ईसाइयों पर लगातार बढ़ते हमले कई सवाल उठाते हैं
दृश्य एक : कोलकाता। एक स्त्री नजरें उठाकर देखती हैं तो किसी गीत की धुन को हवा में तेजी से सरक आई ठंडक की चुभन के साथ महसूस करती हैं। इससे पहले कि वे उसे अनुभव कर सकें, वह ओझल हो जाती है। लेकिन वे जानती हैं कि यह खास अहसास 2026 के अंत में फिर लौटेगा।
यह वो अनुभूति है, जो पार्क स्ट्रीट (अब मदर टेरेसा सरणी) पर क्रिसमस-थीम वाली रोशनियों के साथ आएगी, पार्कों में बने मंचों पर गूंजते कैरोल्स, फुटपाथों पर बजती धुनों, गिरजाघरों व चैपल्स में। मुख्य सड़क दो रातों के लिए पैदलयात्रियों के लिए खोल दी जाती है।
चर्च रोशनी से जगमगा उठते हैं। बहुत कम शहर ऐसे हैं, जो सामुदायिक एकजुटता की इस उत्सवी उमंग की बराबरी कर सकें। कोलकाता में क्रिसमस कोई ऐसा अवसर नहीं है, जो बिना कोई निशान छोड़े चला जाए। यह अपना समय लेता है, ठहरता है और सच्ची खुशियों में भिगो देता है।
कोलकाता क्रिसमस फेस्टिवल अब अपने 15वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। यह ‘बोड़ो दिन’ की सदियों पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाता है। क्रिसमस से नए साल के शुरुआती दिनों तक, यह उत्सव सभी के द्वारा मनाया जाता है। रोशनियां, सजावट, भोजन। कोयर और बैंड उन सभी के लिए प्रस्तुति देते हैं, जो थोड़ी देर रुककर सुनेंगे- और संगीत के साथ मुस्कुराएंगे और झूमेंगे।
दृश्य दो : उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश या राजस्थान में कहीं। नहीं, यह वो क्रिसमस तो नहीं, जिसे हम जानते हैं। सड़क किनारे सांता क्लॉज की टोपियां बेचकर रोजी-रोटी कमाने वालों को परेशान करना। उन्हें पहनने वालों की पिटाई करना। मॉल्स में लगे क्रिसमस ट्री गिरा देना। नए साल के लिए लगाई गई सजावट को तहस-नहस करना। प्रार्थना में डूबे एक समुदाय को धमकाना।
ये दो तस्वीरें एक-दूसरे से कितनी अलग हैं! वरिष्ठ जेसुइट पादरी फादर सेड्रिक प्रकाश ने इस स्तम्भकार से कहा : आज भारत में ईसाइयों के साथ जो हो रहा है, वह न केवल अस्वीकार्य है, बल्कि असंवैधानिक भी है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री यह दिखाते हैं कि सब कुछ ठीक है और क्रिसमस के दिन चर्चों में जाते हैं और दूसरी तरफ क्रिसमस से जुड़े धार्मिक-सामाजिक प्रतीकों पर होने वाले हमलों की निंदा तक नहीं करते।
भारत में कैथोलिक बिशपों के सबसे बड़े संगठन के प्रमुख ने भी एक वीडियो संदेश जारी करते हुए कहा : शांतिपूर्ण कैरोल गायकों और चर्चों में एकत्रित श्रद्धालुओं को निशाना बनाया गया है, जिससे कानून का पालन करने वाले नागरिकों में भय और पीड़ा की भावना पैदा हो गई है। ऐसी घटनाएं हमारे संविधान की आत्मा को गहरे आघात पहुंचाती हैं। मैं घृणा और हिंसा के इन कृत्यों की घोर निंदा करता हूं।
बहरहाल, ईसाई समुदाय को केवल ‘नकारात्मक कारणों’ से ही सुर्खियों में खिंच जाने के जाल में नहीं फंसना चाहिए। सकारात्मक संदेश ही कुंजी है। इस समुदाय ने विशेष रूप से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
हर वर्ष देश भर में ईसाई-संचालित 54,000 शैक्षिक संस्थानों में सात करोड़ छात्र नामांकित होते हैं। इनमें पढ़ने वाले हर चार में से कम से कम तीन छात्र गैर-ईसाई हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई मंत्री ईसाई-संचालित संस्थानों के पूर्व छात्र रहे हैं- जेपी नड्डा, पीयूष गोयल, निर्मला सीतारमण, अश्विनी वैष्णव, ज्योतिरादित्य सिंधिया और अतीत में लालकृष्ण आडवाणी भी।
वहीं इस समुदाय द्वारा संचालित स्वास्थ्य संस्थान भारत की लगभग दो प्रतिशत आबादी को सेवाएं प्रदान करते हैं। इस कार्य का 80% दूरदराज और चिकित्सकीय रूप से वंचित क्षेत्रों में किया जाता है। महामारी के दौरान, एक हजार से अधिक अस्पतालों में 60,000 इन-पेशेंट बिस्तर उपलब्ध कराए गए। 3,500 से अधिक संस्थानों के साथ कैथोलिक हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया भारत का सबसे बड़ा गैर-सरकारी स्वास्थ्य नेटवर्क है।
सर्वोच्च अदालत के एडवोकेट कोलिन गोन्जाल्विस स्पष्ट करते हैं कि किसी भी अदालत में आपको दोषसिद्धि का ऐसा मामला नहीं मिलेगा, जिसमें जबरन किसी का धर्मांतरण कराया हो। यह सब राजनीतिक दुष्प्रचार है। आज देश में हर साल ईसाइयों पर हमलों के 600 मामले दर्ज होते हैं। अगर न्यायपालिका भी मौन साधे रही तो हमारी रक्षा कौन करेगा?
किसी अदालत में आपको दोषसिद्धि का ऐसा मामला नहीं मिलेगा, जिसमें जबरन धर्मांतरण कराया गया हो। यह दुष्प्रचार है। देश में हर साल ईसाइयों पर हमलों के 600 मामले दर्ज होते हैं। न्यायपालिका भी मौन रही तो हमारी रक्षा कौन करेगा?

