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करंसी की वैल्यू घटती-बढ़ती क्यों है?

करंसी की वैल्यू घटती-बढ़ती क्यों है? आसान भाषा में समझें इसके 5 कारण

Currency: अक्सर खबरें आती हैं कि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया कमजोर हो गया. कभी सोचा है कि रुपया यानी भारतीय करंसी कैसे कमजोर हो जाती है. किसी भी देश की करंसी के मजबूत होने या कमजोर होने के पीछे कई कारण होते हैं. आसान भाषा में समझें ऐसा क्यों और कैसे होता है.

Explained: करंसी की वैल्यू घटती-बढ़ती क्यों है? आसान भाषा में समझें इसके 5 कारण

करंसी की वैल्‍यू घटने और बढ़ने के पीछे कई कारण होते हैं.

करंसी की वैल्यू का मतलब आम तौर पर एक मुद्रा की दूसरी मुद्रा के मुकाबले कीमत से होता है. जैसे आज 1 USD = 90 INR है तो इसका अर्थ है कि 1 डॉलर खरीदने के लिए 90 रुपये देने पड़ते हैं. जब कहा जाता है कि रुपया मजबूत हुआ तो मतलब होता है कि कम रुपये देकर 1 डॉलर मिल रहा है (जैसे 90 से 88). और रुपया कमजोर हुआ का मतलब है ज्यादा रुपये देकर 1 डॉलर मिल रहा है (जैसे 90 से 84).

करंसी की वैल्यू बढ़ती कैसे है?

जब किसी देश की मुद्रा की मांग बढ़ती है या उसकी सप्लाई घटती है, तो उसकी वैल्यू मजबूत होने लगती है. मांग बढ़ने के पीछे कई कारण हो सकते हैं—देश में निवेश बढ़ना, निर्यात बढ़ना, ब्याज दर आकर्षक होना, महंगाई काबू में होना, या जोखिम कम लगना.

1- निर्यात (Exports) बढ़ना

मान लें भारत की दवाइयां, आईटी सेवाएं या ऑटो पार्ट्स दुनिया में ज्यादा बिकने लगें. विदेश के खरीदार भुगतान करने के लिए INR की मांग बढ़ाते हैं या भारत की कंपनियों को डॉलर देते हैं, जिसे वे रुपये में बदलती हैं. इससे रुपये की मांग बढ़ती है और वह मजबूत हो सकता है.

US dollar history

अमेरिकी डॉलर.

2- विदेशी निवेश का बढ़ना

अगर विदेशी कंपनियां भारत में फैक्ट्री लगाएं या विदेशी फंड भारतीय शेयर/बॉन्ड में निवेश बढ़ाएं, तो उन्हें अपना डॉलर/यूरो रुपये में बदलना होगा. इससे बाजार में रुपये की मांग बढ़ती है और मुद्रा मजबूत हो सकती है.

3- ब्याज दर बढ़ना और अंतर का फायदा

यदि किसी देश की ब्याज दरें बाकी देशों की तुलना में आकर्षक हों, तो निवेशक वहां के बॉन्ड/डिपॉजिट में पैसा लगाना चाहेंगे. उन्हें उस देश की करंसी खरीदनी पड़ेगी. उदाहरण के तौर पर, अगर भारत में रिटर्न तुलनात्मक रूप से बेहतर दिखे, तो रुपये की मांग बढ़ सकती है और वैल्यू ऊपर जा सकती है.

4- महंगाई काबू में आना

जिस देश में महंगाई कम रहती है, वहां की मुद्रा की खरीदने की ताकत बेहतर रहती है. बाजार को लगता है कि यह मुद्रा समय के साथ ज्यादा स्थिर रहेगी. नतीजा, उस मुद्रा में भरोसा बढ़ता है, मांग बढ़ती है, और वैल्यू मजबूत हो सकती है.

5- करंट अकाउंट/ट्रेड घाटा कम होना

अगर देश का आयात कम हो जाए या निर्यात बढ़ जाए, तो विदेश से ज्यादा डॉलर बाहर नहीं जाएंगे. यानी विदेशी मुद्रा पर निर्भरता कम होगी. इससे स्थानीय मुद्रा पर दबाव घटता है, और वह मजबूत हो सकती है. उदाहरण: तेल आयात बिल घटे, तो INR पर दबाव कम हो सकता है.

