जम्मू-कश्मीर में दम तोड़ता अलगाववाद, बढ़ने लगी पाकिस्तान की मुश्किलें
द्विपक्षीय संबंधों की दृष्टि से भी देखें तो पाकिस्तान को दबाव में बनाए रखने और अधिक भाव न देने की नीति इस अर्थ में भी कारगर रही कि सीमा पर हिंसक घटनाएं कम हुई हैं। वर्ष 2020 में चीन द्वारा पूर्वी लद्दाख में सैन्य मोर्चा खोलने के समय भी पाकिस्तान ने पश्चिमी मोर्चे पर कोई आक्रामक मुद्रा नहीं अपनाई ।
….. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल में संसद को एक सुखद सूचना दी। उन्होंने बताया कि जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के कुछ धड़ों ने भारत के प्रति निष्ठावान रहने का निर्णय किया है। इन गुटों में कश्मीर के सबसे कट्टरपंथी और पाकिस्तानपरस्त समझे वाले नेता सैयद अली शाह गिलानी के राजनीतिक उत्तराधिकारी मोहम्मद शफी की पार्टी डेमोक्रेटिक पीपुल्स मूवमेंट भी शामिल है।
यह परिवर्तन दर्शाता है कि कश्मीर के कट्टरपंथी अलगाववादी इस्लामिक गुटों पर अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद से की गई सख्ती के अपेक्षित परिणाम सामने आ रहे हैं। अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद सरकार ने हुर्रियत में शामिल कई अलगाववादी गुटों पर अवैध गतिविधि निवारण अधिनियम यानी यूएपीए के अंतर्गत प्रतिबंध लगा दिया था। इसके साथ ही पाकिस्तान से और विभिन्न प्रकार की अवैध गतिविधियों से प्राप्त होने वाले काले धन के प्रवाह को रोकने के लिए भी कठोर कार्रवाई की गई।
गत 12 मार्च को ही मीरवाइज उमर फारूक की अवामी एक्शन कमेटी पर प्रतिबंध लगाकर स्पष्ट संकेत दिया गया कि कश्मीर में अलगाववाद की कोई दुकान चलने नहीं दी जाएगी, चाहे उसे चलाने वाला कितना ही बड़ा नाम क्यों न हो। इस बीच अमित शाह ने कई बार दोहराया कि अनुच्छेद 370 की किसी भी सूरत में वापसी नहीं होने वाली। उनके और मोदी सरकार के इस संकल्प ने अलगाववादियों का मनोबल तोड़ने का काम किया है। इसका यह नतीजा निकला है कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले कश्मीरी मुस्लिम नेताओं को समझ आ गया कि यदि राजनीतिक वजूद बनाए रखना है तो अलगाववादी राजनीति को छोड़ना ही होगा।
मोदी सरकार की यह नीति मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के एकदम उलट है। मनमोहन सरकार तो हुर्रियत के धड़ों में यही ढूंढ़ने का प्रयास करती थी कि उनमें नरम अलगाववादी कौन हैं। मनमोहन सरकार ने संभवत: उन्हें नरम अलगाववादी माना जो कश्मीर की आजादी का राग तो छेड़ते थे, परंतु सीधे तौर पर पाकिस्तान में शामिल होने की बात नहीं करते थे।
मनमोहन सरकार ने कभी यह सोचा ही नहीं कि कश्मीर की आजादी कभी संभव नहीं हो सकती, क्योंकि भारत से अलग होते ही पाकिस्तान बलात उस पर कब्जा कर लेगा। नरम अलगाववाद को हवा देने वाली मनमोहन सरकार की इस विवेकशून्य नीति के दायरे में यासीन मलिक तक आ गए थे। यासीन मलिक वही दुर्दांत आतंकी था, जिसके हाथ वायु सेना अधिकारियों के खून से सने थे। उस दौर में ऐसे आतंकी की प्रधानमंत्री आवास पर मेहमाननवाजी की जाती थी।
जब भारत सरकार ही हुर्रियत के अलगाववादी नेताओं को कश्मीर पर चर्चा के लिए बुलाकर उन्हें कश्मीरियों के प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देती थी तो पाकिस्तान भी द्विपक्षीय वार्ता में हुर्रियत को पक्ष बनाने की जिद करता था। दिलचस्प बात यह थी कि हुर्रियत चुनावों का बहिष्कार करती थी, फिर भी उसे कश्मीरियों का प्रतिनिधि माना जाता था।
