दिल्लीराजनीति

चुनावों में धनबल व बाहुबल पर अंकुश लगाना अब जरूरी

चुनावों में धनबल व बाहुबल पर अंकुश लगाना अब जरूरी

भारतीय चुनाव व्यवस्था में सुधार लाने के लिए कई समितियां गठित की गई हैं। इनके तहत समय-समय पर ऐसे बदलाव किए गए हैं, जिनसे मतदाता की दृष्टि से चुनाव अधिक सहभागी बने हैं, चुनाव आयोग के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना आसान हुआ है और उम्मीदवारों की जवाबदेही भी बढ़ी है।

लेकिन दो ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर अब भी गंभीर ध्यान देने की जरूरत है- पहला, चुनावों को कम खर्चीला कैसे बनाया जाए और दूसरा, आपराधिक या दागी पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से कैसे रोका जाए। हाल ही में संसद में हुआ कई घंटों का लंबा विमर्श भी इसी चिंता को फिर से केंद्र में लाने की कोशिश था। इस चर्चा के दौरान चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने से जुड़े अनेक विषय तो उठे, लेकिन चुनावों में धनबल और बाहुबल पर अंकुश लगाने पर कोई ठोस बहस नहीं हो सकी।

भारत में चुनाव सुधारों की यात्रा की शुरुआत 1974-75 में हुई, जब मतदान की आयु, मतदाता सूचियों की शुद्धता तथा चुनावों में धन और बाहुबल पर अंकुश जैसे मुद्दों की समीक्षा के लिए न्यायमूर्ति तारकुंडे समिति का गठन किया गया। 1990 में गठित दिनेश गोस्वामी समिति ने चुनाव आयोग की शक्तियों, दलबदल विरोधी कानून, उपचुनावों सहित कई अन्य मुद्दों पर विचार किया। 1993 में बनी वोहरा समिति का उद्देश्य राजनीति और अपराध के गठजोड़ की जांच करना था। 1998 में गठित इंद्रजीत गुप्ता समिति ने चुनावी खर्च से जुड़े प्रश्नों पर ध्यान केंद्रित किया।

इसके अलावा, विधि आयोग की कई रिपोर्टों (1999, 2014 और 2015) में भी भारत में चुनाव सुधारों से संबंधित मुद्दों को रेखांकित किया गया। चुनाव आयोग ने भी 2004 में सरकार को एक रिपोर्ट सौंपकर चुनाव संचालन की प्रक्रिया में आवश्यक सुधारों का सुझाव दिया था। 2010 की तनखा समिति की रिपोर्ट ने भी चुनाव कानूनों में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। इसी क्रम में सबसे हालिया पहल 2023 में केंद्र सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति है, जिसकी अध्यक्षता भारत के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद कर रहे हैं। इस समिति को ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की व्यावहारिकता की जांच का दायित्व सौंपा गया।

चुनाव प्रक्रिया में सुधार के लिए किए गए लंबे प्रयासों की इस यात्रा में कई महत्वपूर्ण पड़ाव भी हासिल हुए हैं। बैलेट पेपर की जगह ईवीएम का इस्तेमाल, बाद में उनमें वीवीपैट को जोड़ा जाना, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए अपनी संपत्ति और आपराधिक पृष्ठभूमि का खुलासा करने वाला हलफनामा दाखिल करना अनिवार्य करना, चुनाव प्रचार की अवधि को तीन सप्ताह से घटाकर दो सप्ताह करना, मतदान प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग, सेवाओं में कार्यरत लोगों, 80 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगों के लिए होम वोटिंग की व्यवस्था शुरू करना आदि। इसके बावजूद सुधार की गुंजाइशें बनी हुई हैं।

संसद में जिन मुद्दों को उठाया गया, वे चुनाव सुधारों से अधिक कानूनी सुधारों की श्रेणी में आते हैं। लेकिन सबसे तात्कालिक जरूरत इस बात पर गंभीरता से विचार करने की है कि चुनावों में धन की भूमिका को कैसे कम या नियंत्रित किया जा सकता है। भारत में चुनाव अत्यंत महंगे हो चुके हैं।

इस पर हर कोई चिंता जताता है, लेकिन इससे निपटने के लिए कोई ठोस और गंभीर प्रयास होते नहीं दिखे हैं। इसी तरह, भारत जैसे देश में, जहां दल-आधारित मतदान का वर्चस्व है और बड़ी संख्या में मतदाता उम्मीदवार के बजाय पार्टी को वोट देते हैं, दागी पृष्ठभूमि वाले लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने का समाधान कानूनी उपायों से अधिक राजनीतिक दलों के स्तर पर संभव है। यदि पार्टियां ऐसे लोगों को टिकट ही न दें, तो समस्या काफी हद तक सुलझ सकती है।

चुनावों में धनबल और बाहुबल केवल भारत की समस्या नहीं है; यह कई अन्य स्थापित लोकतंत्रों में भी मौजूद है। लेकिन भारत को इस मोर्चे पर भी वैसी ही पहल करनी होगी, जैसी उसने अन्य क्षेत्रों में उदाहरण प्रस्तुत करते हुए की है।

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