जजों की नियुक्ति में आरक्षण का प्रावधान क्यों नहीं?
जजों की नियुक्ति में आरक्षण का प्रावधान क्यों नहीं? SC/ST समुदायों का प्रतिनिधित्व कितना
भारत के सभी हाई कोर्ट की स्थिति बहुत गंभीर है. यहां 357 जजों के पद खाली हैं, यानी लगभग 32% पद खाली हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि हाई कोर्ट में जजों की भारी कमी है.
वहीं, हर राज्य में एक हाई कोर्ट होता है, जो उस राज्य की सबसे बड़ी अदालत होती है. यह राज्य की निचली अदालतों की निगरानी करता है और उनके फैसलों के खिलाफ अपील सुनता है. इन सभी अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति कैसे होती है, क्या जजों की नियुक्ति में आरक्षण का प्रावधान है, अलग-अलग समुदायों का कितना प्रतिनिधित्व है और कितने पद खाली हैं, यह जानना हमारे लिए महत्वपूर्ण है. आइए, इस स्पेशल स्टोरी में विस्तार से समझते हैं.
अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति कैसे होती है?
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति एक संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होती है. सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति कॉलेजियम सिस्टम के तहत होती है. कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) और सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं. कॉलेजियम जजों के नामों की सिफारिश सरकार को भेजता है. फिर भारत के राष्ट्रपति कॉलेजियम की सिफारिश पर जजों की नियुक्ति करते हैं.
सुप्रीम कोर्ट के जज बनने के लिए एक व्यक्ति को भारतीय नागरिक होना चाहिए और कम से कम पांच साल के लिए हाई कोर्ट का जज या दस साल के लिए हाई कोर्ट का वकील होना चाहिए या राष्ट्रपति की राय में एक प्रतिष्ठित न्यायविद होना चाहिए.
वहीं, हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति भी कॉलेजियम सिस्टम के तहत होती है. हाई कोर्ट के कॉलेजियम में हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और उस कोर्ट के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं. हाई कोर्ट कॉलेजियम द्वारा अनुशंसित नाम सीजेआई और सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम के अनुमोदन के बाद ही सरकार तक पहुंचते हैं.
जजों की नियुक्ति में आरक्षण का प्रावधान क्यों नहीं?
भारत में सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए आरक्षण की व्यवस्था है. मगर, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति में ऐसा कोई आरक्षण प्रावधान नहीं है.
भारतीय संविधान के अनुसार, जजों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 224 के तहत की जाती है. इन अनुच्छेदों में साफ-साफ लिखा है कि जजों की नियुक्ति में किसी जाति या वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण नहीं होगा. इसलिए, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की जाति या वर्ग के हिसाब से कोई डेटा सरकार के पास नहीं है. न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए, यह आवश्यक माना गया है कि नियुक्तियां योग्यता, अनुभव और निष्पक्षता के आधार पर होनी चाहिए, न कि जाति या वर्ग के आधार पर.
लेकिन एक ट्विस्ट है. साल 2018 से हाई कोर्ट के जज बनने के लिए जिन लोगों के नाम भेजे जाते हैं, उनसे उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी मांगी जाती है. ये जानकारी एक खास फॉर्म में भरनी होती है, जिसे सुप्रीम कोर्ट से सलाह लेकर बनाया गया है. इसलिए, 2018 से लेकर अब तक कुछ हद तक जजों की सामाजिक पृष्ठभूमि का डेटा सरकार के पास है.
आंकड़े क्या कहते हैं?
सरकारी की ओर से संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, 2018 से 31 दिसंबर 2022 तक कुल 540 जज नियुक्त किए गए. इनमें से 15 जज अनुसूचित जाति (SC), 7 जज अनुसूचित जनजाति (ST), 57 जज अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और 27 जज अल्पसंख्यक वर्ग के हैं.
इसका मतलब ये हुआ कि संविधान के हिसाब से जजों की नियुक्ति में आरक्षण नहीं है, लेकिन 2018 से सरकार ने जजों की सामाजिक पृष्ठभूमि का डेटा इकट्ठा करना शुरू कर दिया है. इससे पता चलता है कि न्यायपालिका में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व कितना है.
क्या सरकार चाहती है कि न्यायपालिका में समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व हो?
संसद में लिखित जवाब में सरकार ने बताया, सरकार चाहती है कि न्यायपालिका में समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व हो. इसलिए, सरकार हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से कहती रहती है कि जब वे जजों के नाम की सिफारिश करें तो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाओं जैसे वर्गों के योग्य उम्मीदवारों पर भी ध्यान दें. मगर, जजों के नाम भेजने और चुनने का अधिकार मुख्य रूप से कॉलेजियम के पास है. सरकार सिर्फ सिफारिश कर सकती है.
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में कितने जजों की नियुक्ति
सरकार ने बताया, साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की नियुक्तियां हुईं, जबकि 2015 में केवल 1 नियुक्ति हुई. 2023 में 14 नियुक्तियां हुई जो की सबसे ज्यादा है. 2024 में 4 और 2025 में 2 नियुक्तियां हुई है.
वहीं, हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति में क्षेत्रीय भिन्नता देखी गई है. कुछ हाई कोर्ट में नियमित रूप से नियुक्तियां होती हैं, जबकि कुछ में नियुक्तियों की संख्या कम या अनियमित है. इलाहाबाद, बॉम्बे, कलकत्ता, दिल्ली, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, मद्रास, पंजाब और हरियाणा और तेलंगाना जैसे बड़े हाई कोर्ट में नियुक्तियों की संख्या अधिक है. सिक्किम, मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा जैसे छोटे हाई कोर्ट में नियुक्तियों की संख्या कम है. 2022 में हाई कोर्ट में सबसे ज्यादा 165 नियुक्तियां हुई है. 2024 और 2025 में हाई कोर्ट में नियुक्तियों की संख्या में भारी गिरावट आई है.
अदालत में जजों की कमी: इंसाफ में देरी का बड़ा कारण?
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की स्वीकृत और कार्यरत संख्या के आंकड़ों का विश्लेषण करने से न्यायपालिका की एक गंभीर तस्वीर सामने आती है. ये आंकड़े बताते हैं कि देश की जस्टिस सिस्टम जजों की कमी से किस कदर जूझ रही है, जिसका सीधा असर आम जनता को मिलने वाले न्याय पर पड़ रहा है.
सरकार ने अपनी रिपोर्ट में बताया, सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या 34 है, जिनमें से 33 जज कार्यरत हैं. सिर्फ एक पद खाली है. देखने में ये कमी छोटी लग सकती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट देश की सर्वोच्च अदालत है और यहां एक भी पद खाली रहना बड़े मामलों के निपटारे में देरी का कारण बन सकता है.
वहीं, हाई कोर्ट की स्थिति बहुत गंभीर है. यहां जजों की स्वीकृत संख्या 1122 है, लेकिन कार्यरत जज सिर्फ 765 हैं. मतलब कि 357 पद खाली हैं, यानी लगभग 32% पद खाली हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि हाई कोर्ट में जजों की भारी कमी है. सबसे ज्यादा इलाहाबाद हाई कोर्ट में 81 पद खाली हैं. इसके बाद पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट में 32, बॉम्बे हाई कोर्ट में 28, कलकत्ता हाई कोर्ट में 26, दिल्ली हाई कोर्ट में 21 पद खाली हैं. मेघालय, सिक्किम और त्रिपुरा हाई कोर्ट में कोई पद खाली नहीं है.