, नई दिल्‍ली। नीति आयोग के पूर्व सीईओ और जी-20 शेरपा अमिताभ कांत ने रायसीना डायलाग को संबोधित करते हुए शहरों को आर्थिक विकास और समृद्धि का संवाहक बताया है। भारत को विकसित देश बनाने में शहरों की भूमिका काफी अहम होने वाली है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई इस बात का जीता जागता उदाहरण है।
मुंबई की जीडीपी 18 राज्यों की जीडीपी से अधिक है। इसी तरह नोएडा की जीडीपी कानपुर की जीडीपी से 12 गुना अधिक है, लेकिन काफी समय से देखा जा रहा है कि भारत में शहरीकरण तेज होने की वजह से शहर आकार में तो बड़े हो रहे है, लेकिन उनका नियोजित विकास नहीं हो रहा है।
भारतीय शहर झुग्गी झोपड़ी, ट्रैफिक जाम और प्रदूषण के लिए जाने जाते हैं। नियोजित विकास न होने से शहरों में रहने वाली एक बड़ी आबादी न सिर्फ न्यूनतम बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है, बल्कि लोग स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए निजी क्षेत्र की महंगी सुविधाओं पर निर्भर हैं।
जाहिर है कि ऐसे शहर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की क्षमता नहीं रखते हैं। अनियोजित विकास के पर्याय बन चुके शहर तेज शहरीकरण की राह में किस तरह की चुनौतियां पैदा रहे हैं, इसकी पड़ताल ही आज का मुद्दा है? 

भारत के शहरीकरण मॉडल में समस्या
मुंबई के घरों में हर व्यक्ति के लिए जगह सिर्फ 30 वर्ग फीट है। वहीं चीन के शहरों में हर प्रति व्यक्ति जगह 120 वर्ग फिट से अधिक है।
देश में कैसी हैं संभावनाएं?
भारत में पिछले कुछ दशकों में तेजी से शहरीकरण हुआ है, लेकिन वैश्विक स्तर के लिहाज से हम अभी बहुत पीछे हैं। इसके अलावा भारत में शहरों का विकास नियोजित नहीं है। इसकी वजह से शहर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में प्रभावी योगदान नहीं दे पा रहे हैं।   

 

वेतन और पेंशन पर सबसे ज्यादा खर्च करते हैं नगर निगम

भारत में दिल्ली और मुंबई नगर निकायों की सबसे अधिक चर्चा होती है। इनके फैसलों और काम से आम लोगों के साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियां और देश के प्रभावशाली लोग भी प्रभावित होते हैं। दिल्ली नगर निगम का एरिया मुंबई की तुलना में लगभग तीन गुना है लेकिन दोनों का बजट लगभग बराबर है और दोनों लगभग एक ही तरीके काम करते हैं।
हालांकि, बजट खर्च करने की बात करें तो दोनों नगर निगम बजट का बड़ा हिस्सा नागरिक सुविधाओं के विकास पर नहीं वेतन, मजदूरी और पेंशन पर खर्च करते हैं। ऐसे में इस बात का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि दिल्ली और मुंबई में बुनियादी और नागरिक सुविधाओं की हालत क्यों खराब है।   

 

आम लोग क्‍या सोचते हैं?

निजी हाथों में सौंपा जाए काम राजेश कुमार चौहान का कहना है, ‘अब समय आ गया है कि सरकारों को शहरीकरण की बाधाओं को दूर करने के लिए शहरों के हर काम को निजी क्षेत्र के हाथों में सौंप देना चाहिए। अक्सर देखा गया है कि निजी क्षेत्र में ऊपर से नीचे तक सभी कर्मचारियों को अपना काम पूरी जिम्मेदारी और सावधानी से करना पड़ता है, क्योंकि इन्हें डर रहता है कि ऐसा न करना इनकी नौकरी पर भारी पड़ सकता है।’
नियोजित शहर बसाने की जरूरत
 प्रमोद कुमार का कहना है कि भारत में शहरों का नियोजित विकास नहीं हो रहा है। इसकी वजह से कि जिम्मेदार संस्थाएं नियमों को परे रख कर काम करती हैं। आबादी पहले बस जाती है और बुनियादी सुविधाओं के लिए उनको दशकों तक इंतजार करना पड़ता है।
ऐसे हालात में रहने वाले नागरिक अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा भी नहीं दिला पाते। देश को अकुशल नागरिक मिलते हैं जो अपने जीवन को बेहतर बनाने में सक्षम नहीं होते हैं।  इस तरह के शहर अर्थव्यवस्था में योगदान देने के बजाय बोझ साबित हो रहे हैं। 

बदहाली के लिए स्‍थानीय निकाय जिम्‍मेदार 
वीरेन्द्र सचदेवा का मानना है कि शहरों की खराब स्थिति के लिए सबसे ज्यादा स्थानीय निकाय जिम्मेदार हैं। नगर निगमों और स्थानीय निकायों के काम करने का तौर तरीका निचले स्तर का है। ये भ्रष्ट्राचार और आर्थिक कुप्रबंधन का अड्डा बन गए हैं। इनकी हालत सुधारे बिना शहरों को व्यवस्थित नहीं किया जा सकता है।