अभिव्यक्ति की आजादी के फर्जी चैंपियन, मुफ्त में प्रचार में खुद की फजीहत
अभिव्यक्ति की आजादी के फर्जी चैंपियन, मुफ्त में प्रचार में खुद की फजीहत
कॉमेडी के नाम पर फूहड़ता करने वाले उनके जैसे और भी कॉमेडियन हैं। किसी दल या सरकार की ओर से ऐसे कॉमेडियनों के पीछे पड़ना एक तरह से उनका मुफ्त में प्रचार करना और खुद की फजीहत कराना ही है। यह काम अन्य सरकारें भी करती हैं।वे कभी किसी कटाक्ष पर किसी कॉमेडियन के पीछे पड़ जाती हैं और कभी सोशल नेटवर्क साइट्स पर अपने खिलाफ टिप्पणी करने वालों के।
…. कॉमेडियन कुणाल कामरा को गिरफ्तार करने के लिए मुंबई पुलिस कमर कसे हुए है। इसका पता इससे चलता है कि जब मद्रास उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर पर सात अप्रैल तक गिरफ्तारी पर रोक लगा दी तो उनके खिलाफ तीन और एफआईआर दर्ज कर दी गईं। इन एफआईआर के दर्ज होने के बाद मुंबई पुलिस गत दिवस उनके आवास पर पहुंची। वह वहां नहीं थे। वह तमिलनाडु में थे।
कामरा ने मुंबई पुलिस पर तंज कसते हुए कहा कि वह अपना समय बर्बाद कर रही है, क्योंकि पुलिस जिस पते पर पहुंची, वहां वह दस वर्ष से नहीं रह रहे हैं। मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले के चलते मुंबई पुलिस पहली एफआईआर पर तो उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकती, लेकिन तीन नई एफआईआर पर ऐसा कर सकती है।
यदि मुंबई पुलिस नई एफआईआर के सिलसिले में उनकी तलाश तेज करती है तो वह फिर से मद्रास उच्च न्यायालय या फिर सर्वोच्च न्यायालय जा सकते हैं। इसमें उन्हें कोई समस्या इसलिए नहीं आनी, क्योंकि भाजपा-शिवसेना के विरोधी कई राजनीतिक वकील उनका साथ देने के लिए तैयार होंगे। यह भी लगभग तय है कि यदि वह सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं तो उन्हें वहां से राहत भी मिल जाएगी।
अभी तक यही देखने को मिलता रहा है कि यदि किसी के खिलाफ किसी एक मामले में कई एफआईआर दर्ज होती हैं तो पीड़ित उन्हें एक साथ नत्थी करने की अपील लेकर सुप्रीम कोर्ट जाते हैं। उन्हें वहां से राहत मिल जाती है। कामरा को भी मिल जाए तो हैरानी नहीं। हैरानी इस पर होगी, यदि मुंबई पुलिस कामरा को गिरफ्तार करने पर अड़ी रहती है।
पता नहीं इसमें उसे सफलता मिलती है या नहीं। यदि मिल भी जाती है तो आसार इसी के हैं कि उन्हें शीघ्र जमानत मिल जाएगी, क्योंकि उन पर मात्र यह आरोप है कि उन्होंने एक पैरोडी गाने के जरिये शिवसेना नेता और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का अपमान किया। इससे कुपित होकर कुछ शिवसैनिकों ने एक होटल में तोड़फोड़ की, जहां कामरा ने पैरोडी गाने की रिकार्डिंग की थी। यह पैरोड़ी गाना शिंदे को नीचा दिखाने वाला था। इसे ढंग की पैरोडी कहना कठिन है, लेकिन शिवसेना और भाजपा विरोधियों का वह बहुत भाया।
यह कोई नई-अनोखी बात नहीं, क्योंकि जो कटाक्ष किसी को मनोरंजक लगता है, वही किसी अन्य को अपमानजनक। शिवसैनिकों को ऐसा ही लगा और वे अब भी कामरा को धमका रहे हैं और चूंकि शिवसेना महाराष्ट्र की सत्ता में है, इसलिए मुंबई पुलिस भी उनकी गिरफ्तारी को लेकर व्याकुल है। इसका नतीजा यह है कि कामरा को वे लोग भी जान गए, जिन्होंने उनका नाम तक नहीं सुना था।
कुणाल कामरा के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई का संज्ञान कई विदेशी समाचार माध्यमों ने भी लिया। इसके अलावा महज आठ-नौ दिनों में लाखों लोग उनके उस वीडियो को देख चुके हैं, जिसमें उन्होंने शिंदे पर निशाना साधा था। कामरा फूहड़ किस्म के उन कॉमेडियन में से हैं, जिन्हें लगता है कि किसी के खिलाफ ओछी टिप्पणी करना ही कॉमेडी है।
कॉमेडी के नाम पर फूहड़ता करने वाले उनके जैसे और भी कॉमेडियन हैं। किसी दल या सरकार की ओर से ऐसे कॉमेडियनों के पीछे पड़ना एक तरह से उनका मुफ्त में प्रचार करना और खुद की फजीहत कराना ही है। यह काम अन्य सरकारें भी करती हैं। वे कभी किसी कटाक्ष पर किसी कॉमेडियन के पीछे पड़ जाती हैं और कभी सोशल नेटवर्क साइट्स पर अपने खिलाफ टिप्पणी करने वालों के। अधिकतर मामलों में ऐसे लोगों को अदालतों से राहत मिल जाती है, लेकिन कभी-कभार किसी को जेल में भी रहना पड़ता है और कई बार तो महीनों। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हर मामले में अदालतें तत्परता का परिचय नहीं देतीं।
उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री रहते नागपुर के एक युवक को मुंबई पुलिस ने 17 दिन के अंदर तीन बार गिरफ्तार कर जेल भेजा, क्योंकि उसने उनके एक करीबी को पेंग्विन कह दिया था। कुणाल कामरा मामले में जैसा व्यवहार शिवसेना और महाराष्ट्र सरकार कर रही है, वैसा ही अन्य दल और उनकी सरकारें भी करती हैं। यह बात और है कि जब यही दल इस तरह का कोई मामला विरोधी दल के शासन में देखते हैं तो वे अचानक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चैंपियन बन जाते हैं।
इन दिनों भाजपा और शिवसेना विरोधी दल कामरा का समर्थन करते हुए खुद को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा सिपाही साबित करने में लगे हुए हैं। इनमें ठाकरे की शिवसेना सबसे आगे है, जिसने सत्ता में रहते समय अपनी मामूली आलोचना करने वालों को लोगों को जेल भेजने अथवा उनके घर-दफ्तर गिराने में संकोच नहीं किया। इनमें कंगना रनौत भी हैं।
उद्धव ठाकरे सरकार के समय ही जब कंगना के दफ्तर के एक हिस्से को ढहाया गया था तो कई दलों के नेताओं ने इसे उचित बताने की कोशिश की थी या फिर इस कार्रवाई पर खुशी जताई थी। इनमें कुणाल कामरा भी थे। तब अभिव्यक्ति की आजादी के कथित चैंपियनों को सांप सूंघ गया था। ऐसे फर्जी चैंपियन तब भी हर्षित-मुदित हुए थे, जब चंडीगढ़ हवाई अड्डे पर सीआईएसएफ की एक महिला कांस्टेबल ने कंगना को थप्पड़ मारा था। अपने देश में अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकतर चैंपियन यह समझने को तैयार नहीं कि यह आजादी उनके लिए भी होती है, जो उनके मन मुताबिक बात नहीं करते।