जेल चकमा की मौत के बहाने और मायने !
जेल चकमा की मौत के बहाने और मायने
आपका नाम एंजेल यानि देवदूत या फरिश्ता होने का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि लोग आपसे घृणा नहीं कर सकते. आपकी जान नहीं ले सकते. एंजेल चकमा अपनी अलग पहचान के कारण मौत के घाट उतार दिया गया. अब पूरी उत्तराखंड सरकार और पुलिस ये साबित करने में लगी है कि एंजेल की हत्या नस्लीय घृणा का नहीं बल्कि साधारण झगडे की वारदात है.
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में स्थित जिज्ञासा यूनिवर्सिटी में हाल में ही एक त्रिपुरा के छात्र एंजेल चकमा की हत्या हो गई थी. यूनिवर्सिटी के कैंटीन में विवाद हुआ और उसे कथित तौर पर चाकू मार दिया जाता है. इस हमले में वह घायल हो जाता है और बाद में इलाज के दौरान उसकी मौत हो जाती है. अब पीड़ित परिवार को उत्तराखंड सरकार के द्वारा आर्थिक मदद भेजी है.
एंजेल त्रिपुरा का रहने वाला था. देहरादून एमबीऐ करने आया था. लेकिन उसका ये सपना पूरा होने से पहले ही उसकी हत्या कर दी गई. एंजल का गुनाह उसका कद, काठी, रंग और चेहरे की बनावट थी. उसके उपर फब्तियां कसी जा रहीं थी. उसे चायनीज मोमोज कहा जा रहा था.एंजेल ने इसका विरोध किया और मारा गय. उसका छोआ भाई माइकल भी उसे बचा नहीं सका.
भारत का दुर्भाग्य है कि भारत का बहुसंख्यक समाज नये भारत की विविधता को आजादी के 78 साल बाद भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है. इस अस्वीकृति के पीछे वो घृणा है जो अपने आपको श्रेष्ठ समझने वाले चित पावन समाज ने पैदा की है.. इन चितपावनों के लिए महाराष्ट्र में गैर मराठी विदेशी है, श्याम वर्ण का मद्रासी हो या चपटी नाक वाला पूर्वोत्तर का कोई भी व्यक्ति चिंकी है, चाइनीज मोमोज है लेकिन वो भारतीय नहीं है.मुसलमान और ईसाई भी चित पावन दिमागों को भारतीय नहीं लगते. वे ही लिंचिंग के शिकार होते हैं.
नस्ली घृणा ही देश को न सिर्फ कमजोर कर रही है बल्कि राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौतियां बढाती जा रही है. रंग, रुप, जाति, दर्म, कद, काठी के आधार पर भारतीयता तय करने वाले लोग न संविधान जानते हैं और न राष्ट्रीयता. सात आठ दशक बाद भी पूर्वोत्तर को देश की मुख्यधारा में शामिल न कर पाने के लिए सिर्फ राजसत्ता नहीं बल्कि हमारा चित पावन दिमाग़ है जो दर असल चित पावन नही, अपवित्र है.
उत्तराखंड सरकार नेएंजल चकमा की हत्या पर पर्दा डालने के लिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 और नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के तहत पहली किश्त के रूप में 4 लाख 12 हजार 500 रुपये पीड़ित परिवार को चेक के माध्यम से भेज कर मामले पर धूल डालने की कोशिश की है.
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पीड़ित परिवार से फोन पर बात कर इस दुखद घटना पर गहरा दुःख जताया. उन्होंने बताया कि अब तक पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है जबकि एक आरोपी की गिरफ्तारी के लिए इनाम घोषित कर दिया गया है. मुख्यमंत्री ने परिवार को हर संभव मदद का भरोसा दिलाया और कहा कि उत्तराखंड सरकार मामले में दोषियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है.
सवाल ये है कि आज की सिंगल और डबल इंजन की सरकारें नस्ली हत्याओं और मोब लिंचिंग के आरोपियों से मुकदमे वापस लेने का प्रयास करेगी तो इस देश में अखलाख हों या एंजल चकमा बेमौत मारे जाते रहेंगे.चर्च जलते रहेंगे, शांता क्लाज के पुतले तोडे जाते रहेंगे. जरुरत नकली राष्ट्रवाद को पोषित करने की नहीं बल्कि असली राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित करने की है.

