दिल्लीमध्य प्रदेश

हमारे हर साफ शहर में छुपा होता है एक और गंदा शहर

हमारे हर साफ शहर में छुपा होता है एक और गंदा शहर

इंदौर में दूषित पेयजल की आपूर्ति से कई लोगों की मौत की खबर हमारी नगर-योजना ही नहीं, हमारी व्यवस्था की विषमता पर भी एक त्रासद टिप्पणी की तरह आई है। इंदौर पिछले कई वर्षों से हिंदुस्तान में स्वच्छता के शिखर की तरह पेश किया जाता रहा है। इतने स्वच्छ शहर में ऐसा गंदा पानी कहां से चला आया, जिसे पीकर लोग बीमार पड़ गए और चल बसे? क्या स्वच्छता सर्वेक्षण में गड़बड़ी हुई है?

निश्चय ही यह कहना इंदौर के साथ अन्याय होगा। इंदौर अगर शिखर पर है तो अपने साफ-सुथरे होने की वजह से ही है। लेकिन अगर इंदौर में जानलेवा पेयजल की आपूर्ति को व्यवस्था की चूक का इकलौता मामला मान लेंगे तो उस बड़ी सच्चाई को अनदेखा करेंगे, जो हमारे शहरों और हमारी पूरी नगर-योजना पर भारी पड़ती है।

बीते दस साल से हिंदुस्तान में स्मार्ट सिटी मिशन जारी है। देश के सौ शहरों को इस मिशन के तहत चुना गया है। वहां अरबों रुपए खर्च हो चुके हैं। लेकिन इन तमाम शहरों में अब तक खुदी हुई सड़कें, अधूरी पड़ी सीवर लाइनें, अधबने पुल ही दिखाई पड़ते हैं। यह पता चलता है कि स्मार्ट सिटी के नाम पर हमने अधकचरे ढंग से अपने शहरों को एक बेडौल कोलाज में बदल डाला है, जिसके कुछ हिस्से बेहद चमकते हुए हैं और कुछ बेहद अंधेरे और गंदगी में डूबे हुए।

दरअसल हमारे शहरों को नगर-योजना नहीं, हमारी सामाजिक-आर्थिक विषमता बरबाद कर रही है। ध्यान से देखें तो इन शहरों को हमारे सबसे गरीब लोग संभाले रखते हैं, साफ-सुथरा बनाते हैं। गांव-देहातों और दूरस्थ कस्बों से आए ये लोग इन शहरों के सबसे जरूरी काम सबसे सस्ती दरों पर निबटाते हैं।

वे हमारी गाड़ियां साफ करते हैं, हमारा कचरा उठाते हैं, हमारे कपड़ों में इस्त्री करते हैं, उनकी पत्नियां हमारे घरों में बाइयों की तरह काम करती हैं- वे न हों तो ये शहर रहने लायक न बचें। और ये लोग रहते कहां हैं? इन्हीं खाते-पीते मोहल्लों, सोसायटियों के पीछे की किन्हीं गंदी-अंधेरी गलियों में।

बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं, जो शहर के ही बाशिंदे होते हैं, लेकिन तरक्की की रफ्तार में पीछे छूट जाते हैं। वे पुराने मोहल्लों की तंग गलियों में अपने पुश्तैनी घरों में ठुंसे होते हैं और किराने की छोटी दुकानें चलाने से लेकर तमाम भव्य दुकानों में कर्मचारियों की तरह काम करते हैं। इनके साथ भी शहर सौतेला व्यवहार करता है।

तो हर शहर में कम से कम दो शहर होते हैं- एक वह जो स्वच्छता सर्वेक्षण में शामिल होता है और दूसरा वह जो इस साफ-सुथरे शहर को कुछ और चमकाने के काम में जुता रहता है- भले ही किसी संकट में- मसलन कोविड में- उसे उन्हीं शहरों को छोड़कर जाना पड़े, जिन्हें उसने अपने खून और पसीने से बसाया है।

इस विषयांतर को छोड़ें। असली बात यह है कि इंदौर में ही नहीं, हिंदुस्तान के सारे शहरों में ऐसे अनेक भागीरथपुरा हैं, जिनकी कोई परवाह नहीं करता- उनके लोगों की शिकायतों की ओर ध्यान नहीं देता- जब तक वे अस्पताल नहीं पहुंच जाते। शहरों के भीतर छुपे ये शहर भारत के भीतर छुपा एक भारत बनाते हैं- अंधेरे में डूबा और गंदगी में बजबजाता भारत। इस भारत की ओर देखने की फुरसत किसी को नहीं है।

फिर इस भारत में वे गांव भी चले आते हैं, जो उपेक्षा का अलग तरह का आईना हैं। फिर दो शहरों या दो मुल्कों का यह फासला सिर्फ आर्थिक नहीं रह जाता- इसके सामाजिक आयाम भी होते हैं। देश के दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और बहुत सारे पिछड़े माने जाने वाले समुदाय इस दूसरे भारत में बसते हैं।

क्या यह एक तरह का नस्ली परायापन नहीं है, जिसके शिकार लोग एक दिन अपने पानी से बदबू आने की शिकायत करते हैं और फिर कुछ दिन बाद मर जाते हैं? इनको लेकर सवाल करने पर मंत्री अपशब्द कहने लगते हैं। यह नजरिया भी बताता है कि हम किसकी कितनी परवाह करते हैं।

हर शहर में दो शहर होते हैं- एक वह जो स्वच्छता सर्वेक्षण में शामिल होता है और दूसरा वह जो इस साफ-सुथरे शहर को कुछ और चमकाने के काम में जुता रहता है- भले ही किसी संकट में उसे उन्हीं शहरों को छोड़कर जाना पड़े।

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