….इस 20 जनवरी को भाजपा के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत हुई, जब राष्ट्रीय राजनीति में अज्ञात से नितिन नवीन देश की सबसे बड़ी पार्टी के निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित हुए। अपने पूर्ववर्ती अध्यक्ष जेपी नड्डा से वे 20 वर्ष छोटे हैं और अब तक भाजपा के सबसे युवा अध्यक्ष हैं। यह पार्टी के रणनीतिक सोच को दर्शाता है, जो भविष्य में नेतृत्व की युवा पीढ़ी तैयार करना चाहती है और संक्रमण काल में प्रधानमंत्री मोदी जैसे वरिष्ठ-अनुभवी तथा नितिन जैसे ऊर्जावान युवा की जोड़ी बनाकर सत्ता की स्थिरता से पार्टी में आने वाले ठहराव और आत्मसंतुष्टि को झकझोरना चाहती है।

प्रधानमंत्री का लक्ष्य स्पष्ट है: 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र और उससे पहले विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था बनाना। उन्हें इस मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं का भान है-लोकतांत्रिक व्यवस्था, संवैधानिक रुकावटें, न्यायिक अवरोध, लगातार चुनाव जीतने की चुनौतियां तथा तेजी से बदलता वैश्विक परिदृश्य। नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर भाजपा ने कई संदेश दिए हैं।

पहला संदेश अपनी पार्टी के लिए ही है कि भाजपा का संगठन अपनी सरकार से ज्यादा महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार प्रधानमंत्री मोदी स्वयं नवीन के नामांकन में प्रस्तावक तथा गृहमंत्री एवं रक्षामंत्री अनुमोदक बने, जिस प्रकार प्रधानमंत्री ने उन्हें पार्टी में अपना ‘बास’ बताते हुए कहा कि वे उनकी भी ‘सीआर’ लिखेंगे और जिस प्रकार अपने स्वागत-संबोधन में उन्हें अनेक बार माननीय कहकर संबोधित किया, वह यह संदेश दे गया कि युवा नवीन भाजपा के बड़े से बड़े नेताओं, मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और संगठन के सभी पदाधिकारियों के भी ‘बॉस’ हैं।

ऐसा केवल वही कर सकता है, जो स्वयं कार्यकर्ता से प्रधानमंत्री बना हो। सरकारें तो लोकतंत्र में आती-जाती रहती हैं, लेकिन संगठन हर झंझावात में खड़ा रहता है और रहना चाहिए। यह पार्टी के सभी वरिष्ठ नेताओं को सख्त संदेश है कि युवा नवीन को कोई भी हल्के में न ले। पार्टी नेतृत्व में यह पीढ़ीगत परिवर्तन भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प को संभवतः साकार कर सकेगा।

दूसरा प्रमुख संदेश पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को दिया है कि अपने कार्य, पार्टी की विचारधारा के साथ प्रतिबद्धता, दलीय कार्यसंस्कृति के प्रति समर्पण एवं जनता से जुड़ाव द्वारा वे संगठन में सर्वोच्च पद भी प्राप्त कर सकते हैं। उनका किसी जाति विशेष का होना जरूरी नहीं, किसी राजनीतिक गाडफादर की आवश्यकता नहीं–केवल ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ अर्थात कर्म प्रधानता के मूलमंत्र का ही ज्ञान होना चाहिए।

दुर्भाग्य से देश में अधिकतर पार्टियां परिवार के इर्दगिर्द घूमती हैं, अतः उनके कार्यकर्ता जनता से जुड़ने के बजाय उस परिवार और उसके मुखिया से जुड़ने को वरीयता देते हैं। उन्हें पार्टी विचारधारा के प्रति समर्पण से ज्यादा जरूरी उस परिवार के प्रति समर्पण लगता है। ऐसा न करने वाले कार्यकर्ता धीरे-धीरे उपेक्षित होकर दूसरी पार्टियों की ओर चल देते हैं। नवीन के भाजपा अध्यक्ष बनने से पार्टी कार्यकर्ताओं में एक उम्मीद जगी है, जो उन्हें सक्रियता, ऊर्जा, आशा, उत्साह और सकारात्मक सोच से ओतप्रोत कर विकसित भारत के ‘संकल्प को सिद्धि’ तक ले जाने में महत्वपूर्ण कारक बनाएगी।

नवीन को अध्यक्ष बना भाजपा ने तीसरा संदेश राज्य की भाजपा सरकारों को दिया है। करीब 16 राज्यों में भाजपा/राजग सरकारें है। जातिवाद, क्षेत्रीयता और वैयक्तिक प्रतिस्पर्धा के चलते पार्टियों की राज्य इकाइयों में प्रायः दलीय गुटबाजी होती है, जिसे पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को संतुलित और अनुशासित करना होता है, लेकिन उससे भी जटिल मुख्यमंत्री और राज्य संगठन के शीर्ष नेतृत्व के बीच का संघर्ष होता है।

मुख्यमंत्री अपने को ‘बास’ मानता है और प्रदेश अध्यक्ष एक आभूषणीय पद होकर रह जाता है, जो संगठन और सरकार में टकराव को जन्म देता है, जिससे चुनावों में पार्टी की विजय की संभावनाएं क्षीण हो जाती हैं। प्रधानमंत्री ने नवीन को अपने ‘बास’ और माननीय के रूप में संबोधित कर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को संदेश दिया कि मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच कैसे समीकरण होने चाहिए। मुख्यमंत्रियों को इशारों में सलाह भी दी कि प्रदेश सरकार बनने के पीछे पार्टी संगठन की ताकत और मेहनत होती है। अतः पार्टी प्रदेश अध्यक्ष को नीति-निर्णयन में सहभागिता और वांछित श्रेय मिलना चाहिए।

प्रायः भाजपा के मुख्यमंत्री प्रशासकीय अमले को ही नीति-निर्माण और निर्णयन का एकमात्र अभिकरण मानते हैं, जबकि उन्हें लागू कराने में वे संगठन का सक्रिय सहयोग चाहते हैं। समस्या यहीं से शुरू होती है और संगठन कार्यकर्ता अपनी ही सरकार में हाशिये पर चले जाते हैं। जो समीकरण प्रधानमंत्री और नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष के बीच मोदी ने उनके कार्यभार ग्रहण करने के अवसर पर प्रदर्शित किया, उसी की अपेक्षा पार्टी राज्य स्तर पर भी करेगी। यही सरकार और संगठन दोनों के लिए श्रेयस्कर होगा।

नए भाजपा अध्यक्ष का निर्वाचन विपक्षी पार्टियों को भी यह संदेश दे गया कि वे जातीय-अस्मिताओं के मकड़जाल से बाहर निकलें, परिवारवाद छोड़ें, समावेशी दृष्टिकोण अपनाएं, दलीय विचारधारा से प्रतिबद्धता, कार्यकर्ताओं की कर्मठता एवं योग्यता को सत्ता-संरचना में समुचित स्थान देकर अपनी पार्टी में प्राण फूंकें।

आज जब दलीय नेतृत्व का चयन करने में परिवार या जाति को तरजीह दी जाती है, तब भाजपा ने देश की 140 करोड़ आबादी में मात्र 0.7 प्रतिशत वाले कायस्थ समाज से पार्टी अध्यक्ष का चयन कर साफ संदेश दिया है कि जातिवादी राजनीति का युग खत्म होने को है और विकसित भारत के स्वप्न को साकार करने हेतु अब योग्यता आधारित वर्ग-राजनीति की बारी है, लेकिन पता नहीं इन संकेतों को विपक्षी दल पकड़ पाएंगे भी या नहीं?