स्पष्ट है कि सड़कों पर दंगा-फसाद करने की हुर्रियत की क्षमता से ही उसे कश्मीरियों का प्रतिनिधि मान लिया गया था। इसके चलते भारत को गालियां देने और स्वयं को पाकिस्तानी बताने वाले सैयद अली शाह गिलानी जैसे हुर्रियत नेताओं की दिल्ली में खूब आवभगत होती रही। उनका इलाज भी भारत के बेहतरीन अस्पतालों में कराया जाता था। उनके बच्चों की पढ़ाई भी नामी-गिरामी देसी-विदेशी संस्थानों में होती रही।
अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद हुर्रियत के वे सुनहरे दिन लद गए। अब हुर्रियत के राष्ट्रविरोधी नेताओं को जेल में रहना पड़ रहा है या फिर भारत के प्रति निष्ठावान रहने की कसमें खानी पड़ रही हैं। यह सब साबित करता है कि दशकों तक इन अलगाववादियों को लेकर अपनाई लचर नीतियों ने ही कश्मीर में अलगाववाद को मजबूत किया था।
इस आलोक में पूर्ववर्ती सरकारों की पाकिस्तान नीति की भी तुलनात्मक समीक्षा आवश्यक है। बार-बार भारत में आतंकी हमले कराने के बावजूद पाकिस्तान से बात इसलिए की जाती थी, क्योंकि सरकारें कहीं न कहीं मानती थीं कि पाकिस्तान में ही यह क्षमता है कि वह हुर्रियत और जिहादी आतंकी संगठनों के जरिये जब चाहे कश्मीर को अस्थिर कर सकता है।
लिहाजा उससे बात करते रहना आवश्यक है। ऐसा करने पर होता यह था कि द्विपक्षीय वार्ता शुरू करने के कुछ समय बाद ही पाकिस्तान वार्ता की मेज पर दबाव बनाकर लाभ हासिल करने के लिए और बड़े आतंकी हमले कराता था। यह दुष्चक्र दशकों से अनवरत चल रहा था। मोदी सरकार ने उड़ी आतंकी हमले के बाद से इसके ठीक विपरीत नीति अपनाते हुए पाकिस्तान से केवल बातचीत ही बंद नहीं की, बल्कि सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक जैसे कदम उठाने से भी परहेज नहीं किया। इतना ही नहीं भारत ने पाकिस्तान की परमाणु हौव्वे की हेकड़ी भी निकाल दी।
पाकिस्तान से वार्ता बंद करने का दूसरा लाभ यह हुआ कि पूरे विश्व में भारत-पाकिस्तान का नाम एक साथ जोड़ने की कूटनीतिक संस्कृति लगभग समाप्त हो चुकी है। अब पाकिस्तान भारत का समकक्ष नहीं रहा। अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत का नाम अब चीन और रूस जैसे शक्तिशाली देशों के साथ लिया जाता है।
द्विपक्षीय संबंधों की दृष्टि से भी देखें तो पाकिस्तान को दबाव में बनाए रखने और अधिक भाव न देने की नीति इस अर्थ में भी कारगर रही कि सीमा पर हिंसक घटनाएं कम हुई हैं। वर्ष 2020 में चीन द्वारा पूर्वी लद्दाख में सैन्य मोर्चा खोलने के समय भी पाकिस्तान ने पश्चिमी मोर्चे पर कोई आक्रामक मुद्रा नहीं अपनाई।
उलटे इस तनाव के बीच ही फरवरी 2021 में उसने भारत के साथ नियंत्रण रेखा को लेकर संघर्षविराम की घोषणा कर दी, जो अभी तक जारी है। चूंकि पाकिस्तान अब भारत को लेकर अपनी जनता का ध्यान भटकाने में सक्षम नहीं रहा, इसलिए वहां आम जन का ध्यान अब घरेलू मुद्दों की ओर जाने लगा है। आंतरिक मोर्चे पर सशस्त्र अलगाववाद एवं गंभीर असंतोष ने भी पाकिस्तान की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
(लेखक काउंसिल ऑफ स्ट्रैटेजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं)