका नहीं चल सकता है।
नतीजे आने शुरू होने के बीच दिल्ली से पटना तक कई नेताओं ने कहा कि सामाजिक न्याय की राजनीति से लेकर वोट चोरी अभियान तक पार्टी के मुख्य मुद्दे जमीनी स्तर पर काम नहीं कर रहे थे, लेकिन सियासी संकेतों को ठीक से समझा नहीं गया। पार्टी नेताओं के मुताबिक, सामाजिक न्याय के मुद्दे ने पार्टी के बचे-खुचे उच्च वर्ग के वोट बैंक को भी दूर धकेल दिया। राहुल गांधी ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और वोट चोरी अभियान को प्रिय चुनावी मुद्दा बना लिया लेकिन जमीनी स्तर पर इनका बिल्कुल भी असर नहीं दिखा। राहुल के करीबी पार्टी की रणनीति को लेकर इस कदर आश्वस्त थे कि उन्होंने इन्हें जोर-शोर से उठाना जारी रखा।
एनडीए से आने वाले नेताओं को टिकट ने बढ़ाई नाराजगी
कांग्रेस ने भाजपा, जदयू और लोजपा से आए कई दलबदलुओं को न केवल पार्टी में जगह दी, बल्कि उन्हें टिकट भी दिया। ऐसे में स्थानीय स्तर पर नाराजगी बढ़ी। एक पार्टी नेता ने कहा, सोनबरसा का उम्मीदवार हो या कुम्हरार, नौतन, फारबिसगंज, कुचियाकोट या बलदौर का। पार्टी ने दलबदलुओं को अहमियत दी। अगर आप उन लोगों को टिकट देते हैं, जिनकी सोशल मीडिया वॉल पर अभी तक एनडीए नेताओं के साथ तस्वीरें हैं, तो विश्वसनीयता क्या रह जाती है?
रोजगार को राजनीतिक मुद्दा बनाने में की देर
कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि एसआईआर और वोट चोरी जैसे मुद्दे जमीनी स्तर पर दम तोड़ते नजर आए, तब नेतृत्व ने अपनी रणनीति में थोड़ा बदलाव किया। इसके बाद रोजी-रोजगार के मुद्दे पर ध्यान केंद्रित किया गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।
महिलाओं और अति पिछड़े वर्ग के बीच नहीं बनी पैठ : कांग्रेस की तरफ से पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों (ईबीसी) को साधने की कोशिश की गईं, लेकिन वह पूरी तरह परवान नहीं चढ़ पाई। सवर्ण समर्थक अलग-थलग पड़ गए। महिलाओं और ईसीबी के बीच नीतीश की लोकप्रियता में पार्टी कोई सेंध नहीं लग पाई। वहीं, महागठबंधन अपना दायरा एमवाई से आगे बढ़ाने में नाकाम रहा। नीतीश ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिला उद्यमियों को 10,000 रुपये की पहली किस्त का दांव चलकर महिलाओं के बीच पैठ को और मजबूत कर दिया।
अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन
बिहार में अपने अस्तित्व को तलाश रही कांग्रेस का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है। पार्टी को करीब 8.73 फीसदी मत मिले। अब वह अपने 2010 के प्रदर्शन पर पहुंच गई है। तब पार्टी ने चार सीटें ही जीती थीं और उसे 8.37 फीसदी मत हासिल हुए थे। देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की जयंती के दिन हुई इस हार ने पार्टी के भविष्य के संकट को बढ़ा दिया है। करारी हार के चलते पार्टी मुख्यालय पर सन्नाटा पसरा हुआ था, जो दिग्गज नेता सुबह से पार्टी कार्यालय में जमे हुए थे, वह भी धीरे-धीरे खिसक गए।
कांग्रेस बिहार में 1990 से वापसी के लिए प्रयास कर रही है। सत्ता से दूर कांग्रेस का मत प्रतिशत लगातार नीचे जा रहा है। पार्टी ने आखिरी बार 1985 में शानदार प्रदर्शन किया था। तब पार्टी ने 39.3 फीसदी वोट प्रतिशत और 196 सीट जीती थीं, वहीं 1990 के चुनाव में पार्टी 71 सीटों पर सिमट गई, पर उसका वोट प्रतिशत 24.78 फीसदी रहा।
इस तरह घटता गया वोट प्रतिशत
1995 में पार्टी 29 सीट जीती और वोट प्रतिशत 16.27 फीसदी रहा। 2000 में पार्टी 23 सीट जीती और 11.6 फीसदी वोट हासिल किए। 2005 में मध्यावधि चुनाव ने पार्टी को रसातल में धकेल दिया। पार्टी 10 सीट जीतने में कामयाब हुई और उसे सिर्फ 5 फीसदी वोट मिले। इसी साल अक्तूबर में हुए चुनाव में पार्टी 9 सीटों पर सिमट गई और उसे 6.9 फीसदी वोट मिले। इसके बाद, 2010 के चुनाव में पार्टी केवल चार सीट ही जीत सकी और उसका मत प्रतिशत 8.37 फीसदी रह गया, 2015 में पार्टी ने 27 सीट जीती और उसका वोट प्रतिशत 6.66 फीसदी था।
कांग्रेस की 5 बड़ी गलतियां : संगठन पहुंचा हाशिए पर
