RTI : दिल्ली और आसपास के थर्मल पावर प्लांट्स की 10 साल से नहीं हुई प्रभावी जांच ????
RTI: प्रदूषण पर सिस्टम की आंख बंद, दिल्ली और आसपास के थर्मल पावर प्लांट्स की 10 साल से नहीं हुई प्रभावी जांच

दिल्ली और आसपास के क्षेत्र में स्थित थर्मल पावर प्लांट्स (टीपीपी) के उत्सर्जन की प्रभावी जांच पिछले 10 वर्षों के दौरान नहीं की गई है। यह चौंकाने वाला खुलासा आरटीआई से हुआ है। इसमें बताया गया कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने 300 किलोमीटर के दायरे में किसी भी कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट की पूरी स्टैक-एमिशन मॉनिटरिंग नहीं की है। बता दें कि 2015 में सरकार ने नियम बनाए थे, जिसके तहत सभी थर्मल पावर प्लांट्स को नियमित रूप से उत्सर्जन रिपोर्ट देने और पूरी जांच करने का आदेश दिया गया था।
आरटीआई के जवाब में बताया गया कि केवल दो प्लांट्स, हरियाणा के दीनबंधु छोटूराम थर्मल पावर स्टेशन और पंजाब के गुरु हरगोबिंद थर्मल पावर प्लांट, की आंशिक मॉनिटरिंग की गई थी। हालांकि, इन प्लांट्स के लिए भी पूरी मॉनिटरिंग और उत्सर्जन परिणामों को अभी तक जमा नहीं किया गया है। दिल्ली के आसपास के चार प्रमुख थर्मल पावर प्लांट्स में से तीन ने प्रदूषण नियंत्रण सिस्टम लगाए हैं।
इनमें एनटीपीसी दादरी, महात्मा गांधी टीपीएस (झज्जर) और इंदिरा गांधी एसटीपीएस (हिसार) शामिल हैं। हालांकि, पानीपत टीपीएस ने अभी तक प्रदूषण नियंत्रण नियमों का पालन नहीं किया है और इसे 31 दिसंबर, 2027 तक का समय दिया गया है। स्टैक-एमिशन मॉनिटरिंग का मतलब चिमनियों से निकलने वाले प्रदूषकों की माप और विश्लेषण करना है।
आरटीआई दायर करने वाले अमित गुप्ता ने कहा कि यह खुलासा गंभीर प्रवर्तन विफलताओं को उजागर करता है। उन्होंने बताया कि थर्मल पावर प्लांट्स से अनियंत्रित उत्सर्जन दिल्ली के पीएम2.5 स्तरों में बड़ा योगदान देता है, जो हर सर्दी में दिल्ली की खराब हवा का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि करीब एक दशक से पूरी तरह से मॉनिटरिंग न होना चिंताजनक है। साफ है कि नियमों को लागू करने में लगातार नाकामी हुई है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पिछले 10 वर्षों से दिल्ली के 300 किमी के दायरे में स्थित किसी भी थर्मल पावर प्लांट के चिमनी उत्सर्जन की जांच नहीं

- पिछले 10 वर्षों से चिमनी के उत्सर्जन की जांच नहीं की
- आरटीआई में सीपीसीबी ने स्वयं किया स्वीकार
- पर्यावरण नियमों का पालन नहीं करने पर कार्रवाई नहीं
नई दिल्ली। इसे प्रशासनिक लापरवाही कहें अथवा सरकारी हीलाहवाली… केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने पिछले 10 वर्षों से दिल्ली के 300 किमी के दायरे में स्थित किसी भी थर्मल पावर प्लांट (टीपीपी) के चिमनी उत्सर्जन की जांच या पूरी निगरानी नहीं की है।
चिमनी उत्सर्जन निगरानी का तात्पर्य औद्योगिक चिमनियों से निकलने वाले प्रदूषकों के मापन और विश्लेषण से है, ताकि वायु प्रदूषण के स्तर और पर्यावरणीय मानदंडों के अनुपालन की पुष्टि की जा सके।
केंद्र सरकार ने 2015 में नियम लागू किए थे, जिनके तहत सभी थर्मल पावर प्लांटों को नियमित रूप से अपने उत्सर्जन की जांच और रिपोर्ट करना अनिवार्य था। इसमें चिमनी उत्सर्जन की विस्तृत निगरानी भी शामिल है।
हालांकि, सामाजिक कार्यकर्ता अमित गुप्ता की आरटीआई के जवाब से पता चला है कि सीपीसीबी ने पिछले 10 वर्षों में राष्ट्रीय राजधानी के 300 किमी के दायरे में स्थित किसी भी कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र की चिमनी उत्सर्जन की पूरी निगरानी नहीं की है, जबकि ये संयंत्र सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) और पीएम 2.5 की महत्वपूर्ण मात्रा उत्सर्जित करते हैं।
आरटीआई के जवाब अनुसार, केवल दो संयंत्रों – हरियाणा में दीनबंधु छोटूराम थर्मल पावर स्टेशन और पंजाब में गुरु हरगोबिंद थर्मल पावर प्लांट – की आंशिक निगरानी की गई। सीपीसीबी ने कहा कि इन संयंत्रों की भी पूरी निगरानी, विश्लेषण और उत्सर्जन परिणामों की रिपोर्ट प्रस्तुत करना अभी बाकी है।
जवाब में आगे कहा गया है कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 11 जुलाई, 2025 की अधिसूचना के अनुसार, सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन मानक केवल श्रेणी-ए थर्मल पावर प्लांटों के लिए अनिवार्य हैं।
दिल्ली के आसपास स्थित ऐसे चार प्लांटों में से – एनटीपीसी दादरी, महात्मा गांधी टीपीएस (झज्जर), इंदिरा गांधी एसटीपीएस (हिसार) और पानीपत टीपीएस – तीन ने प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियां स्थापित कर ली हैं, जबकि पानीपत प्लांट अभी भी मानकों का पालन नहीं कर रहा है। इसे मानकों को पूरा करने के लिए 31 दिसंबर, 2027 तक का समय दिया गया है।
आरटीआई के जवाब से यह भी पता चलता है कि प्रदूषण नियंत्रण नियमों का पालन न करने पर इनमें से किसी भी प्लांट के खिलाफ न तो निगरानी की गई है और न ही कोई कार्रवाई शुरू की गई है।
मालूम हो कि कि थर्मल पावर प्लांटों से अनियंत्रित उत्सर्जन दिल्ली के पीएम2.5 स्तरों में महत्वपूर्ण योगदान देता है। “हर सर्दी में दिल्ली में जहरीली हवा का प्रकोप होता है, ऐसे में लगभग एक दशक से व्यापक निगरानी का अभाव चिंताजनक है। प्रवर्तन स्पष्ट रूप से विफल रहा है।

