अस्पताल के वार्ड टॉर्चर रूम न बनने दें सरकार
बजट का सबसे बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च होने और केंद्रीय मदद के बावजूद अस्पतालों के हालात नहीं सुधरे हैं …
प्र देश में स्वास्थ्य सेवाओं में मरीजों के हिस्से में अभी बहुत कुछ आना बाकी है। आइसीयू को छोड़ दें तो अस्पतालों के बाकी वार्डों को अब तक मौसम अनुकूल नहीं बनाया जा सका है। इससे ठंड हो या गर्मी, मरीजों और उनके तीमारदारों को भारी दुश्वारियों से गुजरना पड़ता है। स्थायी तौर पर अनुकूल न बनाओ तो भी बदलते मौसम में उसके अनुरूप इंतजाम करके समस्या न उत्पन्न होने देना बुद्धिमानी होती है, जो सरकार और अस्पतालों के प्रबंधन के स्तर पर दर्शाई नहीं जा रही है। इसीलिए उन पर असंवेदना की तोहमत लगती रहती है, जो हालात देखते हुए नाजायज भी प्रतीत नहीं होती। गर्मी के दिनों में वार्ड किसी भट्ठी की माफिक तपने लगते हैं। आलम यह है कि इसमें खडखड़ाते पंखे ही मरीजों का सहारा होते हैं जो बाहर की लू को भीतर भर देते हैं। आधुनिक दौर में वातानुकूलित भवन, वार्ड की उम्मीदें की जाती हैं। लेकिन देखेंगे, तो पाएंगे कि प्रदेश में किसी भी स्थान पर अस्पतालों में बने किसी भी वार्ड को ऐसी सुविधा से सुसज्जित करने के प्रयास नहीं हुए हैं। ठीक है, इसमें बहुत पैसा लगता है। लेकिन गर्मी के समय कूलरों की व्यवस्था करके मरीजों को राहत प्रदान करने के जतन भी कम ही नजर आते हैं। यह सब हाल ही में पत्रिका के रियल्टी चेक में सामने लाया जा चुका है। पूरी व्यवस्था की पोल इसमें खुल गई। चमक-दमक से भरे साहबों के चेंबर को ठंडा रखने के पूरे इंतजाम नजर आए पर मरीजों के वार्ड तपते हुए मिले। यह स्थिति जब संभागीय मुख्यालय वाले इन जिलों के बड़े अस्पतालों की है तो छोटे जिलों व तहसीलों के स्वास्थ्य केंद्रों के बारे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। यह केवल मरीजों की सुविधाओं से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि सरकारी अस्पतालों के प्रति लोगों में संतुष्टि का जो न्यूनतम स्तर है, इसी तरह के अव्यवस्थाओं से उपजी निराशा का नतीजा है। यह महज बजटीय अभाव का मामला नहीं है, सरकारी सिस्टम के काम का तरीका ऐसा ही है। वरना थोड़े से प्रयास से लोग खुद मदद के लिए आगे आ जाते हैं। विभाग तो दान में मिली चीजें भी नहीं संभाल पाता है। सरकार को इन खराब हालात पर संज्ञान लेना चाहिए और व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए कदम उठाने चाहिए। अस्पताल ऐसी जगह हैं जहां पीड़ित ही आते हैं। उनकी पीड़ा और नहीं बढ़ाई जानी चाहिए।