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धर्म की रक्षा और शंकराचार्य की बेइज्जती!

धर्म की रक्षा और शंकराचार्य की बेइज्जती

आजद हिंदुस्तान में औरंगजेब बार-बार दस्तक दे रहा है. कभी काशी में तो कभी प्रयागराज में.ये मै नहीं कह रहा, ये जनश्रुति बन गई है. लोग कहने लगे हैं कि योगीराज को धता बताते हुए औरंगजेब ने पहले काशी में मणिकर्णिका घाट जमींदोज किया और फिर उसी ने आकर प्रयागराज में एक शंककराचार्य की भद्द पीट दी.
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार एक उत्तरदायी सरकार है, लोक कल्याणकारी सरकार है, धर्मभीरू सरकार है इसलिए मैं कैसे मान लूँ कि काशी या प्रयागराज में जो हुआ वो सरकार के इशारे पर या संरक्षण में हुआ. निश्चित ही इन दोनों वारदातों के पीछे औरंगजेब की रूह या उसका भूत है. और भूतों का आप कुछ बिगाड नहीं सकते.
यूपी में दर असल रामराज है, भले ही राजकाज गोरखपुर वाले योगी आदित्य नाथ देख रहे हों. योगी जी सत्यं, शिवं, सुंदरंम में यकीन रखते हैं. वे काशी को सुन्दर बना रहे हैं. इसमें टूट- फूट स्वाभाविक है. वे तो वही सब कर रहे हैं जो अठारहवीं शताब्दी में लोकमाता अहिल्या बाई ने किया था. अर्थात जीर्णोद्धार. जीर्ण-शीर्ण के उद्धार में तनथोरी टूट-फूट हुई तो लोगों ने आसमान सिर पर उठा लिया.
प्रयागराज में भी शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज को लाव लश्कर के साथ स्नान के लिए जाने की क्या जरुरत थी ? शंकराचार्य कोई सतुआ बाबा तो हैं नहीं जो उन्हे वीआईपी दर्जे की सुविधाएं दी जाएं? शंकराचार्य योगी राज के मुखर विरोधी हैं. वे सतुआ बाबा की तरह योगी जी के समर्थक होते तो शंकराचार्य जी को घाट पर जाने की जरुरत ही न पडती. घाट खुद चलकर उनके पास आ जाता.
रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास महाराज ने लिखा-‘नारि न मोहे, नारि के रूपा, पन्नगारि ये रीति अनूपा.’. गोस्वामी जी यदि जानते कि कभी कोई योगी भी सत्ता में आएगा तो वे नारि के स्थान पर ‘योगी न मोहे योगी के रूपा’ लिखते. स्वाभाविक है कि एक भगवाधारी दूसरै की सत्ता को कैसे स्वीकार कर सकता है ? हमारे योगी बाबा सतुआ बाबा को महत्व दे सकते हैं, लेकिन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को नहीं, क्योंकि वे न सरकार के लिए काम करते हैं न योगी के लिए. यानि ‘काम के न काज के, दुश्मन अनाज के’.. शंकराचार्य यदि महाकुम्भ भगदड में हुई मौतों के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को जिम्मेदार ठहराएंगे तो मुख्यमंत्री योगी जी क्यों कर शंकराचार्य का स्वागत करेंगे. और करेंगे भी तो जैसा चाहते थे, बैसे ही यूपी की पुलिस कर रही है.
भाजपा की सरकार का धर्म अलग-अलग राज्य में अलग -अलग है. मध्यप्रदेश में कांग्रेस के एक विधायक इंजीनियर फूलसिंह बरैया अंगारे बरसा रहे हैं. सवर्ण बरैया का पुतला फूंक रहे हैं लेकिन डॉ मोहन यादव की सरकार फूलसिंह के खिलाफ कोई कार्रवाई करने की हिम्मत नही जुटा पा रही. अब फूलसिंह बरैया तो कोई शंकराचार्य हैं नहीं फिर भी सरकार कमजोर पड रही है. जबकि बरैया के बयान समाज में अशांति फैला रहे हैं और कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार हैं.
मध्य प्रदेश अशांत है लेकिन मुख्यमंत्री शांत हैं, उनकी पुलिस शांत है. जबकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनकी पुलिस लाठियां लेकर मैदान में खडी है. साधू-संतों को धुन रही है. बहरहाल जो हो रहा है सो हो रहा है. सब अपनी लडाई लड रहे हैं. जनता मूकदर्शक यहाँ भी है और वहां भी. जनता प्रतिकार करने की ताकत खो चुकी है. सेंगोल के आगे जनता की घिघ्घी बंधी हुई है. एक शंकराचार्य अकेले क्या कर लेंगे? सरकार उन्हे भी नकली, फर्जी, हिंदुत्व और राष्ट्र विरोधी घोषित कर देगी. कर सकती है. देखते रहिये तमाशा.

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