मौजमस्ती के दिन गए, नहीं ढो पा रहे हैं खर्चे का बोझ ?
मौजमस्ती के दिन गए, नहीं ढो पा रहे हैं खर्चे का बोझ: शहरों में रहने वाले लोगों का दर्द समझिए
शहरी लोगों की तरफ से खर्च में जो गिरावट दिख रही है, वह ग्रामीण भारत से बिल्कुल अलग है. ग्रामीण इलाकों में लोग अब भी फ्रिज, टू-व्हीलर और यहां तक कि कारें खरीद रहे हैं.
हालांकि, बाजार में जो गिरावट दिख रही है, वह ग्रामीण भारत से बिल्कुल अलग है. ग्रामीण इलाकों में लोग अब भी फ्रिज, टू-व्हीलर और यहां तक कि कारें खरीद रहे हैं. इस तरह से भारत के अंदर दो अलग-अलग आर्थिक स्थितियां बनती दिख रही हैं – एक शहरी भारत में मंदी, जबकि ग्रामीण भारत में खपत की रफ्तार बरकरार है.
ऐसे में इस रिपोर्ट में विस्तार से जानते हैं कि आखिर शहर के लोगों ने खरीददारी कम क्यों कर दी है और इससे देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है?
क्यों पहले से कम खर्च कर रहे हैं लोग
शहरी मांग में यह गिरावट सिर्फ एक छोटी सी रुकावट नहीं है, बल्कि यह महामारी के बाद जो खपत में तेज़ी आई थी, उसका अब संतुलन है. दरअसल महामारी के दौरान लोग बहुत ज्यादा खरीदारी कर रहे थे, लॉकडाउन के दौरान लोग ज़रूरी चीजों जैसे सफाई के सामान, ग्रूमिंग प्रोडक्ट्स, और इलेक्ट्रॉनिक्स पर खर्च कर रहे थे. फिर जैसे-जैसे सेवाएं फिर से शुरू हुईं और यात्रा पर रोकें कम हुईं, लोग ऐसे सामानों और सेवाओं पर खर्च करने लगे जो ज्यादा संपर्क में आते थे, जैसे ट्रैवलिंग और व्यक्तिगत देखभाल. इसे रिवेंज स्पेंडिंग कहा गया, क्योंकि लोग वो सब कुछ खरीद रहे थे, जो उन्होंने महामारी के दौरान नहीं किया था.
आसान भाषा मे कहें तो महामारी के बाद लोग ज़्यादा खर्च कर रहे थे, तो अब धीरे-धीरे उनकी खर्च करने की आदतें सामान्य हो रही हैं, जिसका असर कई उद्योगों पर पड़ रहा है.
आय वृद्धि में कमी भी कम खर्च करने का बड़ा कारण
शहरी भारत में एक बड़ी आबादी की आय वृद्धि धीमी हो गई है, जिससे उनकी खरीदारी की क्षमता प्रभावित हुई है. ब्रिटानिया के आंकड़े बताते हैं कि साल 2024 की पहली तिमाही में शहरी क्षेत्रों में गैर-सैलरी वर्ग के श्रमिकों का हिस्सा 51% था, जो पिछले साल की तुलना में थोड़ा बढ़ा है. लेकिन इन श्रमिकों की आय में केवल 3.4% का इज़ाफ़ा हुआ, जबकि सैलरीड कर्मचारियों की आय में 6.5% की वृद्धि हुई है.
वरुण बेरी, ब्रिटानिया के वाइस चेयरमैन और एमडी ने मिंट की एक रिपोर्ट में बताया कि शहरी भारत में लगभग 51% गैर-सैलरी कर्मचारियों की आय में स्थिरता आ चुकी है, जिससे उपभोक्ता खपत में कमी आ रही है.
