इन 7 वजहों से यूक्रेन को 1 महीने बाद भी जीत नहीं पाया रूस, यूक्रेन को कमतर आंककर पुतिन ने की गलती?
पाया है। शुरू में माना जा रहा था कि रूसी सेना कुछ ही दिनों में युद्ध जीत लेगी, लेकिन ये जंग एक महीने से ज्यादा चलने के बावजूद फिलहाल रूस विजेता बनने की स्थिति में नहीं है। यूक्रेन के खिलाफ जैसै-जैसे जंग लंबी होती जा रही है, वैसे-वैसे रूसी सेना की क्षमता और रणनीति दोनों को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
ऐसे में चलिए समझते हैं कि आखिर क्या है रूस के यूक्रेन में एक महीने बाद भी जंग नहीं जीत पाने के कारण? क्या हैं वे 7 प्रमुख वजहें, जिनसे रूस के सामने डटा है यूक्रेन?
1.रूस का सेना पर कम खर्च
रूस भले ही दुनिया के सुपरपावर में शामिल है, लेकिन रक्षा पर खर्च के मामले में वह अमेरिका, चीन और भारत से भी पीछे है। रक्षा पर कम खर्च का मतलब है कि सेना के आधुनिकीकरण में कमी।
- स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी SIPRI की रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 में दुनिया में सबसे ज्यादा रक्षा बजट अमेरिका का था, जिसने 2021 में सेना पर 778 बिलियन डॉलर खर्च किए।
- दूसरे नंबर पर चीन रहा, जिसने सेना पर 253 अरब डॉलर खर्च किए। तीसरे नंबर पर भारत रहा, जिसने सेना पर 72.9 अरब डॉलर खर्च किए।
- वहीं सेना पर खर्च के मामले में रूस चौथे नंबर पर रहा और इस दौरान उसने अपनी सेना पर 61.7 अरब डॉलर खर्च किए।
- रूस की सुपरपावर की इमेज को देखते हुए उसके लिए अपनी सेना पर खर्च और बढ़ाने की जरूरत है, जिससे वह यूक्रेन जैसे युद्ध के हालात में कमजोर न पड़े।
2.यूक्रेन से आसमानी जंग में जीत नहीं पाई है रूसी एयरफोर्स
जंग शुरू होने के एक महीने बाद भी रशियन एयरोस्पेस फोर्सेज, जिसे VKS कहते हैं, यूक्रेन के आसमानों पर एयर सुपरियॉरिटी यानी अपनी श्रेष्ठता साबित नहीं कर पाई है। एयर सुपरियॉरिटी का मतलब होता है-किसी देश के हवाई इलाके पर इस तरह अपना प्रभुत्व कायम करना, जिसमें विरोधी सेना के प्रतिरोध की संभावना न के बराबर बचे।
वैसे तो रूस ने पिछले दशक में अपनी हवाई क्षमता को बढ़ाने के लिए दुनिया के सबसे बेहतरीन फाइटर प्लेन में शुमार सुखोई-30, सुखोई-35 और सुखोई-34 जैसे फाइटर प्लेन के लिए अरबों डॉलर झोके हैं। लेकिन सवाल ये है कि यूक्रेन के आसमान पर इसके बावजूद रूसी सेना अपना प्रभुत्व क्यों नहीं कायम कर पाई है?
