कॉलेज-एडमिशन में नस्ली आधार पर हो रही हैं भूलें..

ऐसा कम ही होता है कि मैं खुद को सुप्रीम कोर्ट के कंजर्वेटिव सदस्यों की किसी बात से सहमत पाऊं। लेकिन हार्वर्ड और यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना में एफर्मेटिव एक्शन (वंचित तबके के हित में नीतिगत कार्यक्रम) को समाप्त करने सम्बंधी चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स के मत को सुनकर मैं सहमति में सिर हिलाने लगा।

ऐसा नहीं है कि मैं एफर्मेटिव एक्शन का विरोधी हूं। जिन वर्गों को ऐतिहासिक रूप से वंचित रखा गया, उनके लिए सामाजिक न्याय के कार्यक्रम चलाते हुए उनके अवसरों को बढ़ाना नैतिक रूप से तर्कसंगत है। मेरा जन्म और लालन-पालन दक्षिण अफ्रीका में हुआ था और वहां रंगभेद-विरोधी सरकार ने एफर्मेटिव एक्शन को संविधान का हिस्सा बनाया था। लेकिन उसके पास इसके सिवा कोई और विकल्प था भी नहीं।

वहां अश्वेतों के साथ दशकों से भेदभाव किया जा रहा था। अलबत्ता अमेरिकी विश्वविद्यालयों के एडमिशन कार्यालयों के सामने ऐसी स्थिति नहीं है। हार्वर्ड और यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना के विरोध में प्रस्तुत किए दस्तावेजों को देखने पर पता चलता है कि वहां दाखिला-प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार अधिकारियों ने सांस्कृतिक विविधता के नाम पर एशियाई अमेरिकियों पर अश्वेतों और हिस्पैनिकों को प्राथमिकता दी है, जबकि एशियाई अमेरिकी भी वंचित समूह हैं।

बात नीतियों के अन्यायपूर्ण होने की ही नहीं, वे दोषपूर्ण और सरलीकृत भी हैं। आज अमेरिका में नस्ली आधार पर श्रेणीकरण दिन-ब-दिन जटिल होता जा रहा है और लोग पहले के बजाय स्वयं को किसी न किसी नस्ली समूह से अधिक जोड़कर देखने लगे हैं।

द न्यूयॉर्कर के जे कैस्पियन कैंग ने उचित ही लिखा है कि एलीट कॉलेजों का एफर्मेटिव एक्शन नस्ली रूप से दो भागों में विभाजित अमेरिका को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है और उसे आज के बहुसांस्कृतिक परिवेश के आधार पर अपडेट नहीं किया गया है। इसीलिए बहस भी पुराने ढर्रे पर चल रही है।

उनकी बात सुनकर मैं अपने बच्चों के बारे में सोचने लगा, जो दक्षिण एशियाई और श्वेत मूल के मिश्रण से बने हैं और अपनी नस्ली पहचान के बारे में उनका नजरिया इस पर निर्भर करता है कि उनसे यह सवाल कौन पूछ रहा है। मैं नहीं समझता मेरे बच्चों को उनकी नस्ल के कारण किसी दाखिला-प्रक्रिया में लाभ मिलेगा, न ही मैं ऐसा चाहता हूं, लेकिन हार्वर्ड और यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना जैसे शैक्षिक संस्थानों की नीतियों में बुनियादी भूलें हैं।

वे नस्ली पहचान की व्यापक और लचीली प्रकृति को सीमित नजरिए से देखते हैं। इस तरह के शैक्षिक संस्थानों में दाखिले से पहले आवेदक से पूछा जाता है कि आप खुद को किस तरह परिभाषित करते हैं? आवेदक को जो विकल्प उपलब्ध कराए जाते हैं, उनमें अमेरिकन इंडियन, अलास्का नैटिव, अश्वेत या एफ्रो, नैटिव हवाईयन या अन्य पैसिफिक आइलैंडर, हिस्पैनिक या लैटिनो या श्वेत लिखा होता है। साथ ही यह भी लिखा होता है कि आवेदक चाहें तो और विवरण भी दे सकते हैं। लेकिन ये श्रेणियां एक दृष्टि से बहुत व्यापक और दूसरी से बहुत संकीर्ण हैं।

एशियाई श्रेणी में उन आवेदकों को भी समायोजित किया जा सकता था, जिनके पूर्वज चीन, भारत, दक्षिण कोरिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम, जापान आदि देशों के थे। जबकि खुद को हिस्पैनिक मानने वाला कोई व्यक्ति गोरा भी हो सकता है, जिसका परिवार स्पेन में रहता हो, या जो क्यूबा से निर्वासित होकर मियामी चला आया हो, या जो ग्वाटेमाला की माया सभ्यता का वंशज हो।

लेकिन श्रेणियों का निर्धारण नौकरशाहों द्वारा किया जाता है। वे उन अधिकारियों सरीखे होते हैं, जो फेडरल एजेंसियों या जनगणना कार्यक्रम द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। जबकि रिकॉर्ड बताते हैं कि कॉलेजों में एडमिशन कराने वाले अधिकारीगण भी नस्ली जटिलताओं को समझने में सक्षम नहीं होते।

यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलाइना के एडमिशन अधिकारियों की एक ऑनलाइन चैट देखें। एक अधिकारी ने दूसरे से अच्छी ग्रेड्स पाने वाले एक छात्र की चमड़ी का रंग पूछा कि क्या वह भूरा है? जवाब मिला, अरे नहीं, वो एशियाई है। दूसरे अधिकारी ने जवाब दिया, इसके बावजूद उसकी ग्रेड्स बहुत इम्प्रेसिव हैं!

इस वार्तालाप में व्यक्त होने वाले कंफ्यूजन को देखें। कॉलेज की श्रेणियों के अनुसार एशियाई भूरी चमड़ी वाले होते हैं, यानी जिनका उद्गम भारतीय उपमहाद्वीप से हुआ हो! एक अन्य उदाहरण देखें। जब उसी यूनिवर्सिटी के एक अटॉर्नी से पूछा गया कि जॉर्डन, इराक, ईरान या मिस्र के व्यक्ति को किस बॉक्स पर निशान लगाना चाहिए, तो उसने कहा, मुझे पता नहीं। जब यूनिवर्सिटी को यही नहीं पता है कि मध्य-पूर्व एशिया के लोग किस नस्ल के होते हैं तो वे नस्ल के आधार पर फैसले कैसे ले सकते हैं?

(द न्यूयॉर्क टाइम्स से)

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