बैंक खोलने के लिए कितना पैसा चाहिए, क्या उद्योगपति खोल सकता है?
रिजर्व बैंक से लेना होता है लाइसेंस
भारत में बैंकों की नियामक संस्था के रूप में केंद्रीय बैंक यानी रिजर्व बैंक कार्यरत है. किसी भी तरह का वाणिज्यिक बैंक खोलने के लिए रिजर्व बैंक से लाइसेंस लेना होता है और इसकी गाइडलाइन का पालन करना होता है. 22 फरवरी 2013 को रिजर्व बैंक ने नए बैंक खोलने के लिए गाइडलाइन जारी की थीं. इसके तहत नए बैंकों को बैंक बैंकिंग विनियमन अधिनियम-1949 और पहले से मौजूद सभी मानदंडों का पालन करना पड़ता है.
रिजर्व बैंक किसी भी नए बैंक के लिए लाइसेंस जारी करने से पहले इस बात का पूरा ध्यान रखता है कि आम लोगों का धन डूबने न पाए. रिजर्व बैंक इस बात का भी ध्यान रखता है कि आर्थिक ताकत का केंद्रीकरण कुछ ही हाथों में न हो. इसलिए बैंक खोलने के लिए तमाम शर्तें तय की गई हैं.

कौन खोल सकता है बैंक?
भारत के मूल निवासी ऐसे व्यक्ति अथवा पेशवर जो किसी वरिष्ठ अफसर के रूप में बैंकिंग और वित्त के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव रखते हैं, वे बैंक खोलने के लिए आवेदन कर सकते हैं. इनके अलावा निजी क्षेत्र की कोई ऐसी इकाई या समूह जो भारत के लोगों के नियंत्रण या अधिकार में हो और जिनके पास कम से कम 10 साल का अनुभव हो, वे भी बैंक खोलने के लिए पात्र हैं. बशर्ते ऐसी इकाई या समूह की कुल सपंत्ति 50 अरब रुपए या इससे अधिक होनी चाहिए. आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण रोकने के लिए देश के बड़े औद्योगिक घरानों को नया बैंक खोलने की अनुमति नहीं है. हालांकि, वे नए बैंकों में 10 फीसदी तक का निवेश कर सकते हैं.
किसी भी तरह का कॉमर्शियल बैंक खोलने के लिए रिजर्व बैंक से लाइसेंस लेना होता है.
बैंक खोलने के लिए शर्तें
- बैंक खोलने के लिए तय शर्तों के अनुसार, प्रमोटर, प्रमोटर ग्रुप या एनओएफएचसी की बैंक की पेडअप वोटिंग इक्विटी पूंजी में कम से कम 40 फीसदी हिस्सेदारी होनी चाहिए. यह बैंक शुरू होने के बाद पांच साल तक बनी रहनी चाहिए.
- बैंक के कामकाज शुरू होने की तारीख से 15 साल के भीतर इन प्रमोटर, प्रमोटर ग्रुप या एनओएफएचसी की बैंक में हिस्सेदारी घटकर 15 फीसदी तक आ जानी चाहिए.
- नया बैंक खोलने के लिए पेडअप वोटिंग इक्विटी पूंजी कम से कम पांच अरब रुपए होनी चाहिए. यानी कि बैंक के पास हर समय कम से कम पांच अरब रुपये की पूंजी होनी चाहिए.
- किसी भी बैंक में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को देश में लागू प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति के तहत तय की जाती है.
- इसमें प्रमोटर या प्रमोटर समूह को एक निश्चित सीमा में शेयर रखने पड़ते हैं. वर्तमान में देश में बैंकिंग के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 75 फीसदी है.
- नए बैंक को अपनी नई शाखाओं में से कम से कम 25 फीसदी शाखाएं बिना बैंक वाले ग्रामीण क्षेत्र में खोलनी होती हैं. साथ ही प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को कर्ज के लक्ष्य को भी पूरा करना पड़ता है.
- नया बैंक अपना व्यवसाय शुरू करता है, तो इसके छह साल के भीतर उसको अपने शेयरों को स्टॉक एक्सचेंजों में सूचीबद्ध कराना पड़ता है.
स्मॉल फाइनेंस बैंक.
भारत में कितनी तरह के बैंक?
