गठबंधन राजनीति में प्रधानमंत्री के वो 5 बड़े दावेदार ?
गठबंधन राजनीति में प्रधानमंत्री के वो 5 बड़े दावेदार, जो चुनाव बाद पीएम-इन-वेटिंग रह गए ..
गठबंधन राजनीति में चुनाव से पहले पीएम की दावेदारी नेताओं के लिए काफी जोखिम भरी रही है. चुनाव से पहले जिन चेहरों की चर्चा सबसे अधिक होती थी, चुनाव के बाद वही चेहरे नेपथ्य में चले गए.
इंडिया गठबंधन की हालिया बैठक में पीएम दावेदारी के लिए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम जोर-शोर से उछला.
खरगे दलित जाति से आते हैं और काफी सीनियर हैं. खरगे के अलावा भी पीएम पद के लिए कई नामों की चर्चा है. इनमें शरद पवार, राहुल गांधी और नीतीश कुमार का नाम सबसे प्रमुख है.
हालांकि, गठबंधन राजनीति में चुनाव से पहले पीएम की दावेदारी नेताओं के लिए काफी जोखिम भरी रही है. चुनाव से पहले जिन चेहरों की चर्चा सबसे अधिक होती थी, चुनाव के बाद वही चेहरे नेपथ्य में चले गए.

देवीलाल, मुलायम सिंह यादव और लालकृष्ण आडवाणी
1. जेपी-जगजीवन के नाम की चर्चा, मोरारजी बन गए पीएम
1977 में आपातकाल खत्म होने के बाद कांग्रेस के खिलाफ सभी विपक्षी पार्टियों ने मोर्चा तैयार किया. मोर्चे के अगुवा समाजवादी नेता जय प्रकाश नारायण थे. जेपी के विरोध के बाद ही 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था.
1977 के आम चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा. खुद इंदिरा गांधी रायबरेली सीट से चुनाव हार गईं. उत्तर के कई राज्यों में कांग्रेस शून्य पर सिमट गई.
चुनाव के बाद प्रधानमंत्री के नाम की चर्चा होने लगी, तो रेस में जेपी सबसे आगे थे. हालांकि, जेपी ने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कुर्सी लेने से इनकार कर दिया.
जेपी के इनकार करते ही 3 नाम पीएम की दावेदारी में सबसे आगे आ गए. इनमें मोरारजी देसाई, जगजीवन राम और चौधरी चरण सिंह का नाम शामिल था. दलित फेस होने की वजह से जगजीवन राम सभी से आगे थे.
संसदीय दल की बैठक के बाद जेपी ने जगजीवन राम और मोरारजी देसाई के साथ एक इंटर्नल मीटिंग की. इस बैठक में मोरारजी के नाम पर सहमति बनी, जिसके बाद मोरारजी देश के प्रधानमंत्री बने.
2. देवीलाल-चंद्रशेखर चर्चा में, वीपी मार गए बाजी
1989 में राजीव गांधी की मजबूत सरकार को टक्कर देने के लिए विपक्ष ने फिर से मोर्चा बनाया. इस बार इस मोर्चे का नाम राष्ट्रीय मोर्चा रखा गया. चुनाव से पहले इस मोर्चे में पीएम के कई बड़े दावेदार थे. इनमें देवीलाल और चंद्रशेखर का नाम सबसे आगे था.
देवीलाल जाट के बड़े नेता थे, जबकि चंद्रशेखर जनता पार्टी के सुप्रीमो थे. हालांकि, चुनाव से पहले किसी नाम का ऐलान नहीं किया गया.
राष्ट्रीय मोर्चा को इसका फायदा भी मिला. चुनाव के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार बनाने से चूक गई. राष्ट्रीय मोर्चा ने इसके बाद सरकार बनाने का दावा ठोक दिया. सरकार बनाने का दावा पेश करते ही प्रधानमंत्री के नाम की चर्चा तेज हो गई.
संसद भवन में समाजवादी नेता मधु दंडवते की अध्यक्षता में संसदीय दल की मीटिंग बुलाई गई. बैठक में सभी सांसदों ने चौधरी देवीलाल को अपना नेता चुना, लेकिन नाटकीय घटनाक्रम में देवीलाल ने वीपी सिंह को समर्थन दे दिया और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बन गए.
अपने नाम का प्रस्ताव आने के बाद देवीलाल उठे और सांसदों को संबोधित करने लगे. देवीलाल ने सांसदों से कहा कि मैं लोगों का ताऊ हूं और ताऊ ही रहना चाहता हूं, इसलिए मैं पीएम पद के लिए वीपी का नाम आगे कर रहा हूं.
देवीलाल का कहना था कि राजीव गांधी सरकार के खिलाफ बतौर संयोजक वीपी सिंह ने माहौल बनाने का काम किया, इसलिए उनका हक पीएम कुर्सी पर बनता है.
