DOLO-650: दवा का कंपोजिशन बदलने का वह आरोप, जिस पर घिरी ड्रग निर्माता कंपनी, क्या आप की सेहत पर भी पड़ा
फार्मा एक्सपर्ट्स का मानना है कि कोरोना के दौर में बढ़ती मांग के बीच पैरासिटामॉल बनाने वाली अधिकतर कंपनियां दवा की आपूर्ति करने में सक्षम नहीं हो पाईं। जबकि डोलो-650 सभी जगह उपलब्ध रही और इसका प्रिस्क्रिप्शन तय कराने के लिए डॉक्टरों को 1,000 करोड़ रुपये के गिफ्ट दिए गए।
भारत में कोरोनावायरस महामारी की पहली और दूसरी लहर के दौरान लोगों को घंटो लाइन में लगकर दवा खरीदते देखा गया। संक्रमण फैलने के डर के बावजूद भीड़ के बीच जिस एक दवा को लेने की होड़ मची थी, वह थी डोलो-650 एमजी की टैबलेट। भारत में तो यह दवा कोरोनावायरस के इलाज का पर्याय बन गई थी। डोलो की लोकप्रियता का आलम यह था कि सोशल मीडिया तक पर इस दवा को लेकर मीम्स बन गए। डोलो की निर्माता कंपनी माइक्रो लैब्स को भी इसकी बिक्री से जबरदस्त फायदा हुआ।
हालांकि, 2022 की शुरुआत में कोरोना लहरों के छंटने के बाद जब जांच एजेंसियां फिर से सक्रिय हुईं तो डोलो बनाने वाली कंपनी भी टैक्स में हेराफेरी के मामलों में घिर गई। और अब फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FMRAI) ने आरोप लगाया है कि माइक्रोलैब्स ने डॉक्टरों को एक हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा के मुफ्त उपहार बांटे, ताकि वे मरीजों को डोलो-650 एमजी दवा लेने की सलाह दें। डोलो की निर्माता कंपनी पर लगे इन आरोपों से मामले की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ खुद भी चौंक गए। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि उन्होंने खुद भी यह दवा ली है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर डोलो-650 एमजी दवा है क्या? आखिर क्यों पैरासिटामॉल के अन्य ब्रांड्स के मुकाबले डोलो और ज्यादा लोकप्रिय हो गई? डोलो निर्माताओं पर जो आरोप लगे हैं, उसके आम ग्राहकों पर किस तरह फर्क पड़ा? आखिर कंपनी ने दवा की कंपोजिशन (संयोजन) बदलकर किस तरह फायदा उठाया?