मध्य प्रदेश

भोपाल में बिना पर्चे के धड़ल्ले से बिक रहीं एंटीबायोटिक्स…पर नियम हवा-हवाई

भोपाल में बिना पर्चे के धड़ल्ले से बिक रहीं एंटीबायोटिक्स; 3 करोड़ का रोजाना कारोबार, पर नियम हवा-हवाई

राजधानी भोपाल में एंटीबायोटिक्स की ”ओवर द काउंटर” (ओटीसी) बिक्री एक साइलेंट किलर की तरह पैर पसार रही है। ”नवदुनिया” की पड़ताल में चौंकाने वाला सच सामने आया है कि शहर के अधिकांश मेडिकल स्टोर पर बिना किसी डाक्टर के पर्चे के शेड्यूल-एच और एच-वन श्रेणी की एंटीबायोटिक्स धड़ल्ले से बेची जा रही हैं।

भोपाल में बिना पर्चे के धड़ल्ले से बिक रहीं एंटीबायोटिक्स….

भोपाल। राजधानी भोपाल में एंटीबायोटिक्स की ”ओवर द काउंटर” (ओटीसी) बिक्री एक साइलेंट किलर की तरह पैर पसार रही है। ”नवदुनिया” की पड़ताल में चौंकाने वाला सच सामने आया है कि शहर के अधिकांश मेडिकल स्टोर पर बिना किसी डाक्टर के पर्चे के शेड्यूल-एच और एच-वन श्रेणी की एंटीबायोटिक्स धड़ल्ले से बेची जा रही हैं। दवा कारोबारियों के मुताबिक, भोपाल जिले में ही प्रतिदिन करीब तीन करोड़ रुपये की एंटीबायोटिक्स की बिक्री होती है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा बिना पर्चे के खरीदा जाता है।

शहर के तीन प्रमुख इलाकों में टीम का रियलिटी चेक

एमपी नगर जोन-एक : चेतक ब्रिज के समीप एक मेडिकल स्टोर पर रिपोर्टर दवा खरीदने पहुंचा। वे विक्रेता से ”एजीथ्रोमाइसिन” की मांग करता है। इस पर दवा विक्रेता केवल यह पूछता है कि 300 एमजी चाहिए या 500 एमजी। रिपोर्टर के 500 एमजी कहने पर विक्रेता बिना किसी डाक्टर की पर्ची या विशेषज्ञ की सलाह के दवा उपलब्ध करा देता है।

अयोध्या नगर : साईं नाथ मेडिकल स्टोर पर जब मरीज ने ”अमोक्सीसिलिन” मांगी, तो दुकानदार ने बिना कोई सवाल किए स्ट्रिप थमा दी। पर्चे के बारे में पूछने पर उसने कहा कि पर्चा है तो दिखा दो। नहीं तो उसका एमजी बता दो। बच्चे को देनी है बड़ों को यह बता दो। दवा मैं दे दूंगा।

रचना नगर : रेलवे लाइन के समीप एक दवा दुकान पर रिपोर्टर दवा खरीदने पहुंचते हैं। वे दवा विक्रेता से एजीथ्रोमाइसिन की मांग करते हैं। इस दौरान दवा विक्रेता न तो कोई सवाल पूछता है और न ही किसी प्रकार का डाक्टर का पर्चा देखने की जरूरत समझता है। बिना मरीज की जानकारी लिए वह सीधे एजीथ्रोमाइसिन की एक टैबलेट निकालकर दे देता है।

गौतम नगर : दोपहर करीब तीन बजे अंजू मेडिकल स्टोर जाकर रिपोर्टर ने इंफेक्शन ठीक करने के लिए एजिथ्रोमाइसिन एंटी बायोटिक मांगी। मेडिकल पर मौजूद स्टाफ ने पूछा कि टेबलेट कितने एमजी की चाहिए। हमारे बताने पर 500 एमजी की छह टेबलेट की स्ट्रिप थमा दी और बताया कि यह टेबलेट सुबह-शाम तीन दिन तक लेनी है। इन टेबलेट्स के लिए उसने 70 रुपये लिए।

आमने-सामने : केमिस्ट और मरीजों की दलील

मरीज (सुनील वर्मा, न्यू मार्केट) ने बताया कि डाक्टर की फीस 500 रुपये है, जबकि दवा 50 रुपये में मिल जाती है। छोटी-मोटी सर्दी के लिए डाक्टर के पास कौन जाए? इसलिए मैं बाहर से ही दवा ले लेता हूं।

केमिस्ट परवेश सिंह ने बताया कि अगर हम मना करेंगे, तो ग्राहक बगल वाली दुकान पर चला जाएगा। बिजनेस का सवाल है, नियम तो कागजों पर हैं।

इनका कहना है

जितेंद्र धाकड़, अध्यक्ष, भोपाल केमिस्ट एसोसिएशन काल कहना है किहमने सभी 4000 केमिस्टों को सर्कुलर जारी किया है कि बिना पर्चे के दवा न बेचें। लेकिन कभी-कभी व्यावहारिक दिक्कतों के कारण ऐसा होता है। प्रशासन को केवल केमिस्टों को नहीं, बल्कि उन कंपनियों पर भी लगाम कसनी चाहिए जो जरूरत से ज्यादा सप्लाई कर रही हैं। कई बार मरीज अपना पर्चा नहीं ला पाता है ऐसे में केमिस्ट को बिना पर्चे के ही दवाई देनी पड़ती है। लेकिन मरीज से उसकी बीमारी और डोज जरूर पूछा जाता है।