इस घटना को करीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने अपनी आत्मकथा में खुलासा किया कि देवीलाल को आगे करने के पीछे चंद्रशेखर को साइड लाइन करना था. दरअसल जनता पार्टी में प्रधानमंत्री के लिए वीपी सिंह के साथ ही चंद्रशेखर भी दावेदार थे.
नैय्यर के मुताबिक चंद्रशेखर वीपी के नाम पर राजी नहीं हो रहे थे, जिससे पीएम के नाम की घोषणा में देरी हो रही थी. चंद्रशेखर को मात देने के लिए अरुण नेहरू ने देवीलाल को मनाया था.
हालांकि, चंद्रशेखर बाद में प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हो गए थे.
3. चेहरा आडवाणी का, पीएम बन गए अटल बिहारी
1996 के लोकसभा चुनाव में पीवी नरसिम्हा राव की नेतृत्व वाली कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली. बीजेपी अकेले दम पर 160 सीट हासिल करने में कामयाब रही, जबकि एनडीए गठबंधन को 194 सीटों पर जीत मिली.
चुनाव से पहले लालकृष्ण आडवाणी के नाम की चर्चा जोरों पर थी. इसकी 2 वजहें थीं- 1. आडवाणी को आरएसएस का समर्थन प्राप्त था और 2. आडवाणी के नेतृत्व में बीजेपी को कई राज्यों में जीत मिली थी.
हालांकि, चुनाव के 13 दिन बाद राष्ट्रपति भवन में अटल बिहारी वाजपेई का शपथग्रहण हुआ. पीएम रेस से आडवाणी के आउट होने के पीछे गठबंधन दलों का वीटो था.
उस वक्त वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी से बात करते हुए आडवाणी ने कहा था कि सरकार बनाने और पार्टी हित के लिए मैंने अपना नाम वापस ले लिया.
अटल के प्रधानमंत्री बनने के पीछे एक और कहानी उस वक्त चर्चा में थी. दरअसल, किसी दल को बहुमत न आने की स्थिति में कांग्रेस कार्यसमिति ने संयुक्त मोर्चा को समर्थन दे दिया, लेकिन राव को यह मंजूर नहीं था.
राव ने तय समय पर समर्थन का कागज संयुक्त मोर्चा को नहीं सौंपा, जिसके बाद राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर दिया. अटल की यह सरकार सिर्फ 13 दिनों तक चल पाई.
4. चर्चा वीपी और मुलायम की, पीएम बन गए देवगौड़ा
1996 में अटल बिहारी की सरकार गिरने के बाद संयुक्त मोर्चा ने सरकार बनाने का दावा ठोका. संयुक्त मोर्चा की ओर से वीपी सिंह और मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री की रेस में सबसे आगे थे.
मुलायम के नाम पर तो कई दलों में लगभग सहमति भी बन गई थी, लेकिन लालू यादव के विरोध के बाद मुलायम का नाम रेस से बाहर हो गया. एक इंटरव्यू में मुलायम ने इसका जिक्र करते हुए कहा था कि लालू यादव ने संख्या का डर दिखाकर मोर्चा के नेताओं को डरा दिया.
मुलायम के बाद वीपी सिंह को मनाने संयुक्त मोर्चा के लोग पहुंचे, लेकिन वीपी सिंह ने पीएम बनने से इनकार कर दिया. इसके बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी देवगौड़ा को संयुक्त मोर्चा का नेता चुना गया.
5. सोनिया का नाम तय था, लेकिन हो गई मनमोहन की ताजपोशी
2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) ने अटल बिहारी की नेतृत्व वाली एनडीए को मात दी. यूपीए में कांग्रेस का दबदबा सबसे ज्यादा था, इसलिए पीएम की कुर्सी उसे ही मिलना तय था.
पीएम पद के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का नाम भी लगभग तय था. सहयोगी दल भी सोनिया के नाम पर राजी थे.
हालांकि, संसदीय दल की मीटिंग से पहले सोनिया ने अपना नाम पीएम पद की रेस से बाहर कर लिया. सोनिया ने कुर्बानी देने की बात कहकर किसी और को प्रधानमंत्री बनाने की बात कही.
सोनिया के नाम वापस लेने के बाद कांग्रेस के भीतर हंगामा मच गया. सोनिया ने नाम क्यों वापस लिया, इसको लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही है. हालांकि, कई रिपोर्ट्स में यह जरूर कहा गया कि प्रियंका और राहुल नहीं चाहते थे कि सोनिया प्रधानंमत्री बने.
सोनिया के नाम वापस लेने के बाद कांग्रेस में नेता की खोज शुरू हो गई. प्रणब मुखर्जी, अर्जुन सिंह समेत कई नाम रेस में आए पर आखिर में मनमोहन के नाम पर सहमति बनी.