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 क्या अंग्रेजों के सम्मान में लिखा गया जन-गण-मन ?

 क्या अंग्रेजों के सम्मान में लिखा गया जन-गण-मन, रवींद्रनाथ टैगोर ने कैसे दिया था जवाब?

Jana Gana Mana History: क्या भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन…’ अंग्रेजों के लिए लिखा गया था? यह सवाल इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया पर कई बार यही दावा किया जाता है. गणतंत्र दिवस की तैयारियों के बीच भी ऐसी पोस्ट नजर आती हैं. यूजर्स बिना सच जाने बड़ी आसानी से इसे शेयर कर देते हैं. 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने ‘जन-गण-मन’ को आधिकारिक रूप से भारत के राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया. इस मौके पर जानिए, क्या है इसकी सच्चाई और यह भ्रम कैसे फैला.

Jana Gana Mana History: क्या अंग्रेजों के सम्मान में लिखा गया जन-गण-मन, रवींद्रनाथ टैगोर ने कैसे दिया था जवाब?

24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने ‘जन-गण-मन’ को आधिकारिक रूप से भारत के राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया.

भारत का राष्ट्रगान जन-गण-मन केवल कुछ पंक्तियां नहीं हैं, बल्कि यह भारत की विविधता, एकता और अखंडता का जीवंत प्रतीक है. गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस समेत अनेक अवसरों पर जब यह धुन कानों में पड़ती है, तो हर भारतीय का मस्तक गर्व से ऊंचा हो जाता है. 24 जनवरी, 1950 को, यानी गणतंत्र दिवस से ठीक दो दिन पहले, संविधान सभा ने ‘जन-गण-मन’ को आधिकारिक रूप से भारत के राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया.

राष्ट्रगान की रचना और इतिहास

जन-गण-मन की रचना विश्व विजेता कवि और नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने वर्ष 1911 में की थी. मूल रूप से यह बांग्ला भाषा में लिखा गया था, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की प्रधानता है. यह टैगोर द्वारा रचित कविता भारतो भाग्य बिधाता का पहला पद है. इस गीत को पहली बार 27 दिसंबर, 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता (अब कोलकाता) अधिवेशन में गाया गया था. दिलचस्प बात यह है कि रवींद्रनाथ टैगोर ने ही इसकी धुन भी तैयार की थी. बाद में, साल 1919 में आंध्र प्रदेश के मदनपल्ले में प्रवास के दौरान उन्होंने इसका अंग्रेजी अनुवाद मॉर्निंग सॉन्ग ऑफ इंडिया के नाम से किया था.

National Anthem Of India Wrote By Rabindranath Tagore

जन-गण-मन की रचना कवि और नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने वर्ष 1911 में की थी.

क्या यह अंग्रेजों के सम्मान में लिखा गया था?

यह सत्य नहीं है. पर, गलतफहमी के रूप में दशकों से हमारे बीच उपलब्ध है. अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि टैगोर ने इसे ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम के भारत आगमन पर उनके स्वागत में लिखा था. इस गलतफहमी के पीछे मुख्य कारण उस समय की कुछ मीडिया रिपोर्ट्स थीं. 27 दिसंबर, 1911 को कांग्रेस के उसी अधिवेशन में जॉर्ज पंचम के स्वागत में स्कूली बच्चों ने एक अन्य गीत गाया था.

अगले दिन कुछ ब्रिटिश अखबारों ने भ्रमवश यह छाप दिया कि टैगोर का गीत सम्राट की स्तुति में था. स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर ने 1937 में एक पत्र लिखकर इस पर स्पष्टीकरण दिया था. उन्होंने लिखा था कि भारत का भाग्य विधाता कोई ब्रिटिश सम्राट नहीं हो सकता, बल्कि वह सर्वशक्तिमान ईश्वर या भारत की अंतरात्मा है जो युगों-युगों से देश का मार्गदर्शन कर रही है. उन्होंने स्पष्ट किया था की गीत में प्रयुक्त अधिनायक शब्द का अर्थ भी उस परम शक्ति से है, न कि किसी विदेशी शासक से.

 

राष्ट्रगान के रूप में कब अपनाया गया?

भारत की आजादी के बाद, संविधान सभा में राष्ट्रगान को लेकर लंबी चर्चा हुई. अंततः 24 जनवरी, 1950 को, यानी गणतंत्र दिवस से ठीक दो दिन पहले, संविधान सभा ने ‘जन-गण-मन’ को आधिकारिक रूप से भारत के राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया. इसी दिन ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा भी दिया गया. डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में घोषणा की थी कि ‘जन-गण-मन’ राष्ट्रगान होगा और ‘वंदे मातरम’ को भी समान सम्मान दिया जाएगा क्योंकि उसका भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक महत्व रहा है.

राष्ट्रगान के नियम

राष्ट्रगान का सम्मान करना हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य है. गृह मंत्रालय द्वारा इसके लिए कुछ स्पष्ट दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं.

  • समय सीमा: राष्ट्रगान के पूर्ण संस्करण को गाने या बजाने की अवधि लगभग 52 सेकंड निर्धारित है. इसके संक्षिप्त संस्करण (पहली और अंतिम पंक्ति) को बजाने में लगभग 20 सेकंड का समय लगता है.
  • सावधान की मुद्रा: जब भी राष्ट्रगान बज रहा हो, प्रत्येक व्यक्ति को सावधान मुद्रा में खड़ा होना चाहिए. यह राष्ट्र के प्रति सम्मान प्रकट करने का तरीका है.
  • व्यवधान न डालना: राष्ट्रगान के गायन में बाधा डालना या इसे बीच में रोकना कानूनी अपराध की श्रेणी में आता है. प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971 के तहत ऐसा करने पर सजा का प्रावधान है.
  • सिनेमा हॉल का नियम: सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, अब सिनेमा हॉल में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य नहीं है, लेकिन यदि बजता है, तो दर्शकों को सम्मान में खड़ा होना चाहिए.

 

गणतंत्र दिवस और राष्ट्रगान का महत्व

26 जनवरी, 1950 को भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बना. गणतंत्र दिवस वह दिन है जब हम अपने संविधान और अपनी राष्ट्रीय पहचान का उत्सव मनाते हैं. राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पर जब राष्ट्रपति तिरंगा फहराते हैं और 21 तोपों की सलामी के बीच राष्ट्रगान की धुन बजती है, तो वह क्षण देश की संप्रभुता का सबसे सशक्त प्रतीक होता है. यह गीत उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक और पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में बंगाल तक की भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता को पिरोता है. इसमें पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्रविड़, उत्कल और बंग जैसे क्षेत्रों का उल्लेख भारत की अखंडता को दर्शाता है.

निष्कर्ष यह है की ‘जन-गण-मन’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का स्वर है. यह हमें याद दिलाता है कि हमारी विविधता ही हमारी शक्ति है. अंग्रेजों की स्तुति वाली बातें केवल ऐतिहासिक भ्रांतियां हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि यह गीत भारतीय राष्ट्रवाद की गहरी चेतना से उपजा है. इस गणतंत्र दिवस पर, जब हम राष्ट्रगान गाएं, तो इसके अर्थ और इसके पीछे के बलिदानों को याद करना ही इसके प्रति सच्ची आदरांजलि होगी.

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