महंगाई भी कम खर्च का बड़ा कारण
कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी से उपभोक्ताओं के लिए मुश्किलें और बढ़ गई हैं. कंपनियां, खासकर उपभोक्ता वस्त्र कंपनियां, लगातार अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ा रही हैं. इसके साथ ही, उपभोक्ताओं को कच्चे माल की बढ़ी हुई लागत का भी बोझ उठाना पड़ रहा है. इसके अलावा, सब्जियों और खाद्य उत्पादों की कीमतें भी बढ़ी हैं, जिससे शहरी परिवारों का बजट प्रभावित हो रहा है. उदाहरण के लिए, प्याज, आलू, टमाटर, और दालों की कीमतों में भारी वृद्धि हो गई है, जिससे 20-30% शहरी परिवारों को अपनी खरीदारी में परेशानी हो रही है.
सस्ती कारों की बिक्री हुई कम
उदाहरण के तौर पर भारत क सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया को ही ले लीजिये. सितंबर तिमाही के दौरान मारुति की मिनी और कॉम्पैक्ट कारों की बिक्री में गिरावट आई. हालांकि, कंपनी की ग्रैंड वितारा और Fronx SUV जैसी बड़ी कारों और यूटिलिटी वाहनों में ग्राहकों की रुचि बनी रही. इस मंदी को संभालने के लिए मारुति ने अपनी कारों पर ₹29,300 तक की छूट दी, लेकिन फिर भी मिनी और कॉम्पैक्ट कारों की बिक्री कुल बिक्री का केवल 44.9% रही, जो पिछली तिमाही में 48.8% थी.
यह दर्शाता है कि लोग अब छोटी कारों की बजाय बड़ी कारों को प्राथमिकता दे रहे हैं.
ग्रामीण भारत में थोड़ी राहत
हालांकि शहर की तुलना में ग्रामीण भारत में के लोग अभी भी इन कारों को खरीद रहे हैं, लेकिन शहरी इलाकों में खरीद कम होने के कारण पूरे बाजार का विकास धीमा हो गया है. यानी, शहरी क्षेत्रों में बिक्री कम हो रही है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में मांग अभी भी बनी हुई है.
त्योहारों में कुछ सुधार
अक्टूबर में त्योहारों के दौरान बिक्री में थोड़ी बढ़ोतरी देखी गई, खासकर पैसेंजर व्हीकल्स (कारें) और टू-व्हीलर (बाइक और स्कूटर) की बिक्री में. हालांकि, विशेषज्ञों को लगता है कि यह उछाल सिर्फ तात्कालिक हो सकता है और साल के अंत तक इसे बनाए रखना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि उपभोक्ताओं की मानसिकता अब भी मंदी की ओर झुकी हुई है. मतलब, त्योहारों के दौरान थोड़ी बिक्री बढ़ी, लेकिन इसके लंबे समय तक जारी रहने की संभावना नहीं है.
ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज़ की चिंताएं
ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज ने अपनी दूसरी तिमाही के नतीजों में बताया कि शहरी भारत में मुश्किलें बढ़ रही हैं. मेट्रो शहरों में फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स उत्पादों की 30% बिक्री होती है, लेकिन यहां पर मांग बाकी इलाकों की तुलना में 2.4 गुना तेज़ी से घट रही है. इसका मतलब है कि शहरों में फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स उत्पादों की बिक्री में काफी गिरावट आई है.
कंपनी ने यह भी बताया कि शहरी घरों में खासकर गैर-सैलरी कामकाजी लोगों (जिनकी स्थिर आय नहीं होती) की आय में सिर्फ 3.4% की बढ़ोतरी हुई है, जबकि सैलरीड कर्मचारियों (जिनकी महीने के आधार पर निश्चित आय होती है) की आय में 6.5% की बढ़ोतरी हुई है. इसका मतलब है कि शहरी इलाकों में जिन लोगों की आय स्थिर नहीं है, उनकी स्थिति कमजोर हो गई है, और इससे उनकी खरीदारी में कमी आ रही है.
हालांकि कुछ कंपनियां, जैसे क्रॉम्पटन ग्रीव्स, अभी भी अच्छे कारोबार का अनुभव कर रही हैं, खासकर महंगे सामान जैसे एयर कंडीशनर, फैन्स, और रेफ्रिजरेटर की बिक्री में. इन कंपनियों ने अपनी चीज़ों की कीमत बढ़ा दी है, लेकिन फिर भी लोग इन्हें खरीद रहे हैं, इसलिए बिक्री पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है.