अपने ही फैसलों से बार-बार पलट क्यों जाती है अदालत ?
जब सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसलों को बार-बार बदलता है तो यह सार्वजनिक चिंता का विषय बन जाता है। वर्ष 2025 में शीर्ष अदालत ने अपने आठ फैसलों को पलट दिया। कई आदेश तो पारित होने के कुछ ही सप्ताह में बदले गए। ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने अतीत में अपने फैसलों में बदलाव या संशोधन न किए हों, लेकिन ऐसा अकसर तब हुआ था, जब किसी पक्ष ने किसी मामले की समीक्षा के लिए बड़ी पीठ में अपील की हो। लेकिन हालिया घटनाक्रम इसलिए अलग हैं, क्योंकि ये फैसले कोर्ट के भीतर ही पलट दिए गए। दूसरे शब्दों में, सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर मामलों को अन्य पीठ के पास भेजा, जिसने पहली बेंच के निर्णय को बदल दिया।
विधि विशेषज्ञों का कहना है कि सर्वोच्च अदालत में ऐसा पहली बार हुआ है। यदि यह चलन जारी रहता है तो ये न्यायशास्त्र के भविष्य के लिए चिंताजनक है, क्योंकि इससे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की वैधता कमजोर होगी। जिन विषयों पर फैसले वापस लिए गए, उनमें न्यायिक अनुशासन से लेकर पर्यावरण मामले, कॉर्पोरेट मुद्दे और आवारा कुत्तों तक के प्रकरण शामिल हैं।
गौर करने वाली बात यह है कि बदले गए आठ फैसलों में से तीन जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने पारित किए थे, जो भविष्य में भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बनने जा रहे हैं। यह भी दिलचस्प है कि इन फैसलों को बदलने की शुरुआत हाल ही में सीजेआई पद से सेवानिवृत्त हुए जस्टिस बीआर गवई के कार्यकाल में हुई। मौजूदा सीजेआई सूर्यकांत के कार्यकाल में भी यह सिलसिला जारी है। सबसे चौंकाने वाला उलटफेर अरावली खनन से जुड़े फैसले का था।
तत्कालीन सीजेआई गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने 20 नवंबर को खनन नियमन के लिए एक सरकारी समिति द्वारा सुझाई गई ऊंचाई पर आधारित परिभाषा को मंजूर कर लिया था। पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरोध के बाद सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस फैसले पर रोक लगा दी और इस मुद्दे के पुनर्मूल्यांकन के लिए विषय विशेषज्ञों की एक नई समिति गठित कर दी।
नए आदेश में कहा गया कि ‘जनभावना’ को देखते हुए पूर्व के फैसले की समीक्षा की जा रही है। हालांकि सार्वजनिक विरोध की प्रतिक्रिया में न्यायिक पुनर्विचार का कदम तो स्वागत योग्य है, लेकिन यह सवाल भी खड़े करता है कि पहले वाला फैसला किस तरह किया गया था। क्या पिछली पीठ ने दिल्ली और हरियाणा के ‘ग्रीन लंग्स’ मानी जाने वाली अरावली पहाड़ियों के लिए सरकारी समिति की ऊंचाई-आधारित परिभाषा को स्वीकारने से पहले पर्याप्त मंथन नहीं किया? या फिर यह स्टे लोकप्रियता बटोरने का प्रयास है?
पूर्व के फैसलों को पलटने की टाइमिंग से तो यह रहस्य और गहरा जाता है। अरावली में खनन को हरी झंडी देने वाला पहला फैसला तत्कालीन सीजेआई गवई के सेवानिवृत्त होने से महज तीन दिन पहले, 20 नवंबर को आया। इसके पांच सप्ताह बाद 29 दिसंबर को इस फैसले को पलट दिया गया।
शीतकालीन अवकाश के बीच सीजेआई सूर्यकांत ने इसके लिए एक विशेष पीठ गठित की। अदालतों से, खासकर सुप्रीम कोर्ट से अपेक्षा की जाती है कि वे कोई आदेश पारित करने से पहले सभी कानूनी पहलुओं पर सावधानी से विचार करें। एक बार पारित होने पर आदेश सर्वमान्य होना चाहिए।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने फैसलों को वापस लेने के इस नए चलन के खतरों को लेकर चेतावनी दी थी। और यह चेतावनी अरावली में खनन से जुड़े फैसले को बदलने के ठीक पहले आई थी। स्पष्ट है कि उनकी सावधानी भरी बातों को अनसुना कर दिया गया।
दोनों न्यायाधीशों ने कहा था कि ‘किसी विधिक मसले पर किसी पीठ द्वारा दिए गए फैसले से विवाद समाप्त हो जाना चाहिए, क्योंकि वह अंतिम होता है… लेकिन किसी फैसले को केवल इस आधार पर री-ओपन किया जाए, क्योंकि बाद में कोई दूसरा दृष्टिकोण अधिक बेहतर प्रतीत होता है, इससे तो अनुच्छेद 141 को लागू करने का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा…। इससे न्यायालय की अथॉरिटी और निर्णयों के मूल्य कमजोर होंगे।’
सुप्रीम कोर्ट अभी सरकारी दबाव, जनहित और संविधान के बीच एक संतुलित लाइन पर चल रहा है। वर्ष 2025 ने इन तीनों के बीच संतुलन बनाने की कठिनाइयों को उजागर किया है। अब देखना यह है कि नए सीजेआई के साथ 2026 क्या लेकर आता है। शासन में संवैधानिकता क्या है, इसे तय करने के लिए न्यायपालिका ही अंतिम अथॉरिटी है।
अदालतों से, खासकर सुप्रीम कोर्ट से अपेक्षा की जाती है कि वे कोई आदेश पारित करने से पहले सभी कानूनी पहलुओं पर सावधानी से विचार करें। एक बार पारित होने पर आदेश सर्वमान्य होना चाहिए।