महागठबंधन में कांग्रेस की भूमिका सबसे कमज़ोर कड़ी साबित हुई। पार्टी की गलतियां केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि रोजमर्रा के प्रचार में साफ दिखाई दीं।
- टिकट बंटवारे पर खुला विद्रोह : समस्तीपुर, सीतामढ़ी और नालंदा जैसे जिलों में टिकट वितरण ने खुले विद्रोह को जन्म दिया। कार्यकर्ताओं ने हम राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के सिपाही नहीं लिखी तख्तियां लेकर प्रदर्शन किया। पार्टी के जिला अध्यक्षों को भी यह मानना पड़ा कि दिल्ली में बैठे लोग जमीन नहीं समझते, इसलिए गलत चेहरे चुन लेते हैं।
- बूथ प्रबंधन में बड़ी चूक : चुनाव के दिन, बेगूसराय, बक्सर और जहानाबाद के रिपोर्टिंग कक्ष में यह बात आम चर्चा में थी कि कांग्रेस के कई मतदान केंद्रों पर पोलिंग एजेंट ही नहीं पहुंचे। करीब 80% मतदान केंद्रों पर पार्टी के पास प्रभावी उपस्थिति नहीं थी।
- राहुल की रैलियों का आकर्षण खत्म : भागलपुर में राहुल गांधी की सभा में शुरुआत में कुर्सियां खाली रहीं। स्थानीय नेताओं को भीड़ जुटाने के लिए यह अफवाह फैलानी पड़ी कि तेजस्वी खुद आ रहे हैं, जबकि वह आने वाले नहीं थे।
- बागी उम्मीदवारों ने किया नुकसानः कटिहार, दरभंगा ग्रामीण, और हिलसा जैसी महत्वपूर्ण सीटों पर कांग्रेस के बागी उम्मीदवारों ने महागठबंधन को सीधा नुकसान पहुंचाया। कटिहार में कांग्रेस के बागी ने 11,000 वोट काट दिए, जिसके परिणामस्वरूप आधिकारिक उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा।
- सीट समन्वय का पतन : पूर्णिया में आरजेडी और कांग्रेस के बीच टकराव इतना बढ़ गया कि आरजेडी के समर्थकों ने कांग्रेस के कार्यालय पर वोट बांटने का अड्डा कहकर ताला लगा दिया। यह समन्वय की पोल खोलता है, जिसे दोनों दलों ने बाद में गलतफहमी कहकर टालने की कोशिश की।
कांग्रेस में उठने लगी आत्ममंथन की आवाज
चुनाव के रुझान शुरू होते ही साफ हो गया था कि कांग्रेस बिहार के सियासी इतिहास में सबसे खराब प्रदर्शन करने जा रही है। राज्य में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की वोटर यात्रा, एसआईआर व वोट चोरी का कथित हाइड्रोजन बम फुस्स होने के बाद पार्टी नेताओं ने ही आत्ममंथन की आवाज मुखर कर दी है। संगठन की खामियों पर मंथन की मांग जोर पकड़ने लगी है। कांग्रेस पिछली बार 70 सीटों में से 19 पर जीत हासिल कर किसी तरह इज्जत बचाने में सफल रही थी, लेकिन इस बार उसे उतनी सीटें भी नसीब नहीं हुईं। पार्टी पिछली बार के 9.48 फीसदी वोट शेयर के करीब भी नहीं पहुंच पाई है।
पूरे नतीजे आने से पहले ही कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने यह कहकर अपनी निराशा जाहिर कर दी, अगर नतीजे भी रुझानों के अनुरूप रहे तो हमें गंभीरता से मंथन करना होगा। उन्होंने कहा, याद रखें, हम गठबंधन में वरिष्ठ सहयोगी नहीं थे और राजद को भी अपने प्रदर्शन पर ध्यान से विचार करना होगा।
वहीं, कांग्रेस नेता और पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार ने कहा, नतीजा संगठन की कमजोरी को दर्शाता है। किसी भी चुनाव में दल संगठनात्मक शक्ति पर निर्भर करता है। अगर संगठन कमजोर हो और प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पा रहा हो, तो परिणाम प्रभावित होते हैं। हमारे उम्मीदवार बहुत सक्षम हैं, पर और भी बेहतर प्रत्याशी चुने जा सकते थे।
सिर्फ बैठकर सोचने से कुछ नहीं होने वाला
थरूर ने कहा, सिर्फ बैठकर समीक्षा करने से कुछ नहीं होने वाला है। हमें आत्मचिंतन करना होगा कि गलतियां कहां हुईं। क्या रणनीतिक, संदेशात्मक या संगठनात्मक स्तर पर पार्टी नाकाम साबित हुई। मुझे तो बिहार में प्रचार के लिए बुलाया नहीं गया था, पर पार्टी के प्रदर्शन की समग्रता की जांच करना जरूरी है। हाल में कांग्रेस से नाता तोड़ने वाले वरिष्ठ नेता शकील अहमद ने कहा, जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की समीक्षा होनी चाहिए। टिकट बंटवारे पर लगे आरोपों की जांच होनी चाहिए।