क्या बोले सिविल सर्जन

डॉ. संजय जैन, सिविल सर्जन, भोपाल का कहना है कि बिना डाक्टरी सलाह के एंटीबायोटिक्स लेना शरीर में सुपरबग पैदा कर रहा है। आज स्थिति यह है कि निमोनिया और यूटीआइ जैसी सामान्य बीमारियों में भी हैवी एंटीबायोटिक्स बेअसर हो रही हैं। यह भविष्य के लिए एक मेडिकल इमरजेंसी है। कोई भी दवाई को बिना डाक्टरी पर्चे से नहीं लें।

ड्रग्स एंड कास्मेटिक्स एक्ट के तहत एंटीबायोटिक्स शेड्यूल एच-वन में आती हैं। नियम कहता है कि केमिस्ट को हर बिक्री का रिकार्ड रजिस्टर में रखना होगा। पर्चे की एक कापी दुकान पर रखनी अनिवार्य है। दवा की स्ट्रिप पर लाल रंग की पट्टी होनी चाहिए। परंतु भोपाल के जमीनी हालात इन नियमों से कोसों दूर हैं।

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सर्दी-जुकाम में भी एंटीबायोटिक्स की ‘ओवरडोज’ ; जेपी और शाकिर अली अस्पताल के 70% पर्चों में भारी खुराक

भोपाल के सरकारी और निजी अस्पतालों में इन दिनों मरीजों की भारी भीड़ है। लेकिन चिंता की बात बीमारी नहीं, बल्कि उसका इलाज है। नवदुनिया की टीम ने शहर के दो बड़े अस्पतालों की ओपीडी में पहुंचकर उन मरीजों के पर्चों की पड़ताल की, जो सामान्य सर्दी, खांसी या बदन दर्द की शिकायत लेकर आए थे।

सर्दी-जुकाम में भी एंटीबायोटिक्स की ‘ओवरडोज’

 भोपाल। भोपाल के सरकारी और निजी अस्पतालों में इन दिनों मरीजों की भारी भीड़ है। लेकिन चिंता की बात बीमारी नहीं, बल्कि उसका इलाज है। नवदुनिया की टीम ने शहर के दो बड़े अस्पतालों की ओपीडी में पहुंचकर उन मरीजों के पर्चों की पड़ताल की, जो सामान्य सर्दी, खांसी या बदन दर्द की शिकायत लेकर आए थे।

पड़ताल में सामने आया कि लगभग 70 प्रतिशत मरीजों को पहले ही दिन से ”एंटीबायोटिक्स” की भारी खुराक दी जा रही है, जिसकी शायद जरूरत ही नहीं थी।

कहां आया मामला

जेपी अस्पताल : हल्का बुखार और गला खराब। बैरसिया से आए संतोष कुमार (32 वर्ष) को पिछले दो दिन से हल्का बुखार था। डाक्टर ने उन्हें ”सिफिक्सिम” नामक एंटीबायोटिक लिख दी।

संतोष ने कहा कि डाक्टर साहब ने कहा है कि यह गोली लोगे तो जल्दी ठीक हो जाओगे। हमें नहीं पता यह एंटीबायोटिक है या क्या, बस बुखार उतरना चाहिए।

खान शाकिर अली अस्पताल : पुराना भोपाल निवासी 24 वर्षीय युवती सीमा केवल वायरल जुकाम की शिकायत लेकर पहुंचीं। उनके पर्चे पर ”एजीथ्रोमाइसिन” लिखी हुई थी। सीमा ने बताया कि पिछली बार भी डाक्टर ने यही दवा दी थी, इससे तुरंत आराम मिल जाता है। इसलिए मैंने खुद भी डाक्टर से कहा कि कोई ”बड़ी वाली” गोली लिख दें ताकि अपना काम कर सकूं।

डॉक्टर बोले- मरीजों को चाहिए तुरंत आराम

अस्पताल के ओपीडी में तैनात एक जूनियर डाक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हजारों की ओपीडी होती है। अगर हम मरीज को सिर्फ पैरासिटामोल और भाप लेने की सलाह दें, तो उसे लगता है कि डाक्टर ने ध्यान नहीं दिया। वे अगले दिन फिर आकर बहस करते हैं कि आराम नहीं मिला। इस दबाव में हमें अक्सर एंटीबायोटिक्स लिखनी पड़ती हैं।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

डॉ. प्रितेश सिंह ठाकुर, जनरल फिजिशियन, खान शाकिर अली अस्पताल का कहना है कि बिना डाक्टर की सलाह एंटीबायोटिक नहीं लेनी चाहिए। वायरल संक्रमण में एंटीबायोटिक असरदार नहीं होती। वायरल बीमारी तीन-चार दिन में ठीक हो जाती है। जरूरत पड़ने पर खून की जांच के बाद ही एंटीबायोटिक लें।विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की चेतावनी के अनुसार, अगर एंटीबायोटिक्स का ऐसा ही अंधाधुंध इस्तेमाल जारी रहा, तो साल 2050 तक दुनिया में कैंसर से ज्यादा मौतें एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (एएमआर) के कारण होंगी।

डॉ. पुष्पेंद्र मिश्रा, एमडी मेडिसिन, जेपी अस्पताल का कहना है कि वायरल इंफेक्शन में एंटीबायोटिक्स का कोई रोल नहीं होता। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को उल्टा नुकसान पहुंचाती हैं। मरीज अब डाक्टर पर दबाव बनाने लगे हैं कि उन्हें 24 घंटे में ठीक होना है। यह शार्टकट भविष्य में मामूली इन्फेक्शन को भी लाइलाज बना देगा। क्योंकि जब उन्हें एंटीबायोटिक की असल में जरूरत होगी तो वह असर नहीं करेगी।

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