भारत में बैंकों का वर्गीकरण विभिन्न आधार पर किया जाता है. बैंकों के बैंक के रूप में केंद्रीय बैंक काम करता है, जिसे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया कहा जाता है. यह देश में एक ही है. इसके बाद अन्य तरह के बैंकों में कोऑपरेटिव बैंक, कॉमर्शियल बैंक, रिजनल रूरल बैंक, लोकल एरिया बैंक, स्पेशलाइज्ड बैंक, स्माल फाइनेंस बैंक और पेमेंट्स बैंक शामिल हैं.
- कोऑपरेटिव बैंक: इन बैंकों का संचालन राज्य सरकारों के कानून के तहत होता है. ये कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों को कम अवधि के कर्ज मुहैया कराते हैं. इन बैंकों का मुख्य लक्ष्य कम दरों पर कर्ज देकर सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देना है.
- कॉमर्शियल बैंक: इनका संचालन बैंकिंग कंपनीज एक्ट-1956 के तहत होता है और इनका मुख्य लक्ष्य लाभ कमाना होता है. ये बैंक तीन तरह के होते हैं. पब्लिक सेक्टर बैंक यानी ऐसे बैंक, जिनके ज्यादातर शेयर सरकार या फिर देश के केंद्रीय बैंक के पास होते हैं. प्राइवेट सेक्टर बैंक यानी ऐसे बैंक, जिनमें अधिकतर शेयर किसी प्राइवेट ऑर्गनाइजेशन, किसी एक व्यक्ति या फिर व्यक्तियों के समूह के पास होता है. फॉरेन बैंक यानी विदेशी बैंक ऐसे बैंक होते हैं, जिनका मुख्यालय दूसरे देशों में होता और उनकी शाखाएं हमारे यहां काम करती हैं.
एचडीएफसी बैंक.
- रीजनल रूरल बैंक: विशेष तरह के कॉमर्शियल बैंक होते हैं, जो कम दरों पर कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों को कर्ज मुहैया कराए जाते हैं. ये बैंक रीजनल रूरल बैंक एक्ट 1976 के तहत संचालित होते हैं. ये बैंक वास्तव में एक तरह के संयुक्त उपक्रम हैं, जिनमें 50 फीसदी हिस्सेदारी केंद्र सरकार की, 15 फीसदी राज्य सरकार की और 35 फीसदी हिस्सेदारी कॉमर्शियल बैंकों की होती है.
- लोकल एरिया बैंक: इनकी शुरुआत साल 1996 में की गई थी और ये प्राइवेट सेक्टर के अधीन होते हैं. कंपनीज एक्ट 1956 के तहत इनका पंजीकरण होता है, जिनका लक्ष्य प्रॉफिट कमाना होता है. वर्तमान में ज्यादा ऐसे बैंक दक्षिण भारत में स्थित हैं.
- स्पेशलाइज्ड बैंक: कुछ बैंक ऐसे होते हैं, जो खास उद्देश्य से खोले जाते हैं. इनको स्पेशलाइज्ड बैंक कहा जाता है. उदाहरण के लिए स्माल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया केवल छोटी औद्योगिक इकाइयों और व्यवसायों को कर्ज प्रदान करता है. इसी तरह से एग्जिम बैंक यानी एक्सपोर्ट एंड इम्पोर्ट बैंक से केवल दूसरे देशों से आयात-निर्यात के लिए जरूरत पर कर्ज लिया जा सकता है. नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट भी इसी कैटेगरी में आता है, जिससे ग्रामीण, हैंडीक्राफ्ट और कृषि के विकास के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है.
- स्माल फाइनेंस बैंक: ऐसे बैंक माइक्रो इंडस्ट्री, छोटे किसानों और समाज के असंगठित क्षेत्र के लोगों को वित्तीय सहायता और कर्ज देकर उनकी मदद करते हैं. इनका संचालन देश के केंद्रीय बैंक के हाथ में होता है.
- पेमेंट्स बैंक: रिजर्व बैंक की ओर से बैंकिंग का एक नया कॉन्सेप्ट शुरू किया गया है. इसके तहत पेमेंट्स बैंक शुरू किए गए हैं, जिनके खाताधारक केवल एक लाख रुपये तक अपने खातों में जमा कर सकते हैं. इस खाते पर लोन या क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन नहीं किया जा सकता है. देश के कुछ पेमेंट्स बैंक में एयरटेल पेमेंट्स बैंक, इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक, फिनो पेमेंट्स बैंक, जियो पेमेंट्स बैंक, पेटीएम पेमेंट्स बैंक और एनएसडीएल पेमेंट्स बैंक शामिल हैं.