Swiss Franc

स्विट्ज़रलैंड की करंसी स्विस फ्रैंक (CHF), इसे सबसे सुरक्षित मुद्रा माना जाता है.

करंसी की वैल्यू घटती कैसे है?

जब किसी मुद्रा की मांग घटती है या सप्लाई बढ़ती है, तब वह कमजोर होती है. कई बार डर/अनिश्चितता भी निवेशकों को पैसा निकालने पर मजबूर कर देती है, जिससे मुद्रा गिरती है. इसे नीचे दिए गए पांच उदाहरण से समझते हैं.

1-आयात तेज़ी से बढ़ना

मान लें किसी देश को तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स या खाद्य सामग्री बहुत ज्यादा मात्रा में आयात करनी पड़े. आयात भुगतान के लिए देश को डॉलर/यूरो खरीदने पड़ते हैं, यानी विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है और स्थानीय मुद्रा पर दबाव आता है—वह कमजोर हो सकती है.

Indian Currency

भारतीय करंसी (INR)

2- विदेशी निवेश का बाहर निकलना

यदि विदेशी निवेशक शेयर/बॉन्ड बेचकर पैसा निकालें, तो उन्हें रुपये बेचकर डॉलर खरीदना होगा. इससे रुपये की सप्लाई बढ़ती है और मांग घटती है. नतीजा: रुपया गिर सकता है. यह अक्सर वैश्विक डर, मंदी, या किसी देश के बारे में नकारात्मक खबरों में होता है.

3-महंगाई बढ़ना

अगर घरेलू महंगाई बहुत बढ़ जाए, तो उस मुद्रा की वास्तविक वैल्यू कम होती है. बाजार को लगता है कि उस करंसी में रखी संपत्ति की खरीद-शक्ति घटेगी, इसलिए लोग दूसरी मुद्राओं की ओर शिफ्ट करते हैं. इससे स्थानीय मुद्रा की मांग घटती है और वैल्यू गिर सकती है.

4-नीतिगत अनिश्चितता या राजनीतिक जोखिम

जब किसी देश में नीति बार-बार बदलती हो, नियम अस्पष्ट हों, या राजनीतिक अस्थिरता बढ़े, तो निवेशक रिस्क मानकर पैसा रोक लेते हैं या निकाल लेते हैं. इससे मुद्रा कमजोर पड़ सकती है. यहां मुद्दा भरोसे का है. करंसी का भाव भरोसे से भी चलता है.

Greenland Currency

ग्रीनलैंड की करंसी.

5- ब्याज दर कम होना या रिटर्न कम आकर्षक लगना

यदि किसी देश की ब्याज दरें कम हो जाएँ या अन्य देशों की बढ़ जाएँ, तो निवेशकों को वहां निवेश का फायदा कम दिखता है. वे बेहतर रिटर्न वाली जगह जाते हैं. इससे स्थानीय मुद्रा बिकती है और वैल्यू गिर सकती है.

डॉलर महंगा बनाम रुपया मजबूत

  • अगर 1 USD/INR 90 से 95 चला जाए, तो डॉलर महंगा हुआ और रुपया कमजोर हुआ.
  • अगर USD/INR 90 से 85 पर आ जाए, तो डॉलर सस्ता हुआ और रुपया मजबूत हुआ.

आम आदमी पर असर

  • रुपया मजबूत: आयात सस्ता (तेल, मोबाइल, विदेशी शिक्षा), विदेशी यात्रा सस्ती; लेकिन निर्यातकों की कमाई पर दबाव आ सकता है.
  • रुपया कमजोर: आयात महंगा (महंगाई बढ़ सकती है), विदेश पढ़ाई/यात्रा महंगी; लेकिन निर्यातकों को फायदा हो सकता है क्योंकि विदेश में उनके सामान की कीमत प्रतिस्पर्धी बनती है.

इस तरह हम समझ सकते हैं कि करंसी की वैल्यू कोई रहस्यमयी चीज नही. यह मुख्यतः डिमांडसप्लाई का खेल है, जिसे व्यापार, निवेश, ब्याज दर, महंगाई, भरोसा और वैश्विक घटनाएं लगातार प्रभावित करती हैं. जब देश की अर्थव्यवस्था मजबूत दिखती है और दुनिया का भरोसा बढ़ता है, तो करंसी मजबूत हो सकती है; और जब घाटे, महंगाई, अनिश्चितता या पूंजी निकासी बढ़े, तो करंसी दबाव में आ जाती है.

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