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यूजीसी के नए नियमों पर हल्ला क्यों?

यूजीसी के नए नियमों पर हल्ला क्यों?

यूजीसी के नए नियमों पर इतना हल्ला क्यों है? दरअसल, नए नियमों में जाति-आधारित टिप्पणियों में शामिल वर्ग का दायरा बढ़ा दिया गया है। पहले इस दायरे में केवल अनुसूचित जातियां और जनजातियां ही शामिल थीं। कार्रवाई में सख्ती भी कुछ कम थी।

सही भी है- मान सकते हैं कि दलित वर्ग के साथ वर्षों अन्याय हुआ था और इस वर्ग को ऊपर उठाने के लिए उसके साथ हुए अन्याय की भरपाई करने के लिए ऐसा करना उचित रहा होगा। लेकिन अब इस दायरे में ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक पिछड़ा वर्ग भी जुड़ गया है। केवल सामान्य या अनारक्षित वर्ग ही इस दायरे से बाहर रह गया है।

विरोध करने वालों का कहना है कि नए नियमों के कारण सामान्य वर्ग अपने आप ही आरोपों से घिर जाएगा। कहना यह चाहिए ​कि वह एक तरह से डिफॉल्ट अपराधी घोषित हो जाएगा। आश्चर्य यह है कि सामान्य वर्ग को तो कोई राहत नहीं है लेकिन कहा जा रहा है कि आरक्षित वर्ग अगर झूठी शिकायत कर दे तो भी उसके लिए किसी दण्ड का प्रावधान तक नहीं किया गया है। विरोध का एक बड़ा कारण यह भी है।

कहा यह भी जा रहा है कि सरकारें पिछड़ा वर्ग की सहानुभूति पाने के लिए ऐसा करती रहती हैं। हो सकता है कि भारी विरोध के बाद ये नए नियम वापस ले लिए जाएं या उनमें सुझाए जाने वाले उचित संशोधन कर दिए जाएं। लेकिन नियम वापसी के बाद भी सरकार के प्रति उन वर्गों की सहानुभूति तो बनी ही रहेगी! विरोध करने वालों का कहना है कि सरकार अपना यही उद्देश्य पूरा करना चाहती है।

वैसे, समग्र के नकार और केवल टुकड़ों को वास्तविक बताने की राजनीति आजादी के पहले भी थी और आज भी है। अन्याय के अनवरत शिकार छोटे-छोटे समूहों को नेता पहले उकसाते रहे, फिर कोरे आश्वासनों की अफीम खिलाते रहे और अंतत: इन्हें अतिवाद की हद तक जाने देते रहे। बाद में चूंकि उन कुछ टुकड़ों की सभी मांगें मानी नहीं गईं, इसलिए वे राजकाज के पूरे तंत्र और आखिरकार पूरे देश को ही अन्यायपूर्ण बताने लगे थे।

यही वजह थी कि टुकड़ों की राजनीति के उल्टे पड़ जाने पर वही सत्ताधीश इन टुकड़ों को इन बिखरी हुई जातियों को ठोक-पींज कर इकट्ठा करते हुए पाए गए और कहते रहे कि हम समग्रता को पहचान देने या छोटे-छोटे वर्गों को एकजाई करने के लिए ऐसा कर रहे हैं। क्योंकि समग्र सामाजिक विकास की खातिर ऐसा करना अवश्यम्भावी हो गया है। अनिवार्य हो गया है।

आजादी के पहले हमारे देश में अंग्रेजों ने भी यही किया था। उन्होंने पहले समाज के छोटे वर्गों को अलग पहचान देकर उन्हें तोड़ा। उनकी सहानुभूति अर्जित की और ​फिर उन्हीं का समर्थन पाने की मजबूरी के चलते उन्हें जोड़ने का उपक्रम भी किया। वर्षों वे अपनी इन्हीं तिकड़मों के भरोसे राज करने में सफल भी हुए।

दरअसल, सियासत की कोई आत्मा नहीं होती। जिस दिन कोई भी सियासतदान लोगों के पास वोट मांगने नहीं जाएगा, उस दिन सियासत की आत्मा जाग उठेगी। यह भीतर के आत्मबल और बाहर की सत्ता का अंतर है। यह भयमुक्त होने और भयग्रस्त होने का अंतर है।

चूंकि राजनीति की आत्मा नहीं होती, इसलिए उसमें भीतरी शक्ति भी नहीं होती। …और इसीलिए वक्त पाकर हर सत्ता के हाथों अपनी चेतना का विज्ञान खो जाता है। आश्वासनों के भरोसे सिंहासन पाने के खयाल उसी के पैरों की जंजीर बन जाते हैं।

हमारे प्राचीन इतिहास में एक नाम आता है- मीरदाद। कुछ लोग उनके पास यह सवाल लेकर पहुंचे कि हम इतने उदास क्यों हैं? मीरदाद ने कहा- इसका जवाब तो वह हवा ही दे सकती है, जिसमें हम सांस लेते हैं। वह हवा जो हमारे ही खयालों के जहर से भरी हुई है।

यही जहर हमारे घर-आंगन में, हमारी गलियों में और हमारे दरो-दीवार पर अंकित हो गया है। यही वजह है कि हम अब चेतना या महाचेतना के वारिस नहीं हैं। …आज हम चीखों के वारिस हैं, जख्मों के वारिस हैं और सड़कों पर बहते हुए लहू के वारिस हैं।

दरअसल, आसन और सिंहासन, सत्ता और सरकार का कर्तव्य ही लोगों को भयग्रस्त करना हो चला है। वे लोगों को सिर्फ शारीरिक गुलामी ही नहीं देते, जेहनी और मानसिक गुलामी भी देते हैं। इसीलिए… सिर्फ इसीलिए हम रोज अपनी कोख से खुशियों का सूरज जन्मते हैं और रोज हमारा सूरज यतीम हो जाता है।

नए नियमों के कारण सामान्य वर्ग आरोपों से घिर जाएगा?

विरोध करने वालों का कहना है कि नए नियमों के कारण सामान्य वर्ग आरोपों से घिर जाएगा। वह डिफॉल्ट अपराधी घोषित हो जाएगा। कहा जा रहा है कि आरक्षित वर्ग झूठी शिकायत कर दे तो भी उसके लिए दण्ड का प्रावधान नहीं है।

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