MP में दिसंबर में सबसे अधिक रिश्वतखोर पकड़े गए …सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार, पटवारी अव्वल !!!
MP में दिसंबर में सबसे अधिक रिश्वतखोर पकड़े गए, इस विभाग में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार, पटवारी अव्वल
इस वर्ष दिसंबर में लोकायुक्त पुलिस ने 13 मामलों में लगभग इतने ही आरोपितों को रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा है। इनसे लगभग पौने दो लाख रुपये रिश्वत की राशि …और पढ़ें
MP में दिसंबर में सबसे अधिक रिश्वतखोर पकड़े गए,भोपाल। दिसंबर 2024 में पूर्व परिवहन आरक्षक सौरभ शर्मा के यहाँ लोकायुक्त पुलिस के छापे और विभागों द्वारा पारदर्शिता के दावों के बीच माना जा रहा था कि रिश्वतखोरों में डर आएगा, लेकिन लोकायुक्त पुलिस के ट्रैप के मामलों को देखें तो स्थिति बेहद निराशाजनक है। इस वर्ष दिसंबर में लोकायुक्त पुलिस ने 13 मामलों में लगभग इतने ही आरोपितों को रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा है। इनसे लगभग पौने दो लाख रुपये रिश्वत की राशि जब्त की गई है। हालांकि, इन मामलों में आरोपितों की संख्या 15 से ऊपर है, जबकि नवंबर में रिश्वत लेने के केवल चार प्रकरण ही सामने आए थे।
इन कार्यों के लिए ली गई रिश्वतलोकायुक्त की जांच में सामने आया है कि मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्यों के लिए रिश्वत मांगी गई:
कृषि से संबंधित दुकानों के लाइसेंस देने या उनके नवीनीकरण के लिए।
वेतन या अन्य देयकों (बिलों) के भुगतान के लिए।
जाति प्रमाण पत्र की जांच को दबाने के लिए।
बिजली कनेक्शन देने या लाइन क्षमता में बदलाव करने के एवज में।
प्रमुख मामले: संबल योजना और जाति प्रमाण पत्र की जांच
केस 1: नीमच निवासी भारत कुमार भट्ट ने शिकायत की थी कि उनके भाई के निधन के बाद संबल योजना का लाभ दिलाने के लिए नगर परिषद जीरन के कंप्यूटर ऑपरेटर चैनसुख बैरागी ने 20 हजार रुपये रिश्वत मांगी थी। लोकायुक्त उज्जैन की टीम ने उसे 7 हजार रुपये की पहली किस्त लेते रंगे हाथ पकड़ा।
केस 2: भोपाल में सहायक ग्रेड-एक जीवन लाल बरार ने छिंदवाड़ा वाणिज्यिक कर कार्यालय में पदस्थ ऊषा दाभीरकर की जाति प्रमाण पत्र संबंधी जांच दबाने के लिए 5 लाख रुपये मांगे थे। उसे भोपाल में प्रशासन अकादमी के सामने 1 लाख रुपये लेते हुए गिरफ्तार किया गया।
विशेषज्ञ की राय: सजा में देरी से खत्म हुआ कानून का डर“लोकायुक्त जैसी संस्था का काम छोटे-छोटे कर्मचारियों को ट्रैप करना नहीं है, यह कार्य जिला पुलिस भी कर सकती है। लोकायुक्त संगठन को प्रथम और द्वितीय श्रेणी अधिकारियों द्वारा पद के दुरुपयोग संबंधी बड़े मामलों को पकड़ना चाहिए। निर्णय में देरी और कमजोर विवेचना के चलते भ्रष्टाचारियों को लगता है कि वे बच जाएंगे, जिससे उनमें कानून का डर खत्म हो गया है।” – अरुण गुर्टू, पूर्व डीजी, लोकायुक्त