- एक्सपर्ट्स के अनुसार, पुतिन को लगा था कि यूक्रेन के खिलाफ जंग जीतने के लिए रूसी एयरफोर्स की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। साथ ही रूस नहीं चाहता है कि उसके विमानों और पायलटों को ज्यादा नुकसान पहुंचे।
- रूसी वायुसेना के अपर्याप्त इस्तेमाल ने यूक्रेन एयर फोर्स और एयर डिफेंस को तुर्की में बने TB-2 जैसे ड्रोन की मदद से जोरदार जवाबी कार्रवाई का मौका दिया। इससे यूक्रेन ने कई रूसी मिसाइल लॉन्चर और टैंकों को मार गिराया।
- माना जा रहा है कि रूसी एयरफोर्स के पास प्रिसिशन गाइडेड म्यूनिशन (PGM) यानी हवा से छोड़े जाने वाले बम या ग्रेनेड्स की कमी है। रूस ने इन हथियारों को बड़ी मात्रा में सीरिया के गृह युद्ध में बशर अल-असद की मदद के लिए दिया, जिससे उसके पास इनकी कमी पड़ गई।
- जानकारों का मानना है कि रूसी पायलटों को अपने प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में हर साल उड़ान के लिए कम घंटे मिलते हैं, यही वजह है कि रूसी एयरफोर्स कागजों पर जितनी मजबूत है, युद्ध के मैदान में उतनी मजबूत लड़ाई नहीं कर पा रही है।
3.रूस की योजना और सेना की ट्रेनिंग में कमी
यूक्रेन के खिलाफ जंग शुरू होने के बाद से ही रूसी सेना के लिए एक सबसे बड़ा मुद्दा उसकी योजनाओं में कमी के रूप में सामने आया है।
- एक्सपर्ट्स का मानना है कि रूसी सेनाओं को जंग शुरू होने के बाद भी ये बताया ही नहीं गया था कि उन्हें जाना कहां है और इसीलिए पहला मौका मिलते ही वे सरेंडर कर रहे हैं।
- वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन के खिलाफ लड़ाई के पहले दो हफ्तों में रूस के 5-6 हजार सैनिक मारे गए-यानी करीब 400 सैनिक हर दिन।
- 1945 के बाद से दुनिया में कहीं भी रूसी सेना को इतना नुकसान नहीं हुआ है। अफगानिस्तान से सोवियत रूस की जंग के दौरान भी हर दिन औसतन 5 रूसी सैनिकों की ही मौत हुई थी।
- न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन के खिलाफ युद्ध के एक महीने के अंदर रूस के 7000 से अधिक सैनिक मारे गए हैं। ये संख्या अमेरिका के इराक और अफगानिस्तान के साथ करीब दो दशक के दौरान लड़ाई मारे गए उसके सैनिकों की कुल संख्या से भी ज्यादा है।
- रूसी सेना के पास बटालियन टैक्टिकल ग्रुप (BTG) के नाम से फेमस एक खास सैनिक ग्रुप है। हर BTG में 600-800 सैनिक होते हैं, जो एयर डिफेंस, तोपखाने, इंजीनियरों और लॉजिस्टिक्स से लैस होते हैं। BTG ऐसा ग्रुप है, जो दुश्मन से किसी भी इलाके में लोहा ले सकता है।
- रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूसी सेना में 170 BTG हैं, जिनमें से 87 यूक्रेन युद्ध में उतारे गए हैं। लेकिन BTG की आक्रामकता का फायदा रूसी सेना नहीं उठा पाई है।
- युद्ध के शुरुआती दिनों में BTG के सैनिकों को यूक्रेन में प्रवेश के रास्ते, सामरिक उद्देश्य, मिशन के लक्ष्य और सैनिकों की जिम्मेदारियों जैसी योजनाओं के बारे में नहीं बताया गया था।
- रूसी सेना लंबी जंग के लिए पूरी तरह तैयार ही नहीं थी और लंबे युद्ध के लिए सप्लाई लाइन की समुचित व्यवस्था के बिना ही रूसी सैनिक एक साथ कई मोर्चों पर फंस गए।
4.लॉजिस्टिक्स और सप्लाई लाइन
यूक्रेन की सेना ने इस युद्ध में सबसे ज्यादा निशाना रूस के लॉजिस्टिक्स और सप्लाई लाइन को बनाया है। इस वजह से भी युद्ध में बढ़त हासिल करने में रूस को खासी दिक्कतें सामने आई हैं।
- रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूक्रेन 60 रूसी फ्यूट टैंकों को नष्ट कर चुका है और उसने बहुत ही रणनीतिक तरीके से रूस के लॉजिस्टिक्स सप्लाई चेन पर हमला किया है। इससे रूस अपने सैनिकों को उस रफ्तार से मदद नहीं पहुंचा पा रहा है, जितना युद्ध में बढ़त के लिए जरूरी है।
- एक्सपर्ट्स के अनुसार, यही वजह है कि कीव में रूसी टैंकों का लंबा काफिला होने के बावजूद रूस राजधानी पर कब्जा नहीं कर पाया क्योंकि उसके ज्यादातर टैंकों में तेल ही नहीं था।
- लॉजिस्टिक्स या रसद का सेना के मामले में मतलब सेनाओं के लिए फ्यूल और हथियार आदि पहुंचाने और ट्रांसपोर्ट आदि का इंतजाम करना है।
- सप्लाई लाइन मिलिट्री सप्लाई वाहनों की एक बड़ी लाइन होती है, जो आमतौर पर काफिले के रूप में चलती है। सप्लाई लाइन के जरिए सैनिकों के लिए खाना, मेडिकल सप्लाई और बारूद ले जाया जाता है।
- देश के बाहर युद्ध कर रहे सैनिकों के लिए सप्लाई लाइन अहम होती है और इसके खत्म होने पर सेना युद्ध में टिक नहीं पाती। इसीलिए दुश्मन सेना सबसे पहले सप्लाई लाइन को निशाना बनाती है।
5.पुतिन ने यूक्रेन को कमतर आंका?
