चंद राष्ट्रों की सहानुभूति से दूर नहीं होगी समस्या ..?

करोड़ लोग दुनिया में जबरन विस्थापित किए जा चुके हैं 2022 के अंत तक, उत्पीड़न, संघर्ष, हिंसा, मानवाधिकार हनन या शांति भंग करने वाली गंभीर घटनाओं के कारण

विश्व शरणार्थी दिवस विशेष: पलायन को विवशव्यक्ति के अस्तित्व और पहचान को छीन लिया जाता है

करोड़ लोग दुनिया में जबरन विस्थापित किए जा चुके हैं 2022 के अंत तक, उत्पीड़न, संघर्ष, हिंसा, मानवाधिकार हनन या शांति भंग करने वाली गंभीर घटनाओं के कारण

इहलोक और परलोक के मध्य तो समूची मानव जाति ही एक भांति से पृथ्वी की शरणार्थी है, परंतु इस दार्शनिक आयाम से परे, राजनीतिक, धार्मिक, प्रजातीय, जातीय, सामाजिक, राष्ट्रीय, हिंसा, भेदभाव, संघर्ष इत्यादि के आधार पर इस दुनिया में लगभग करीब 11 करोड़ लोग विस्थापित हैं अर्थात अपनी जन्मभूमि से जबरन पलायन कर किसी और देश में शरण लेने को मजबूर हैं, और इस बड़ी जनसंख्या का लगभग एक तिहाई हिस्सा अट्ठारह वर्ष की आयु से भी कम है। ये वे बच्चे हैं जिन्होंने शायद अभी जन्मभूमि और राष्ट्र की संकल्पना को ठीक से न गढ़ा है और न ही समझा है। ये सभी शरणार्थी अधिकतम निम्न और मध्यम आय वाले राष्ट्रों में शरणागत हैं। इस संख्या में यदि अपने ही देश में विस्थापितों और राजनीतिक आश्रय मांगने वालों की संख्या जोड़ दी जाए तो लगभग पंद्रह करोड़ लोग इस दंश को झेल रहे हैं। इन्हीं लोगों के लिए और कमोबेश मानव सभ्यता की संवेदना के लिए 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस चिह्नित किया गया है।

पलायन और शरणार्थी होने का इतिहास लगभग मानवीय सभ्यता जितना ही पुराना है। किसी भी संघर्ष अथवा विवाद में ‘कमजोर’ के पास आत्मसमर्पण के विकल्प में पलायन ही रहा है। पलायन केवल हताशाजनक न हो कर एक उम्मीद का भाव भी रखता है, जिसमें कभी अपनी मिट्टी और देश लौट जाने की संभावना बरकरार रहती है। तमाम साहित्यिक रचनाएं इसी लौटने और शांति स्थापित होने वाली सुबह के इंतजार में लिखी गई हैं। इससे कहीं विकट स्थिति अपने ही देश में विस्थापित लोगों की भावना है जिसमें लौटने की संभावना लगभग न के बराबर होती है और विकास बनाम प्रकृति/संस्कृति संरक्षण के विमर्श में उलझ कर रह जाती है। प्रत्येक मनुष्य और सभ्यता में अंतर्निहित सार्वभौमिकता से इतर एक संदर्भित भौगोलिकता भी होती है, जो उसे किसी राज्य का केवल नागरिक ही नहीं बनाती बल्कि उसे काल-देश से रचित मनुज और मनुजता का भाव भी देती है और यही भाव उसके अस्तित्व और पहचान का आधार बनाती है। किसी को पलायन करने के लिए विवश करने में हम व्यक्ति से केवल उसकी संदर्भित भौगोलिकता ही नहीं छीनते बल्कि उसके अस्तित्व और पहचान को छीन ‘रिफ्यूजी’ सर्वनाम के कोष्ठक में रख देते हैं। पूरी दुनिया में, तुर्की 65 लाख शरणार्थियों के साथ शीर्ष स्थान पर इस मनुष्य रचित समस्या से ग्रस्त है। दक्षिण पूर्व देशों में भारत इस क्रम में तीसरे स्थान पर है। भारत में तिब्बती, चकमा, श्रीलंकाई, रोहिंग्या इत्यादि के अलावा भी अन्य अवैध शरणार्थियों और घुसपैठियों की बड़ी संख्या है। 1951 के रिफ्यूजी कन्वेंशन का भारत हस्ताक्षरी नहीं है, इसके बावजूद भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक वैविध्य किसी भी शरणार्थी को इंकार न करने का नैतिक संबल देता है। 1959 में लगभग अस्सी हजार साथियों के साथ दलाई लामा ने भारत में शरण ली और धर्मशाला के निकट मैक्लोडगंज में निर्वासित सरकार की स्थापना की। ल्हासा और तिब्बत के भूगोल से मिलता-जुलता यहां का आसमान और धरती उन्हें सुकून तो देते हैं पर एक दिन तिब्बत लौटकर अपने घर और देश के पुनर्निर्माण का सपना लिए हर तिब्बती की आंख नम मिलती है। एक पूरी पीढ़ी जो यहीं पैदा होकर बड़ी हुई और कभी तिब्बत को नहीं देखा उनकी संकल्पनाओं में भी तिब्बत जीवंत दिखाई देता है, शायद यह उनकी अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास को बचाए रखने का संघर्ष और केंद्रीय तिब्बती प्रशासन की निर्वासित सरकार के सतत प्रयासों का नतीजा है। सालों बाद आज भी ‘तिब्बत बचाओ-तिब्बत मुक्त करो’ इस आबादी का केंद्रित ध्येय है।

अवैध शरणार्थियों को घुसपैठिया करार देकर, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा, मानव तस्करी, देह व्यापार और वेश्यावृत्ति के लिए भी जिम्मेदार माना जाता है। किसी भी बहुधार्मिक-भाषाई-सांस्कृतिक राष्ट्र के लिए ‘रिफ्यूजी’ पसोपेश पैदा करने वाली समस्या है। केवल कुछ राष्ट्रों को ही सहानुभूति, सौहार्द और विराटमना होने की जिम्मेदारी देने से रिफ्यूजी और पलायन की समस्या दूर नहीं होगी। वैश्विक शांति, सद्भाव, अहिंसा, सहिष्णुता, सामंजस्य आदि तमाम संकल्पनाएं जो विकराल होते पूंजीवाद और राष्ट्रवादी उन्माद के सामने बौनी होती जा रही हैं केवल इन्हीं के सहारे ही हम सब ‘शरणार्थी’ होने की विद्रूपता से बच सकते हैं अन्यथा किसी न किसी की कहानी में हम अत्याचारी रहेंगे और किसी न किसी की कहानी में पलायनवादी अथवा शरणार्थी।

10.84

3 देशों से हैं सर्वाधिक शरणार्थी

सीरिया 68 लाख

यूक्रेन 57 लाख

अफगानिस्तान 57 लाख

करोड़ कुल शरणार्थी हैं दुनिया में संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों यूएनएचसीआर और यूएनआरडब्ल्यूए के नियमों के तहत

(14 जून 2023, यूएनएचसीआर ग्लोबल ट्रेंड्स 2022)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *