….पिछले एक दशक में भारत के आर्थिक कायाकल्प को सामान्य तौर पर जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों से ही रेखांकित किया जाता है, लेकिन ऐसा करना इस पूरी कहानी को समझने का अधूरा प्रयास ही कहा जाएगा। भारत में आकार ले रहा परिवर्तन विकास की गति से अधिक उसकी प्रकृति एवं स्वरूप में आया बदलाव अधिक महत्वपूर्ण है।

देश ने एक नाजुक और असंतुलित अर्थव्यवस्था से एक ऐसी अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़ाए हैं, जो पूंजीगत व्यय, डिजिटल आधारभूत ढांचे और संस्थागत क्षमताओं पर आधारित है। हाल के वर्षों में राज्य क्षमता विस्तार, सार्वजनिक वस्तुओं का निर्माण और उनकी नागरिकों तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करने में उल्लेखनीय निवेश देखा गया है। अब चुनौती इन बुनियादी परिवर्तनों को दीर्घकालिक उत्पादकता और समावेशी लाभों में बदलने की है।

निःसंदेह श्रम बाजार का औपचारीकरण बढ़ा है, लेकिन हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि कौशल के स्तर पर अभी भी अवरोध कायम हैं। वेतन आंकड़ों के हालिया रुझान को देखें तो हाल के वर्षों में औसतन बीस लाख नए कर्मियों का मासिक जुड़ाव सामने आया है। यह दर्शाता है कि डिजिटलीकरण और कर सुधारों ने व्यवसायों को औपचारिक स्वरूप अपनाने के लिए प्रेरित किया है। बेरोजगारी दर का पांच प्रतिशत के आसपास स्थिर रहना भी मजबूती और स्थायित्व का संकेत है। फिर भी यह परिवर्तन पहला चरण ही है, क्योंकि केवल औपचारिक रोजगार पर्याप्त नहीं हैं।

स्थितियां तब तक नहीं सुधरेंगी, जब तक रोजगार की उत्पादकता और गुणवत्ता समान रूप से नहीं बढ़ती। महिला श्रम भागीदारी का लगभग 40 प्रतिशत तक पहुंचना हौसला जरूर बढ़ाता है, पर इसका एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण, कम-भुगतान या अवैतनिक कार्यों में केंद्रित है। इसलिए अगला कदम रोजगार की गुणवत्ता और कौशल-आधारित प्रगति पर होना चाहिए, जिसके लिए कौशल प्रमाणन, अप्रेंटिसशिप और उद्योग-केंद्रित प्रशिक्षण कार्यक्रम विशेषकर विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

विनिर्माण क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक्स नीति एक बाजी पलटने वाली सफलता के रूप में उभरी है। मात्र एक दशक में भारत मोबाइल फोन आयातक से घरेलू उत्पादन केंद्र में रूप में उभरा है। 2015 में ₹11.1 लाख करोड़ के रिकार्ड सार्वजनिक पूंजीगत व्यय और नीतिगत सहायता ने इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात को पिछले ग्यारह वर्षों में 11 गुना बढ़ाकर ₹4.15 लाख करोड़ तक पहुंचा दिया। इससे यह धारणा ध्वस्त हुई कि भारत औद्योगिक नीति को लागू नहीं कर सकता।

हालांकि यह सफलता एक सीमा भी उजागर करती है। अभी भी जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत के आसपास है और केवल इलेक्ट्रॉनिक्स के सहारे ही व्यापक रोजगार सृजन संभव नहीं। टेक्सटाइल, फुटवियर एवं खिलौना जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में इस प्रकार की सफलता अभी प्राप्त होती नहीं दिख रही। ऐसे में, राज्य प्रोत्साहनों का उचित संयोजन, एमएसएमई अनुपालन सरलीकरण तथा लाजिस्टिक्स एवं बंदरगाह दक्षता में सुधार इस मोर्चे पर सफलता की ओर उन्मुख कर सकते हैं।

इसमें संदेह नहीं कि कारोबारी सुगमता में सुधार ने भी निवेश को गति प्रदान की है। पुराने कानूनों को हटाने, डिजिटल स्वीकृतियां और फेसलेस अनुपालन ने संचालन एवं विस्तार को अधिक सुगम बनाया है। जीएसटी के तहत 1.4 करोड़ व्यवसायों का जुड़ना प्रशासनिक सरलीकरण की गहराई को दर्शाता है। फिर भी छोटे एवं मध्यम उद्यमों के लिए जमीनी अनुभव मिले-जुले हैं। वहां अनुपालन तो डिजिटल हुआ है, पर अपेक्षित रूप से सरलता संभव नहीं हो पाई है।

केंद्र-राज्यों के बीच नियामकीय परतें, नियमों में परिवर्तन तथा भूमि एवं श्रम औपचारिकताएं विस्तार की लागत बढ़ाती हैं। इसलिए सुधार के अगले चरण का केंद्र पूर्वानुमानिता, नियमों की स्थिरता और विवाद निपटान की तीव्रता होनी चाहिए। नियम कम होने चाहिए और जो हों, उनमें स्थिरता का भाव हो और उनका बेहतर क्रियान्वयन किया जाए।

भारत ने पिछले दशक में गरीबी घटाने में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। करीब 24.8 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले हैं। इस दौरान गरीबी सूचकांक 11.28 प्रतिशत तक गिरा है। यह आम नागरिकों की बेहतर जिंदगी का प्रमाण है। इसके बावजूद खपत का स्तर एकसमान नहीं है। कारों और ब्रांडेड सामान की खपत तेजी से बढ़ी है, जबकि सस्ती दैनिक जरूरतों की खपत में बढ़ोतरी अपेक्षाकृत धीमी रही। इसी अंतर को अक्सर बढ़ती असमानता कहा जाता है, लेकिन विकास में यह सही क्रम भी है। इस लिहाज से अब अगली चुनौती आय में स्थिरता नहीं, बल्कि आय की गतिशीलता से संबंधित है। कल्याणकारी योजनाओं को कौशल प्रशिक्षण, छोटे ऋण, स्थानीय मैन्यूफैक्चरिंग क्लस्टर और शहरों के रोजगार कॉरिडोर से जोड़कर लांचपैड बनाया जा सकता है।

बीते एक दशक में भारत ने डिजिटल और भौतिक बुनियादी ढांचे, राजकोषीय क्षमता और संस्थागत निर्माण को मजबूती प्रदान की है। इसका अर्थ है कि सुधारों की गति और दायरा बढ़ा है। अब आने वाला दशक बड़ी घोषणाओं से नहीं, बल्कि पूर्व की योजनाओं के कुशल निष्पादन से परिभाषित होगा। यह निष्पादन केवल केंद्र सरकार के स्तर पर ही नहीं, बल्कि राज्यों, नगर निकायों, निजी उद्यमों और संस्थानों की सामूहिक क्षमता पर निर्भर करेगा।