कई जानकारों का मानना है कि अपने से 30 गुना छोटे देश को लेकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन का आकलन गलत साबित हुआ।
- पुतिन को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि उनके सैनिकों को यूक्रेनी सेना से इतनी जबर्दस्त टक्कर मिलेगी।
- पुतिन का मानना था कि उनकी सेना कुछ ही घंटों या दिनों में यूक्रेन पर कब्जा कर लेगी, लेकिन एक महीने बाद भी जल्द ऐसा होने के आसार नहीं हैं।
- पुतिन को उम्मीद थी कि युद्ध शुरू होने पर यूक्रेन में 80 लाख की रूसी मूल के लोगों की आबादी की वजह से रूसी सैनिकों का यूक्रेन में स्वागत होगा और इसी वजह से खारकीव और ओडेशा जैसे शहर सबसे पहले समर्पण कर देंगे। लेकिन उल्टे यूक्रेन के लोगों ने रूसी हमले का पुरजोर विरोध किया।
6.यूक्रेन के लोगों का मनोबल सेना और राष्ट्रपति की रणनीति
- रूसी हमले के बाद से ही यूक्रेन में सैनिकों के साथ ही आम लोग भी रूस का हरसंभव विरोध कर रहे हैं। हजारों की संख्या में यूक्रेन के नागरिकों ने लड़ाई के लिए हथियार तक उठा लिए हैं।
- नेशनल गार्ड ऑफ यूक्रेन के मुताबिक, रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद से यूक्रेन सेना की वॉलंटियर ब्रांच से करीब 1 लाख से ज्यादा यूक्रेनी नागरिक जुड़े हैं।
- युद्ध शुरू होने के बाद एक रूसी टैंक के सामने खड़े एक अकेले यूक्रेनी शख्स की तस्वीर पूरी दुनिया में वायरल हुई थी। ये तस्वीर ताकवर रूस के सामने यूक्रेन के लोगों के मनोबल की परिचायक है।
- इस लड़ाई में यूक्रेन की सेना की रणनीति के साथ ही उसके मनोबल ने भी अहम भूमिका निभाई है, जिसका उसे फायदा भी मिला। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध में रूस की तुलना में यूक्रेन के 50% सैनिक ही मारे गए हैं।
- यूक्रेन के सैनिकों ने हवा से लेकर जमीनी लड़ाई तक में अपने संसाधनों का रूस की तुलना में बेहतर इस्तेमाल किया है।
- लड़ाई शुरू होने से पहले और शुरू होने के बाद तक, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की चट्टान की तरह डटे नजर आए हैं। साथ ही जेलेंस्की ने बहुत ही समझदारी से पश्चिमी से मदद मांगने से लेकर, दुनिया को रूस की निर्दयता दिखाने में कामयाब रहे हैं।
7.अमेरिका, पश्चिमी देशों की मदद
अमेरिका, NATO और यूरोपीय देश भले ही लड़ाई में सीधे यूक्रेन की मदद न कर रहे हों लेकिन हथियारों और आर्थिक सहायता से पर्दे के पीछे से यूक्रेन की मदद कर रहे हैं।
- अमेरिका यूक्रेन को 600 स्टिंगर मिसाइलें और 2600 जेवेलिन मिसाइलें दे चुका है। 17 मार्च को अमेरिका ने यूक्रेन के लिए 800 मिलियन डॉलर की अतिरिक्त सैन्य सहायता को मंजूरी दी है।
- साथ ही अमेरिका ने हाल ही में यूक्रेन को उड़ने के बाद मिसाइल बन जाने में सक्षम कामाकेज ड्रोंस सप्लाई किए हैं।
- अमेरिका ने यूक्रेन को युद्ध शुरू होने से पहले जनवरी में ही NATO देशों-एस्तोनिया, लिथुआनिया और लातविया के जरिए हथियारों की सप्लाई करवाई थी।
- स्वीडन और फिनलैंड जैसे तटस्थ माने जाने वाले देश भी यूक्रेन को हथियार भेज रहे हैं। जर्मनी भी यूक्रेन को स्टिंगर और कंधे से दागे जाने वाले राकेट भेज रहा है।
- तुर्की जैसे NATO देश ने यूक्रेन को TB-2 ड्रोन दिए हैं, जिनकी मदद से यूक्रेन ने रूस के कई टैंकों और एयर-डिफेंस सिस्टम को तबाह किया है।
- अमेरिका समेत NATO और यूरोपियन यूनियन के करीब 20 देश यूक्रेन को हथियारों की सप्लाई कर रहे हैं।