एआई का फायदा उठाना है तो शिक्षा पर ज्यादा फोकस करें
पिछले दो सालों में जिस तरह से लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (एलएलएम) ने तरक्की की है, उससे यह अंदेशा जताया जाने लगा है कि एआई जल्द ही कॉलेज शिक्षा, विशेषकर लिबरल आर्ट्स की पढ़ाई को अप्रासंगिक बना देगा। ऐसे में युवाओं के लिए कॉलेज छोड़कर सीधे काम पर लगना बेहतर होगा। मैं इससे पूरी तरह असहमत हूं।
व्यावहारिक अनुभव के जरिये सीखना तो मूल्यवान है ही, लेकिन यह तभी कारगर होता है, जब लोगों को इस बात की अच्छी समझ हो कि कौन-सी नौकरियां और स्किल्स भविष्य में भी मांग में रहेंगे। यह सच है कि रोजगारों का भविष्य अनिश्चित है। लेकिन युवाओं को कॉलेज छोड़कर जल्द से जल्द श्रम बाजार में प्रवेश करने की सलाह देना तो भ्रामक ही कहलाएगा।
आधुनिक एआई के अग्रदूत कहलाने वाले जेफ्री हिंटन ने कभी अपनी फील्ड में हो रही घटनाओं की तुलना ‘कोहरे’ में रास्ता खोजने से की थी : यह कि आप सामने का रास्ता तो देख सकते हैं, लेकिन उसके आगे क्या है, यह नहीं।
ऐसे में शिक्षकों के सामने चुनौती यह है कि वे छात्रों को ऐसे हालात में प्रभावी ढंग से काम करने के लिए तैयार करें। इसका समाधान उन्हें उन कार्यों के लिए प्रशिक्षित करना नहीं है, जो जल्द ही अप्रचलित हो सकते हैं। बल्कि उन्हें ज्यादा एडाप्टेबल बनाना है।
इस नजरिये से तो शिक्षा- और विशेष रूप से उच्च शिक्षा की भूमिका पहले से कहीं महत्वपूर्ण हो जाती है। चूंकि हमें यह नहीं पता कि भविष्य में कौन-सी स्किल्स मांग में होंगी, इसलिए बुनियादी चीजों की ओर लौटना अनिवार्य है।
लिबरल शिक्षा इस पर जोर देती है कि कैसे सोचा जाए, न कि इस पर कि क्या किया जाए। यह छात्रों को तर्क करना, ध्यान से पढ़ना, स्पष्ट रूप से लिखना और साक्ष्यों का मूल्यांकन करना सिखाती है। ये कौशल दूसरी तकनीकी दक्षताओं की तुलना में कहीं बेहतर ढंग से समय की कसौटी पर खरे उतरते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि तकनीकी की अनदेखी की जाए। इसके उलट, छात्रों को एआई के साथ काम करना सीखना ही होगा। लेकिन इसका मकसद उन्हें एआई उपकरणों का निष्क्रिय उपभोक्ता बनाने के बजाय उनका सजग यूजर बनाना होना चाहिए।
गणित, तर्कशास्त्र और विवेचन सिखाना; बुनियादी किताबों से जुड़ना; और यह समझना कि तर्क कैसे गढ़े और कैसे परखे जाते हैं- ये सब आज भी अनिवार्य हैं। यही वे कौशल हैं, जो हमें तकनीक से आगे बने रहने में सक्षम बनाते हैं।
हमें क्या पढ़ाना चाहिए, और कैसे पढ़ाना चाहिए? पहला प्रश्न कठिन है और स्वाभाविक रूप से बहस को जन्म देगा। मूल अवधारणाओं के महत्व पर व्यापक सहमति हो सकती है, लेकिन विवरण समय के साथ बदलते रहेंगे।
पहले की तकनीकों के साथ हमारा अनुभव देखें। कैलकुलेटर और कंप्यूटर ने अंकगणित पढ़ाने की आवश्यकता को समाप्त नहीं कर दिया था। छात्र आज भी यह सीखते हैं कि गणनाएं कैसे काम करती हैं। इसी तरह, वर्तनी और व्याकरण भी आज भी महत्वपूर्ण हैं।
एआई के कारण अनेक क्षेत्रों में इसी तरह के एडजस्टमेंट की आवश्यकता है। एलएलएम अब किसी लेख का सार निकालने या उसके केंद्रीय विचार को पहचानने जैसे कार्य अत्यंत कुशलता से करने लगे हैं। ये लंबे समय से शिक्षा के मूल तत्व रहे हैं।
यही बात तेजी से प्रोग्रामिंग, ड्राफ्टिंग आदि तैयार करने पर भी लागू हो रही है। यद्यपि इन गतिविधियों को पाठ्यक्रम से हटाया नहीं जाना चाहिए, लेकिन इनके उद्देश्य में बदलाव अब जरूरी हो गया है। छात्रों को चीजों के बुनियादी कॉन्सेप्ट और लॉजिक को बेहतर ढंग से समझना होगा।
दलील दी जाती है कि एआई औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता को कम कर देगा, क्योंकि यह मांग के अनुसार जानकारी और गाइडेंस उपलब्ध करा सकता है। लेकिन यह धारणा इस मान्यता पर टिकी है कि यूजर्स को पता होता है कि क्या पूछना है और उन्हें मिलने वाले उत्तरों की व्याख्या कैसे करनी है। जबकि असाधारण प्रतिभा वाले व्यक्ति ही इससे लाभ पा सकते हैं, और वे तो वैसे भी सफल होते। यदि एआई से समाज को लाभ पहुंचाना है, तो शिक्षा में कम नहीं, ज्यादा निवेश की जरूरत होगी।
