दुनिया ताकत और दमखम के युग में प्रवेश कर चुकी है !!!!
देखते ही देखते अमेरिका वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को उठाकर ले आया और अब उन पर नार्को-टेररिज्म समेत दूसरे कथित अपराधों के लिए मुकदमे चलाए जाएंगे। मादुरो कोई संत नहीं हैं। उन पर चुनावों में धांधली, मानवाधिकारों का उल्लंघन और बल प्रयोग के जरिए अनुचित रूप से सत्ता में बने रहने के आरोप लगते रहे हैं। जब कोई नेता खुलेआम ताकत का इस्तेमाल करने को जायज मानता है, तो क्या उसे किसी और बड़ी ताकत के द्वारा बल प्रयोग करके सत्ता से हटाया जाना गलत है? इसका उत्तर देना आसान नहीं।
अभी कुछ सालों पहले तक सम्प्रभु देश यूं ही किसी पर हमला नहीं कर बैठते थे। महज पांच साल पहले तक हमें लगता था कि हम शांति के एक अभूतपूर्व दौर में हैं। मानवता विकसित हो चुकी है और दुनिया के देशों ने ‘जियो और जीने दो’ का पाठ सीख लिया है। यह समझ बन चुकी थी कि युद्धों से कोई हल नहीं निकलता।
हम कितनी बड़ी गलतफहमी में थे! शायद मनुष्य लंबे समय तक सामंजस्य से रह ही नहीं सकते। इतिहास पर नजर डालने पर भी यही लगता है कि हम हमेशा ही युद्ध और शांति के बीच झूलते रहे हैं। हिंसा, टकराव, स्वार्थ, लालच और सत्ता की भूख- ये सब हमारे डीएनए में गहरे पैठे हैं और बार-बार सामने आते रहते हैं।
आज की दुनिया में एक सच्चाई निर्विवाद है। हम अल्ट्रा-हार्ड पावर के दौर में जी रहे हैं। यदि आपके पास वास्तविक शक्ति है- इतनी कि आप किसी पर जो चाहें थोप सकें और दूसरा पक्ष पलटकर लड़ भी न सके- तो आप कुछ भी कर सकते हैं। यूक्रेन पर रूस का धावा, इजराइल द्वारा गाजा का विध्वंस और अब वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई- ये सब साबित करते हैं कि ताकत का युग कभी बीता ही नहीं था। नैतिकता, सहमति-निर्माण, बातचीत, संवाद और सॉफ्ट पावर जैसे शब्द आज अप्रासंगिक मालूम हो रहे हैं। आखिर कौन-सा बड़ा वैश्विक संघर्ष हाल के सालों में बातचीत से सुलझा है? यूएन ने आखिरी बार कब कुछ किया था?
भारत के लिए इसके मायने स्पष्ट हैं : हार्ड पावर का निर्माण एक राष्ट्रीय प्राथमिकता होना चाहिए। हार्ड पावर मूलतः दो-तीन स्रोतों से आती है, जो अकसर आपस में जुड़े होते हैं। पहला है, विशाल आर्थिक शक्ति। इससे न केवल बड़ा बाजार बनता है, बल्कि सरकार के लिए भी इतना राजस्व पैदा होता है कि वह दूसरे स्रोत यानी प्रतिरक्षा को साकार कर सके।
आज सैन्य शक्ति का अर्थ केवल पर्याप्त सैनिक और उपकरण ही नहीं, सबसे उन्नत सैन्य तकनीक भी है। टैंक भले प्रभावशाली दिखते हों, लेकिन आज की लड़ाइयां उन्नत ड्रोन और जीपीएस-निर्देशित हथियारों से लड़ी जाती हैं। पश्चिम से विमान और हथियार खरीद लेने भर से भी आप सैन्य-ताकत नहीं बन सकते।
तीसरा स्रोत है, प्रमुख गठबंधन और साझेदारियां। इजराइल और ब्रिटेन जैसे देश वैश्विक भू-राजनीति में अपने आकार से कहीं अधिक प्रभाव इसलिए रखते हैं, क्योंकि उन्हें अमेरिका का ठोस समर्थन प्राप्त है। बदले में, अमेरिका के प्रति उनकी निष्ठाएं भी अडिग रहती हैं। कागज पर गुटनिरपेक्ष रहना भले ही आकर्षक और स्वतंत्र लगे, लेकिन वास्तविक दुनिया में यह आपको अधिक असुरक्षित बना देता है।
इकोनॉमी, साइंस और आधुनिकता के स्तम्भों पर निर्मित राष्ट्र के पास हार्ड पावर होने की संभावना अधिक होती है। इसका क्लासिक उदाहरण अमेरिका है, जिसकी बराबरी आज भी कोई नहीं कर सकता। अगर विदेशों में लोग चिकन टिक्का मसाला खाते हैं, किसी यूरोपीय क्लब में बॉलीवुड के हिट गानों पर नाचते हैं या कोल्हापुरी चप्पल पहनते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि वैश्विक मंच पर हमारा प्रभाव बढ़ गया है।
हमें आर्थिक विकास और सैन्य निवेश के जरिए अपनी हार्ड पावर क्षमताएं विकसित करनी होंगी। संभव है कि हमारे पड़ोस में चल रहे संघर्षों को सुलझाने के लिए भी वही कारगर हो। नैतिकता, सहमति-निर्माण, बातचीत, संवाद और सॉफ्ट पावर जैसे शब्द आज अप्रासंगिक मालूम हो रहे हैं। आखिर कौन-सा बड़ा वैश्विक संघर्ष हाल के सालों में बातचीत से सुलझा है? यूएन ने आखिरी बार कब कुछ किया था?

